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एक अस्त-व्यस्त-सा कोमल कलाकार : ठहरी स्मृतियों में झिलमिलाएँगे कल्याण दा

एक अस्त-व्यस्त-सा कोमल कलाकार : ठहरी स्मृतियों में झिलमिलाएँगे कल्याण दा

 

 राजेश  गनोदवाले

May be an image of 1 personगाँधी चौक के ठीक सामने रँगमन्दिर परिसर की ब्रिटिश कालीन पुरानी इमारत के बगल से गुज़रने के दौरान सुबह-शाम सिने धुनों की स्वरावलियाँ सुनाई देती थीं। ये कल्याण दा थे जो आँगन में बैठकर सृजनरत रहा करते थे। लुँगी-कुर्ते में मोहक मुस्कान के साथ कभी अकारण तो कभी कारण सहित धुनों की पड़ताल में खोए रहने वाले कल्याण दा अब कभी दिखाई नहीं देंगे! कोरोना से कल्याण दा ने भी हार मान ली! पता नहीं ये कोरोना की जीत है या कुछ और! उसकी फेहरिस्त बढ़ती जा रही है– और हमारे आसपास के लोग कम से कमतर..!! उसी कम होते अपनों में एक नाम और दर्ज हो गया! दूसरे अनजान लोगों की तरह कल्याण दा के जाने की भी कैसे भरपाई होगी? हो नहीं सकती। जाने का कोई समय नहीं था , लेकिन वे चले गए! ठीक उसी तरह  जिस तरह अचानक वे कहीं भी जाने का प्रोग्राम बना लेते थे तो उसे बदलने का लाख कह कर देखें , वे अपनी ज़िद से बाहर आ जाएं-ऐसा कम ही होता था। 

निधन की सूचना के साथ ही परिचय के तीन दशक एक झटके में सामने आ-जा रहे हैं। जबकि ना तो मैं उनका शागिर्द रहा ना सिनेमा मेरी रुचि का इलाक़ा। अलबत्ता उनके माता-पिता से कमलादेवी संगीत महाविद्यालय का छात्र होने के नाते एक अपनत्व था जिसने बाद में दोनों भाइयों से  रिश्ते बढ़ा दिए।

भारतीय सिनेमा की दृश्यात्मक प्रभावशीलता पर लिखने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे। प्रकाशित किताबें भी ढेर सारी माजूद हैं, लेकिन उसके सांगीतिक प्रभाव पर काम करने वाले, ठिकाने का काम करने वाले उंगलियों पर भी नहीं समाते! लेखक बन कर एकाँगी, अनुभव-शून्य विवरण या बायोडाटा किताबें लिखने वालों की बात नहीं की जा रहीं। कल्याण दा लेखक नहीं थे। अलबत्ता सहज सम्प्रेषण वाली भाषा के धनी थे। उनका जीवनानुभव इस कदर सघन था कि उस सघनता की काट के लिए उनके सामने आपको संगीत में उतना ही अनुभव समेटकर मैदान में उतरना होता। 

भारतीय सिनेमा के संगीत और रिकॉडिंग की बातें  

इसे ध्यान में रखकर कोई किताब उन्हें लिखनी चाहिए। मेरा यह आग्रह इसी फरवरी में ही उन्होंने मान लिया था। यक़ीनन सिने गीतों की रिकॉर्डिंग में हासिल अनुभव और उस दौर की बातों पर जब उनकी धाराप्रवाह टीकाएँ चलतीं तो जैसे वो काल एक के बाद एक झिलमिलाने लगता था! जो लोग कल्याण दा के क़रीब रहे हैं वे इस तथ्य को जानते हैं कि उनकी सिने संगीत वाली समझ-रेंज कितनी व्यापक थी। समझ को सतह पर स्थापित करना दुष्कर होता है! कल्याण दा, इस मामले में बेहद पारदर्शी थे। नतीजा देने का आग्रह इतना प्रबल कि एक मिशन पूरा होने के दौरान आप उनसे दूसरे,तीसरे प्रोजेक्ट्स पर भी सलाह-मविरा कर लें। उनका काम, उनकी बातें और उनके वे रँगीन चुटकुले…!!! जैसे अब सारा कुछ उनके न होने से एक जगह जाकर ठहर-सा गया हो!


