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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है


प्रतिरोध करना परजीवी होना है। अन्याय, अत्याचार के खिलाफ लामबंद होना आंदोलनजीवी होना है। अपने आसपास को कुछ घटित हो रहा है, उसमें हस्तक्षेप करना क्या कतई ठीक नहीं है? हमने आपने यदि किसी ने आंदोलन में भाग लिया हो या उस पंडाल के पास से गुजरे हों तो हमने 'हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा जरुर सुना होगा। हमें बचपन में सिखाया जाता है कि जहां कहीं अन्याय, अत्याचार हो, अधिकारों की लड़ाई हो तो वहां हमें जरुर अपनी सहभागिता दिखानी चाहिए।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता है-
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।

हमारे देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी ने किसान आंदोलन के संदर्भ में राज्यसभा मेंं तंज कसा कि ऐसे लोग कभी वकील, कभी स्टूडेंट, कभी मजदूर आंदोलन में सक्रिय रहते हैं। कभी पर्दे के पीछे तो कभी आगे, ये पूरी टोली है आंदोलन नीतियों की। ये आंदोलन के रास्ते खोजते हैं, हमें ऐसे लोगों की पहचान कर देश को ऐसे आंदोलनजीवियों से बचाना होगा।

यदि हम अपने सीमित दायरे में रहकर किसी भक्त मंडली की तरह हर बात में हां-जी, हां-जी करते हैं तो हम इस देश के अच्छे नागरिक हैं। आत्मनिर्भर हैं, स्वावलंबी है, कथित बुद्घिजीवी हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते जो हम परजीवी, आंदोलनजीवी हैं। हमारे देश में आंदोलन की परंपरा बहुत पुरानी है। आज बहुत से नेता जेपी आंदोलन की उपज है। उसके बाद का नेतृत्व मंडल आंदोलन, अन्ना आंदोलन या किसी छात्र, किसान, महंगाई, राज्य निर्माण जैसे आंदोलन से आगे आया है। आंदोलन प्रतिरोध लोकतांत्रिक देश की जनता का संवैधानिक अधिकार हो कि एक नागरिक देश का सजग प्रहरी है,व्हिसल ब्लोअर है जो लोग अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सजग होते हैं, वे अपने आसपास के प्रत्येक मुद्दे, आंदोलन में हिस्सेदारी करते हैं।

संत कबीर का दोहा है-
कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ
जो घर फूंके आपनौ, चले हमारे साथ।

जो लोग जनहित के मुददें पर आंदोलन करते हैं, या आंदोलन का समर्थन करते हैं, उनके हिस्से में बहुत बार लाठी, जेल और पुलिस प्रशासन की प्रताडऩा आती है। यही वजह है कि बहुत सारे सुविधाभोगी लोग जिसकी सत्ता होती है उसके साथ खड़े दिखते हैं। उनका प्रिय दोहा है ''जैसी चले बयार पीठ को तैसी कीजिए। बहुत से आंदोलनकारी दूसरों का मांगों के समर्थन में अपना सब कुछ गंवा देते हैं। इसके ठीक उल्ट हमारे बड़े-बड़े राजनेताओं की सभा में लोग पैसे देकर, गाडिय़ां भेजकर बुलाए जाते हैं। बहुत बार तो सरकारी संसाधन यहां तक कि मनरेगा, आंगनबाड़ी आदि में काम करने वाले लोगों के जरिये भीड़ जुटाई जाती है। किसान आंदोलन में, निर्भया आंदोलन में आने वाले लोग किराये-भाड़े पर नहीं, अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर आये हैं। अब तक 170 से अधिक लोगों ने जान तक गंवा दी है।

