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सर्व सिद्धी दक्षिण काली शक्ति पीठ में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित

सर्व सिद्धी दक्षिण काली शक्ति पीठ में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित

देवी के दक्षिण मुखी होने की जानकारी कम लोगों को ही है

अड़भार, 19 अक्टूबर। ब्लॉक मुख्यालय मालखरौदा अंतर्गत प्राचीन नगर अड़भार में सर्व सिद्धी दक्षिण काली शक्ति पीठ, माँ अष्टभुजी मंदिर में दक्षिणमुखी प्रतिमा विराजमान है, जो कि पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। पांचवी छठवीं शताब्दी के पूरा अवशेष इस स्थान पर मिलते हैं।  इतिहास में अड़भार का उल्लेख अष्ट द्वार के रूप में मिलता है।  आधार की मां अष्टभुजी आठ भुजाओं वाली है यह बात तो अधिकांश लोग जानते हैं लेकिन देवी के दक्षिण मुखी होने की जानकारी कम लोगों को ही है। 

जांजगीर-चांपा जिले में मुंबई हावड़ा रेल मार्ग पर सक्ती से दक्षिण पूर्व की ओर 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अड़भार अष्टभुजी माता के मंदिर के नाम पर प्रसिद्ध है। 

 लगभग 10 साल पहले भाजपा शासन कार्यकाल में यह गांव को नगर पंचायत का दर्जा प्राप्त हुआ तब से लेकर आज तक विकास की ओर अग्रसर है । यहां चैत्र नवरात्र एवं कुंवार नवरात्र पर मां अष्टभुजी के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगता है । 


लेकिन दुर्भाग्यवश इस वर्ष कोरोनावायरस (कोविड-19) वैश्विक महामारी के चलते चैत्र नवरात्रि  में न ही ज्योति कलश प्रज्ज्वलित हुआ था और ना ही भक्त माता रानी की दर्शन भी नहीं कर पाए थे, वही चैत्र माह के बाद अब कुंवार माह में भी शासन के आदेशानुसार भक्त मां अष्टभुजी के दर्शन का लाभ भक्तों को नही मिल रहा है , माता रानी के मुख्य दरवाजा बन्द है  लेकिन भक्तों की आस्था , विश्वास का प्रतीक ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए हैं । मंदिर परिसर में केवल पुजारी ही माँ अष्टभुजी की पूजन कर रहे हैं । 2152 ज्योति कलश चैत्र मास व कुंवार मास के प्रज्वलित हैं । जहाँ पुजारी दशरथ गिरी , मनोज गिरी द्वारा मंदिर में पूजा अर्चना कर रहे हैं।  

बात करें मंदिर की तो मां अष्टभुजी की प्रतिमा ग्रेनाइट पत्थर की आदम कद मूर्ति है। आठ भुजाओं वाली मां दक्षिणमुखी भी है । इस संबंध में नगर के लोगों ने बताया कि पूरे भारत में कोलकाता की दक्षिण मुखी काली माता और छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा जिले के मालखरौदा ब्लॉक अंतर्गत नगर पंचायत अड़भार की दक्षिण मुखी अष्टभुजी देवी के अलावा और कहीं भी देवी दक्षिण मुखी नहीं है। सिद्ध जगत जननी माता अष्टभुजी का मंदिर दो विशाल इमली पेड़ के नीचे बना हुआ है।  आदम कद वाले काले ग्रेनाइट की दक्षिण मुखी मूर्ति के ठीक दाहिने और डेढ़ फीट की दूरी में देगुन गुरु की प्रतिमा योग मुद्रा में बैठी हुई प्रतीत होती है।  मंदिर परिसर में पड़े बेतरतीब पत्थर की बारीक नक्काशी देखकर हर आदमी सोचने पर मजबूर हो जाता है । प्राचीन इतिहास में 8 बार का उल्लेख अष्ट द्वार के नाम से मिलता है । अष्टभुजी माता का मंदिर और इस नगर के चारों ओर बने 8 विशाल दरवाजों की वजह से शायद इसका प्राचीन नाम अष्ट द्वार रहा और धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर इसका नाम अड़भार हो गया। 

 लगभग 5 किलोमीटर की परिधि में बसा यह नगर कुछ मायने में अपने आप में अजीब है। यहां हर 100 से 200 मीटर की खुदाई करने पर किसी न किसी देवी देवता की मूर्तियां सही सलामत ना सही लेकिन खण्डित स्थिति में जरूर मिल जाएंगे। आज भी यहां के लोगों को गृह निर्माण में न्यू खुदाई समय प्राचीन टूटी फूटी मूर्तियां यहां पुराने समय के सोने चांदी के सिक्के प्राचीन धातु की कुछ ना कुछ सामान अवश्य प्राप्त होते हैं।