प्रतिभा से भीगा हुआ आदमी। अपनी ही धुन में मस्त, एक कोमल हृदय कलाकार। जितना मस्तमौला, लापरवाह भी उतना ही।  हर मोर्चे पर आगे बढ़ने को लेकर पुनर्विचार करने वालों में से कतई नहीं। ज़िद की हद तक जुनूनी। पुनर्विचार ना करना ही, इस दफ़ा दुखदाई बन गया! अभी दो रोज़ पहले वे मुंबई से एक रिकॉडिंग करवा कर लौटे। जाते हुए सूचना दी कि मैं 5 को लौट जाऊँगा। अगली कुछ योजनायों पर फ़िर बात करेंगे। जब देश में कोरोना का कहर दोबारा फ़न उठाए फुफकार रहा है तब मुम्बई,वह भी ट्रेन से? ऐसा पूछने का साहस नहीं हुआ। अलका याग्निक के साथ किसी रेकॉर्डिंग की बात बताई थीं। अगर कहता तो भी क्या वे रुकने वाले थे? वे तो तब भी नहीं मानें जब भारी भीड़ के मध्य क्रिकेट देखने स्टेडियम निकल गए! अपनी डोलती काया के साथ गाड़ी दूर खड़ी कर पैदल स्टेडियम जाने की बन्दिश उन्हें मंज़ूर थी! कहीं से टिकट जुगाड़ करवा दो? इसे लेकर बच्चे की तरह उनकी ज़िद से फोन पर गुज़र चुका था। 

दादा मत जाइए? नहीं देखेंगे तो होगा क्या?  

लेकिन कॉलेज समय में रणजी खेल चुका यह कलाकार क्रिकेटर जैसे-तैसे मैदान में दो मैचों में मौजूद रहा! इतना ही क्यों, जनाब वहाँ से लाइव भी कर रहे थे! थका चेहरा, आँखों में पनैलापन, आवाज़ में कम्पन! लेकिन वाह रे शौक! कल्याण दा जाकर ही मानें। सोचिए ज़रा, अब कोई भला उनसे अलका याग्निक के साथ रेकॉर्डिंग कैंसल करने कैसे कहे? और जिसका मूल काम ही वही हो, कैसे मान लेगा? फ़िर इस बार तो, बक़ौल कल्याण दा, 

--”राजेश, लता दीदी से मिलने की संभावना भी बना ली है मैंने! लौटता हूँ फ़िर पाकिस्तान का हिंदी काव्य की प्रस्तुति को लेकर अपन स्क्रिप्टिंग के लिए बैठ जाएँगे !” 

हमारा आंखरी संवाद बस इतना ही हुआ था।

-- “राजेश, इच्छा है उसका एक शो दिल्ली और एक मुम्बई में करें।“  


दादा, ये तो और भी अच्छा होगा। आज़ादी के 75 वर्ष प्रसंग पर हमें इसे तयार करते हैं। सुझाव उन्होंने गदगद होकर माना। इसी के साथ मराठी की रचनाओं को स्थानीय गवैयों से तयार करने का एक  स्वप्न भी उनके भीतर था। विशेषतः ह्र्दयनाथ मंगेशकर और श्रीनिवास खले की बंदिशें। अब सब ख़त्म, सारा कुछ एक कल्पना लोक बन गया। कौन है जो उनके प्रॉजेक्ट्स को आगे बढ़ाएगा? और किसमें इतनी सर्जनात्मकता है? वे दो भाई थे। छोटे भाई और उनके मध्य रचनात्मक मतभेद उतने नहीं थे जितने पारिवारिक आर्थिकी को लेकर ! अपने छोटे अनुज शेखर सेन से उनका लाख मनमुटाव के बावजूज़ वे उनके एक पात्रीय प्रयोग वाले गुण की प्रशंसा में कभी कंजूसी बरतते हों ऐसा देखने नहीं मिला। जबकि कम्पोज़र और गायक के रूप में कल्याण दा की रेंज शेखर सेन के मुक़ाबले अधिक व्यापक और उसमें स्वीकार्यता भी थीं। अपेक्षाकृत पतली और मुलायम आवाज़ थीं उनकी, जैसे प्रार्थना का कोई स्वर हो! जबकि वे थे बुनियादी रूप से तबला वादक। रागदारी बाकायदा उन्होंने सीखी थीं। जब मुंबई दाखिल हुए तो वेस्टन नोटेशन पद्धति को भी समझा। 

बातचीत कभी भी उनसे हो, विषय कोई भी निकले, घूम फ़िर कर स्वयं को छले जाने का विषय वे ले ही आते थे! छले तो वे बार-बार जाते रहे। नये गायकों की तलाश कर उन्हें गंवाना उनकी पहली प्राथमिकता जैसा था। पैसों के पीछे भागते कभी भी नहीं देखा। जितना मिल गया, रख लिया ।सहजता का एक ही उदाहरण काफ़ी होगा। दो साल पहले का रायपुर का ही घटनाक्रम है। अनूप जलोटा की महफ़िल के लिए अपना हारमोनियम खुद उठाकर उनके रूम में देने चले गए। और जलोटा जैसे कलाकार मुम्बई से बग़ैर हारमोनियम लिए गाने इसीलिए चले आए कि इतना वजन उठाकर कौन घूमें! जबकि कोई गायक बग़ैर हारमोनियम लिए किसी शहर में गाने चला आए-  यह सुनना ही संगीत के बुनियादी पैरामीटर से मेल नहीं खाता! 

