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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सियासी हलचल: आगामी चुनाव की कवायद

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -सियासी हलचल: आगामी चुनाव की कवायद

-सुभाष मिश्र

देश के सियासी हलके में अभी महामारी के वायरस दिखलाई पड़ रहे हैं। कोरोना समय में आईसोलेशन में गई कांग्रेस ने मध्यप्रदेश को खोया है। यदि कांग्रेस में आवाजाही का संक्रमण यूं ही बढ़ता गया तो आने वाले दिनों में राजस्थान और पंजाब भी संक्रमित होकर कांग्रेस की सत्ता से दो गज की दूरी बना लेंगे। कांग्रेस को अपनी सत्ता के लिए कोई न कोई वैक्सिन के डोज खोजने होंगे ताकि उसकी पार्टी की इम्यूनिटी बनी रहे। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर अभी से राजनीति की बिसात बिछने लगी है। यूपी में अपने ही योगी आदित्यनाथ से जूझ रही भाजपा ने कांग्रेस में सेंध लगाकर जतिन प्रसाद के नाम से एक विकेट चटकर यह बताने की कोशिश की है, वह अगले साल के चुनाव को लेकर कितनी सजग है। कांग्रेस तो अभी इसका जवाब नहीं दे पाई, किन्तु तृणमूल कांग्रेस ने अपना घर भूले बड़े नेता मुकुल राय की भाजपा से वापसी कर बता दिया है, कि सत्ता का सुख छोडऩा किसी भी नेता के लिए आसान नहीं होता। सिंधिया के बाद नवजोत सिद्धु, सचिन पायलट, जतिन प्रसाद जैसे नेताओं के रंग-ढंग आगामी चुनावों को लेकर होने वाली सियासी कवायद का हिस्सा है। दल-बदल कानून को ठेंगा दिखाकर अब नेता एकमुश्त दूसरी पार्टी में चले जाते हैं या लाभ के आश्वासन पर इस्तीफा देकर अपने दल को अल्पमत में ला खड़ा करते हैं। कुछ लोग छत्तीसगढ़ में भी इस तरह का माहौल देखना चाहते हैं पर उनकी दाल कांग्रेस के प्रचंड बहुमत की वजह से गलती नहीं दिखती।

समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिंदा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं करती। दरअसल, लोहिया के इस कथन को भारतीय राजनेताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए था। बिना सत्ता के बहुतेरे नेता पांच साल तक इंतजार नहीं कर सकते। सत्ता सुख से वंचित नेता जो कहने को सत्ता के सेवक के रूप में सामने आये थे, अपने हित के लिए कभी भी, कहीं भी सत्ता सुख मिलने की गारंटी वाली पार्टी के साथ जाने को तैयार रहते हैं। जो लोग पार्टी छोड़ते समय नैतिकता और काम के अवसर नहीं मिलने की बात करते है, उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि जब तक आप पार्टी में थे, तब आपकी नैतिकता, कार्यक्षेत्र को किसने रोका था। आज जो लोग भाजपा के साथ गलबहियों करते हुए कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी कह रहे हैं, उनके बाप-दादा भी उसी पार्टी में सालों-साल रहकर अपने वैभव का विस्तार कर रहे थे।
भाजपा ऐसे राजकुमारों के लिए यह गाना गुनगुना रही है आ जा आई बहार, दिल है बेकरारी में, राजकुमार, तेरे बिन रहा न जाये।

वर्ष 2024 में लोकसभा के चुनाव है उसके पहले 2022 में उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा के चुनाव है। भाजपा को अपना वर्चस्व और सरकार बनाए रखने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाने पड़ेंगे जिसके चलते उसने कई राज्यों में बहुमत नहीं होने या कहे हारने के बाद भी अपनी सरकार बनाई है। अरूणाचल में 2014 में विधानसभा चुनाव होने के बाद वहां कि 60 विधानसभा सीटों में से 42 में कांग्रेस के विधायक जीते किन्तु आज वहां भाजपा की सरकार बनी। दोरजी खांडू जो कांग्रेस शासनकाल में मुख्यमंत्री रह चुके थे। भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री बने। इस समय 9 गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री पुराने कांग्रेसी है।
रहीम का दोहा-
चित्रकूट में राम रहे, रहिमन अवध नरेस।
जा पर बिपदा परत है, सो आवत यह देस।।