अब तो श्रमजीवियों को भी परजीवी बनाने की कवायद जारी है। जो सत्ता के विरुद्घ अपना स्टैड ले वह परजीवी, आंदोलनजीवी बन जाता है और वही यदि राष्ट्रवाद की बात करके राजनीति करे तो देशभक्त, आत्मनिर्भर भारत का बेहतरीन नागरिक। प्रधानमंत्री जब अपने भाषण में आंदोलनजीवी और परजीवी जैसे पदों का इस्तेमाल करते हैं तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि सरकार अब लोकतंत्र में भरोसा नहीं रखती है, और सरकार अब चीन की साम्यवादी सरकार की तरह एकल दल की राह पर चल पड़ी है। अब सरकार को किसी भी तरह की असहमति और हस्तक्षेप नहीं चाहिए। वह भी चीन की तरह बाहरी दुनिया के लिए एक लौह दीवार तैयार करना चाहती है। देशद्रोही, आतंकवादी जैसे शब्दों के बाद सरकार ने अब अपने शब्दकोश में दो नए शब्द और चमकाए हैं, आंदोलन जीवी और परजीवी। ये शब्द जिस गंभीरता से कहे गए हैं उसके नतीजे गंभीर है, जो सामने आएंगे। यह शब्द इस भावी षड्यंत्र की भूमिका है, जो आंदोलन में शामिल लोगों को हतोत्साहित और समर्थन करने वालों को पराजित करने के लिए तैयार की गई है। चारण या गोदी मीडिया को इन नए शब्दों को दोहराने के लिए एक अवसर हासिल हो गया है, वे दिन-रात अब इन शब्दों की जुगाली करते रहेंगे और इन्हीं शब्दों की कै करते रहेंगे। इस तरह आंदोलन के समर्थन में आए बुद्धिजीवी और दूसरे सभ्रांत नागरिकों को संदिग्ध करार दिया जाएगा और उनके समर्थन को लगभग अपराध। यह तो स्पष्ट है कि सरकार का अर्थ इस समय सिर्फ  एक या दो व्यक्तियों से रह गया है, और उनके आसपास उनके चारण अफसर। देश इस समय कुछ लोगों की जिद और लोकतंत्र के प्रति उनकी घृणा के प्रति असीम आस्था से चल रहा है। यह कोई अच्छे आसार नहीं है। सरकार की यदि लोकतंत्र में आस्था नहीं है, तो आने वाला समय एक नए आपातकाल के लिए तैयार हो रहा है। असहमति अब अपराध हो रही है। किसी भी देश में आंदोलन का अर्थ लोकतंत्र के प्रति आस्था और अपनी बात सरकार के सम्मुख रखने का एक लोकतांत्रिक तरीका है, और इसके समर्थन में जो बुद्धिजीवी और सभ्रांत नागरिक सामने आते हैं वही लोग मिलकर आंदोलन को बड़ा और सफल बनाते हैं। गांधी जी ने भी इसी तरह से भारत छोड़ो आंदोलन को सफल बनाया था। पूरा देश उनके साथ जुड़ गया था, तो इस तरह देखा जाए तो गांधी जी के साथ पूरा देश आंदोलनजीवी था। देश में कोई भी संवेदनशील नागरिक किसी भी न्यायोचित आंदोलन से जुड़े बिना नहीं रह पाएगा, चाहे वह बौद्धिक स्तर पर हो, चाहे सीधे-सीधे उसकी भागीदारी आंदोलन में हो और यही एक अच्छे लोकतंत्र का परिणाम है। लेकिन इसे पराजित करने के लिए उसे परजीवी कहना समर्थन कारियों को सिर्फ  पराजित करना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के प्रति अपनी घृणा के नजरिए को स्पष्ट करना भी है। इस तरह देश दुनिया में अब तक जितने भी आंदोलन जनहित के लिए हुए हैं उन सबको संदेह के घेरे में खड़ा करना है और उसकी जनहितकारी भूमिका को नकारने जैसा काम होगा। खुद आज सत्तारूढ़ दल में स्थिति यह हो गई है कि कोई भी व्यक्ति लोकतंत्र के भ्रम में कोई प्रश्न नहीं पूछ सकता है, वरना वह भी तुरंत परजीवी कहलाएगा। कुछ चुनिंदा लोगों के सिवा सत्ता के अधिकांश मंत्री और सांसद जिस तरह हाथ जोड़कर समर्पण की मुद्रा में खड़े हैं, उससे तो लगता है कि लोकतंत्र का भविष्य कोई बहुत अच्छी राह की ओर नहीं जा रहा है।

कथाकार, लेखिका रोहिणी अग्रवाल अपनी फेसबुक वाल पर कहा है कि ''भारतीय संस्कृति में सबसे बड़े आंदोलनजीवी रहे हैं राम। जिन्होंने निजी लड़ाई लडऩे के लिए वानरों-भालुओं को संगठित किया। आंदोलन हर व्यवस्था का मेरुदंड है। लिंकन आंदोलनजीवी न होते तो क्या दास प्रथा समाप्त हो पाती। राजा राममोहन राय आंदोलनजीवी न होते तो क्या स्त्रियों को अधिकार मिल पाते। गांधीजी आंदोलनजीवी न होते तो क्या हम स्वतंत्रता हासिल कर पाते। आंदोलनजीवी जड़ता और यथास्थितिवाद का नागपाश तोड़कर विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आंदोलनजीवी होंगे तो हमारी लोकतांत्रिक चेतना और नागरिक अधिकार बचे रहेंगे। 

एक मई को मनाया जाने वाला मजदूर दिवस का इतिहास इस बात का गवाह है कि मजदूरों ने 12 घंटे के काम की अवधि 8 घंटे करने और अपने अधिकारों के लिए एकजुटता दिखाई, जिसका फायदा पूरी दुनिया के  मजदूरों को मिला। देश का किसान नहीं चाहता कि वह कारपोरेट के सामने याचक बनकर खड़ा रहे, इसलिए वह अपने आत्मसम्मान अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है। किसान की इस लड़ाई में जो भी उसके साथ है, वे आंदोलनजीवी, परजीवी नहीं बल्कि अन्याय, अत्याचार, शोषण के खिलाफ खड़े सैनिक हैं, जिन्हे सलाम किया जाना चाहिए।