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पेंशनरों का मामलाः 20 वर्षों में छत्तीसगढ़ को अरबों का नुकसान

पेंशनरों का मामलाः  20 वर्षों में छत्तीसगढ़ को अरबों का नुकसान

 जिम्मेदार मुख्य सचिव सहित अन्यों पर कार्यवाही की मांग

 धारा 49 को हटाने तथा सेंट्रल पेंशन प्रोसेसिंग सेल को रायपुर लाने की जरूरत 

रायपुर, 6 जनवरी। राज्य के पेंशनरों की समस्याओं को लेकर भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री एवं छत्तीसगढ़ राज्य सँयुक्त पेंशनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव ने मुख्य सचिव सहितं अन्य जिम्मेदार ब्यूरोक्रेसी पर कार्यवाही की मांग करते हुये आरोप लगाया है कि पेंशनरों के मामले में मध्यप्रदेश सरकार पर आर्थिक निर्भरता के बाध्यता के लिये ब्यूरोक्रेसी की लापरवाही जम्मेदार है और ब्यूरोक्रेसी द्वारा राज्य विभाजन के इन 20 वर्षो में मध्यप्रदेश के लगभग 5 लाख पेंशनरों को छत्तीसगढ़ सरकार के खजाने से भुगतान में अरबों रुपये के हुए नुकसान से अंधेरे में रखने को आश्चर्य जनक निरूपित किया है। उन्होंने पेंशनरों की आर्थिक दुर्दशा पर ब्यूरोक्रेसी के साथ साथ सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो को चिन्ता नहीं होने को दुर्भाग्यजनक जताते हुये उन्होंने छत्तीसगढ़ निर्माण के 20 वर्षों बाद भी राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 49 को हटाने तथा सेन्ट्रल पेंशन प्रोसेसिंग सेल को रायपुर लाने में आज तक ध्यान नहीं देने पर चिन्ता जाहिर किया है।

इन सभी मामलों पर मुख्य सचिव और ब्यूरोक्रेसी ही मुख्यरूप से जिम्मेदार है।इसलिए जिम्मेदारी तय कर छत्तीसगढ़ सरकार को उन पर कार्यवाही करनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह के मामलों पर पुनरावृत्ति न हो।

भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री एवं छत्तीसगढ़ राज्य संयुक्त पेंशनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष वीरेन्द्र नामदेव के साथ फेडरेशन के घटक संघ से प्रगतिशील पेंशनर  कल्याण संघ के प्रांताध्यक्ष ए एन शुक्ला, पेंशनर एसोसिएशन छत्तीसगढ़ के प्रांताध्यक्ष यशवन्त देवान तथा भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ छत्तीसगढ़ प्रदेश के प्रांताध्यक्ष जे पी मिश्रा आदि ने आगे बताया है कि दोनो राज्यों के बीच  पेंशनरी दायित्व का बंटवारा नही होने से पेंशनरों को मिलनेवाली आर्थिक मामले मध्यप्रदेश के सहमति के बिना लटकी हुई है,चाहे महंगाई राहत का मामला हो या छटवें और सातवें वेतनमानों का एरियर हो अथवा सेवानिवृत्त उपादान की रकम, ये सभी दोनों राज्यों में आपसी सहमति नही होने से भुगतान नहीं हो रहा है। इसी तरह पेंशनरों प्रकरण में कोष लेखा एवं पेंशन से पीपीओ जारी होने के बाद अंतिम जांच के लिये सेंट्रल पेंशन प्रोसेसिंग सेल स्टेट बैंक गोविंदपुरा भोपाल शाखा को भेजा जाता है, जहाँ दोनो राज्यों के प्रकरणों की अधिकता होने के कारण कई महीनों के बाद जांच प्रक्रिया पूरी होती है और पेंशन नही मिलने में देरी से आर्थिक और सामाजिक शोषण के शिकार बन रहे हैं।

उन्होंने कहा कि पेंशनरों की समस्याओं पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो की बेरुखी है, क्योंकि जब भाजपा की सरकार रही तो उन्हें बार बार अवगत कराने के बाद भी इस पर ध्यान नहीं दिया गया और अब लगभग 2 साल से राज्य के सत्ता में काबिज कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री और जिम्मेदार अधिकारियों से लगातार चर्चा, ज्ञापन और धरना,प्रदर्शन आदि के माध्यम अवगत कराने बाद भी स्थिति जस के तस बनी हुई है। 

जारी विज्ञप्ति में खुलासा किया है कि धारा 49 को हटाकर पेंशनरी दायित्व का बंटवारा आपस में नहीं होने के कारण नियमों के तहत 74 प्रतिशत राशि का भुगतान मध्यप्रदेश सरकार को और 26 प्रतिशत राशि का भुगतान छत्तीसगढ़ सरकार को मध्यप्रदेश के 05 लाख और छत्तीसगढ़ के 01लाख पेंशनरों इसतरह कुल 6 लाख से अधिक पेंशनर और परिवारिक पेंशनरों मिलकर करना होता है इसके लिए दोनों राज्य सरकारों में आपसी सहमति नहीं होने पर कोई भी भुगतान करना सम्भव नहीं हैं और इसी भुगतान के खेल में छत्तीसगढ़ सरकार को इन 20 वर्षों में अरबो रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। जो लगातार जारी हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुये बताया है कि प्रत्येक पेंशनर को नियमानुसार 74% राशि मध्यप्रदेश द्वारा और 26%राशि छत्तीसगढ़ द्वारा दिया जाना है अर्थात 100 रुपये में 6 लाख पेंशनर को  मध्यप्रदेश 74%और इन्हीं सभी पेंशनरों को 26% छत्तीसगढ़ सरकार के खजाने से देने पड़ेंगे। हिसाब लगाने पर इसमें मध्यप्रदेश को 44 करोड़ 44 लाख व्यय करना पड़ेगा और छत्तीसगढ़ सरकार को 1करोड़ 56 लाख व्यय  होगा।परन्तु यदि मध्यप्रदेश अपने 5 लाख पेंशनर को 100 % भुगतान करता है उसे 5 करोड़ और छत्तीसगढ़ सरकार अपने 1 लाख पेंशनरों के केवल 1 करोड़ खर्च करने होंगे। इसतरह केवल 100 रुपये के भुगतान में ही छत्तीसगढ़ शासन को 56 लाख रुपए का नुकसान हो रहा है। इसीलिए मध्यप्रदेश सरकार जानबूझकर 20 साल से पेंशनरी दायित्व को टालते आ रही है।

इसी तरह सेन्ट्रल पेंशन प्रॉसेसिंग सेल (cppc) स्टेट बैंक गोविदपुरा भोपाल में दोनो ही राज्य के पेंशन प्रकरणों का अंतिम निराकरण करने का काम होता हैं और एक अकेले शाखा में दोनो राज्यों के काम निपटाने में अनावश्यक देरी होना स्वाभाविक है,इसलिए छत्तीसगढ़ राज्य में पृथक सेल की स्थापना की बहुत जरूरत पर भी चिन्ता नहीं है।जानकारी मिली हैं कि छत्तीसगढ़ शासन के खजाने से भोपाल स्टेट बैंक को भी प्रोसेसिंग शुल्क के रूप में रकम का भुगतान करना होता हैं। 

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश आपसी सहमति के नाम पर पेंशनरों के साथ खिलवाड़ कर रहे है और 20 वर्षों से लंबित इस दोनो मामले को जानबूझकर टाल कर आर्थिक लाभ से वंचित कर रहे हैं।