आज बहुत से नेता सीबीआई, इंकमटैक्स आदि की विपदा के चलते मोदीजी की शरण में है। मुकुल राय भी चिटफंड घोटाला के चलते ही भाजपा में गए थे, पर कब पश्चिम बंगाल में खेला होने के चलते लौट आए। अभी हाल ही में भाजपा की ओर से असम के मुख्यमंत्री बने हिमंता बिस्वा पहले कांग्रेस के कद्दावर नेता हुआ करते थे। तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी जो तीसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी हैं। वे भी पहले कांगे्रस में ही थी।

उत्तरप्रदेश जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने है और जो अपनी लोकसभा सीटों के जरिए प्रधानमंत्री के चुनाव में अहम भूमिका निभाता है। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को वहां की बागडोर सौंपी है। वहीं के कांग्रेस के बड़े नेता और राहुल गांधी के करीबी रहे जतिन प्रसाद ने बीजेपी की सदस्या ले ली। जतिन प्रसाद ने कहा कि मेरा कांग्रेस पार्टी से तीन पीढिय़ों का साथ रहा है। उनके पिता जितेंद्र प्रसाद को भी कांग्रेस का बड़ा चेहरा माना जाता था। उनका कहना है कि मैं जिस दल में था वहां रहकर महसूस किया कि यहां अपने ही लोगों की बात नहीं सुनी जाती है, जहां अपने ही लोगों की बात ना सुनी जाए और अपने ही लोगों के पार्टी काम न आ सके, तो ऐसी जगह काम करना उचित नहीं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एम वीरप्पा मोइली का मानना है कि कांग्रेस को बड़ी सर्जरी की जरूरत है और उसे सिर्फ विरासत पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। बल्कि नेताओं को जिम्मेदारी देते हुए वैचारिक प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देनी चाहिए। कांग्रेस को इन चीजों को लेकर पुनर्विचार करने और नए सिरे से रणनीति बनाना चाहिए और इसके बाद ही पार्टी मजबूत हो सकती है।
सत्ताधारी भाजपा जिसकी आज देश के अधिकांश राज्यों में सरकार है। जिसकी सदस्य संख्या ज्यादा है, जो एक कॉडर जैसी पार्टी कहलाती है। वह यदि अपने से अलग विचार रखने वाले दलों से नेताओं को अपने साथ ला रही है, तो उसके बारे में लोगों का कहना है कि भाजपा यह एक रणनीति के तहत कर रही है। जहां भाजपा खुद मजबूत नहीं है, वहां कांग्रेस समेत दूसरे दलों के नेताओं को अपनी ओर खींच रही हैं। इससे दो फायदे होते हैं, एक तो भाजपा मजबूत होती है। उसके पक्ष में माहौल बहनता है, वहीं दूसरी विपक्षी पार्टियां और कमजोर होती है।

जो भाजपा पूरे देश में कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को दोहराती रही है और उसका दावा है कि वह पूरे देश से कांग्रेस के शासन को उखाड़ फेंकेंगे, लेकिन अगर गौर से देखें तो पूरे देश में भाजपा कांग्रेसियों के सहारे जीत हासिल कर रही है। यानी कांग्रेस मुक्त भारत के चक्कर में कांग्रेस युक्त भाजपा बनती जा रही है।
पार्टी विथ डिफरेंस का नारा देने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आज कांग्रेस मुक्त भारत के लिए इतना बेकरार है कि उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ रहा है कि इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या फर्क पड़ रहा है। यूं तो भाजपा सदस्य के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के दावा करती है, लेकिन जीत के लिए उसे कांग्रेस से नेता उधार लेने पड़ रहे हैं। यानी संघ भाजपा के लिए उतने तेजी से नेता नहीं तैयार कर पा रहा है। किसी समय भाजपा के थिंक टैंक समझे जाने वाले एन गोविंदाचार्य ने कहा राजनीति दल आज सत्ता पाने का गिरोह बन कर रह गए हैं, दल-बदल इसी कुत्सित संस्कृति का रूप है।
दरअसल, समझदार नेता अवसर की तलाश में रहता है, जब उसे अपना लाभ और अपनी जीत का गणित दिखाई देता है तो वो कोई न कोई बहाना लेकर पार्टी या अपने ही दल भीतर अपनी निष्ठा बदल लेता है। बहुत सारे नेता अभी लाईन में हैं और सोच रहे है...
अभी तो खुश्क है मौसम
बरसात हो तो सोचेंगे..
हमें अपने अरमानों के बीज
किस मिट्टी में बोना है..।