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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - काहे का कायदा काहे का कानून

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - काहे का कायदा काहे का कानून

-सुभाष मिश्र

कहावत जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। दरअसल, अंग्रेजों के जाने के बाद हमार देश में जो नौकरशाही काम कर रही है उसमें कई लोग अभी भी गोरे हकीमों की तरह काम कर रहे हैं। नौकरशाही के रवैये को लेकर समय-समय पर न्यायालयों, राजनेताओं ने तल्ख टिप्पणी की है। अभी ताजा मामलों में नौकरशाही का बहुत ही क्रूर चालाक और बेईमान चेहरा सामने आया है, जिस पर नये सिरे से सोचने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के निलंबित एडीजी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) एनवी रमना ने सिविल सर्वेंट के व्यवहार पर आपत्ति जनक टिप्पणी करते हुए कहा है कि हमें ब्यूरोक्रेसी के मामलों में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्थायी समिति बनाने पर विचार कर रहे थे लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं करना चाहते। मामले चाहे छत्तीसगढ़ के पुलिस अधिकारियों के आचरण से जुड़ा हुआ हो या गोरखपुर के युवा व्यापारी की मार-मार कर हत्या के बाद उसकी पत्नी की कलेक्टर, एसपी का बयान बदलने कहने का वीडियो हो या फिर उत्तर प्रदेश के हाथरस में हत्या, बलात्कार पीडि़त एक दलित लड़की के शव का अंतिम संस्कार का मामला हो या फिर किसान आंदोलन के दौरान एक युवा आईएएस द्वारा किसानों का फूटा हुआ सिर देखने की इच्छा का प्रगटीकरण हो। छत्तीसगढ़ के महासमुंद में विधायक और आम लोगों की पिटाई के मामले में एक युवा आईपीएस के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश न्यायालय ने हाल में ही दिया है। देश की शीर्ष सेवाओं के लिए चयनित अधिकारियों के आचरण को लेकर जब सवाल उठते हैं तो यह सोचना पड़ता है कि इन्हें तैयार करने में कहां चुक हो रही है। बहुत से नौकरशाहों के लिए काहे का कायदा, काहे का कानून जैसी स्थिति निर्मित कर दी है। कानपुर के व्यापारी मनीष गुप्ता की हत्या के बाद उत्तर प्रदेश के सीएम आदित्यनाथ योगी की यूपी पुलिस को नसीहत देते हुए कहा है कि समय पर सही जानकारी दें तो नहीं बनेंगे खलनायक।

नौकरशाही को यूपीएससी या पीएससी से चयनित होने के बाद मैसूरी, हैदराबाद, देहरादून या फिर राज्य की प्रशासन अकादमियों में कई तरह के प्रशिक्षण दिये जाते हैं, जहां पर नियम, प्रक्रिया और मानवीय संवेदनशीलता के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराकर एक कुशल नौकरशाह जिसे सिविल सर्वेंट भी कहा जाता है। प्रत्येक शासकीय सेवक को सिविल सेवा आचरण नियमों के साथ कायदे कानून के पालन की शपथ भी दिलाई जाती है और उसमें उम्मीद भी की जाती है कि वह उसके अनुरूप आचरण करेगा।

यह सही है कि देश-प्रदेश की सत्तासीन सरकारें नौकरशाही को अपने ढंग और अपने हितों के अनुसार संचालित करना चाहती है।  

देश और प्रदेश की बहुत सी संस्थाओं ने सत्ता के कहने पर जिस तरह की कार्यवाहियां की है उससे उनकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। राज्य सरकारें भारतीय सेवा के अधिकारियों को प्रताडि़त न कर सके इसके लिए अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) संशोधन नियम-2015 के मसौदे के अनुसार राज्य सरकारें किसी भी आईएएस या आईपीएस अधिकारी को एक हफ्ते से ज्यादा निलंबित नहीं रख सकेंगी। सिवाय उन मामलों को छोड़कर जहां राज्य सरकारों की समीक्षा समिति ने इसकी पूर्व अनुमति दी हो। राज्य सरकारों को उनके निलंबन के बारे में 48 घंटे के भीतर केंद्र सरकार को सूचना देनी होगी। नौकरशाह लंबे समय से मांग करते रहे थे कि राज्य सरकारें मनमर्जी से उनका निलंबन और स्थानांतरण कर देती हैं। अपने बचाव के लिए अलग-अलग कॉडर में काम करने वाले नौकरशाहों की यह मांग नाजायज भी नहीं है, क्योंकि राजनीतिक कारणों से तथा मनमाफिक अधिकारियों की तैनाती के लिए नौकरशाहों के प्रति मनमाना व्यवहार किया जाता रहा है, जिसकी वजह से प्रशासनिक गुणवत्ता प्रभावित हुई है किन्तु इसका एक दूसरा पक्ष भी है जब यही नौकरशाह अपने अधीनस्थों को आए दिन अकारण या अपने अहं की तुष्टि के लिए निलंबित करते रहते हैं और लंबे समय तक जांच पूरी नहीं करते। बहुत से भारतीय सेवा के अधिकारियों का आचरण राज्य सेवा के अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ छूआछूत और भेदभाव वाला रहता है। कुछ वर्षों पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और उसके परिजन, विदेशों में सरकारी खर्चे पर इलाज कराने और आपातकालीन चिकित्सा के लिए उन्हें हैलीकाप्टर से राज्य के बाहर ले जाने की भी सुविधा दी गई। वहीं देश के आम नागरिकों, दूसरे कर्मचारियों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। हमारे देश में हर नागरिक के लिए एक संविधान, समान कानून और विधान होते हुए भी सब कुछ असमान है तो इसके लिए यहां की नौकरशाही भी काफी हद तक जिम्मेदार है।

देश की नौकरशाही और आला पुलिस अधिकारियों के व्यवहार से भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना बेहद नाराज हैं। सीजेआई ने पुलिस अधिकारियों में सत्ताधारी पार्टी के साथ दिखने के नए चलन पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, देश में स्थिति दुखद है। जब कोई राजनीतिक दल सत्ता में होता है तो पुलिस अधिकारी एक विशेष दल के साथ होते हैं। फिर जब कोई नई पार्टी सत्ता में आती है तो सरकार उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करती है। यह एक नया चलन है, जिसे रोकने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने एडीजी के खिलाफ जबरन वसूली के एक मामले के संबंध में कहा, आपने पैसा ऐंठना शुरू कर दिया है, क्योंकि आप सरकार के करीबी हैं। यही होता है। यदि आप सरकार के करीबी हैं और इस प्रकार की चीजें करते हैं तो आपको एक दिन वापस भुगतान करना होगा, ठीक ऐसा ही हो रहा है।