दो राय नहीं कि वे सही मायनों में भावुक थे। इसका उन्हें नुकसान भी हुआ। पिता के ही कहने पर एक समय मुम्बई से विदाई लेकर कमलादेवी संगीत महाविद्यालय-रायपुर में प्राचार्य का पद स्वीकार कर लिया! जबकि प्रशासनिक मामलों के लिये उनकी ऊर्जा नहीं बनी थीं! बाद में अज्ञात कारणों से अलग भी हो गए। काफ़ी पुरानी बात है पिता की सलाह पर अपने संगीतकार बैनर में नई सम्भावनाएं तलाशने अरुण कल्याण नाम से नया परिचय स्वयं का देना शुरु किया था। वे यक़ीनन एक कोमल ह्रदय इंसान थे। जिनके भीतर व्यावसायिकता ने पैर नहीं जमाए! इसी वजह उनके गले में कोई बात थी। जिस दर्जे का कंपोज़िंग सेंस था उसके अनुपात में पैसों के लिए कभी भी ज़िद नहीं की। कभी-कभी इतनी बार भातखण्डे ललित कला शिक्षा समिति पुराण दोहराते कि कोफ्त होने लगती थीं। लेकिन उनका कोमल ह्दय ही था जो उनसे जोड़े रखे रहता था। 

सन 1960 के बाद के संगीत पर उनसे बात करें। सारा कुछ ज़बानी। 20 हज़ार गानों की तो सूची बैंक उन्होंने बना रखी थीं। जब किसी थीम के साथ कोई प्रोग्राम प्लान करते तो उनका अनुभव मानो झरने लगता था। शंकर-जयकिशन के संगीत में ग्रुप वायलिन का इस्तेमाल और मदन मोहन के साथ रईस खां के होने से लता की गायिकी को मिलने वाला अतिरिक्त उजाला। ज्ञान-सूचनाओं का उनके पास असीमित स्टॉक था। वे पंचम दा के साथ भी सहायक के रूप में जुड़े रहे। मोहम्मद रफ़ी, मन्नाडे की कितनी रिकॉडिंग के साक्षी। ख़ुद भी मोहम्मद रफी के साथ कुछेक गीतों की रिकॉर्डिंग में बतौर तबला वादक शामिल रहे। रवींद्र जैन ने एक बार सेन साहब के घर-परिसर में आयोजित महफ़िल के बाद मेरी एक जर्नलिस्टिक जिज्ञासा सुलझाते कहा था , 

“उनका गाना जितना रिफाइन कर के कल्याण सेन गाते हैं उतना दूसरा कभी किसी ने नहीं गाया!”  

कम लोगों को यह तथ्य पता होगा कि अपने सांगीतिक जीवन के आरम्भ में  कल्याण दा छोटे भाई के साथ मिलकर ऐसे प्रोजेक्ट्स गाए जिसकी ओर इसके पहले, इस नजरिए से किसी ने देखा नहीं था! संघर्ष के दौर की छोटी-छोटी बढ़त के मध्य दुष्यंत ने कहा था , यह वो महफिल थीं जिसने  दोनों भाइयों की रेंज पर मुहर जड़ दी। कलमेश्वर जैसे बड़े नाम ने 80 के दशक में धर्मयुग में एक बड़ा कवरेज़ दिया तो हिंदी समाज चौंक उठा कि दुष्यंत में गेयता भी निकाली जा सकती है। बाद में मध्यकालीन सन्त कवियों की रचनाएँ, मीरा से महादेवी तक जैसे कितने काव्यात्मक नवाचार जो दूसरे किसी संगीतकारों के सोचने का दायरा भी बन नहीं सका था, दोनों भाइयों की साझा उड़ान बनें। रचनात्मक रूप से तो इनकी लोकप्रियता थी लेकिन कॉमर्शियल मंज़िल फिल्मों में संगीत देने की चाह थीं। वहां अलबत्ता वे कामयाब नहीं हो सके। बाद में परिस्थितियों ने दोनों भाइयों की राहें अलग लिख दीं! 


कल्याण दा ने बतौर कम्पोज़र अपना दायरा बढ़ाए रखा। कितनी हस्तियाँ हैं जिन्हें उन्होंने गवाया। यदि अलका याग्निक, साधना सरगम, अनुराधा पौडवाल, कविता कृष्णमूर्ति, से लेकर उषा मन्गेशकर हैं तो लता मंगेशकर भी उनकी फेहरिस्त को गौरव देती हैं। पुरुष गायकों में भी स्व.हरिओम शरण,सुरेश वाडकर, अनूप जलोटा, रूपकुमार राठौर,  संजीव अभयंकर, सहित अनजानी नई प्रतिभाएं कितनी हैं। उन्हें ऑरकेस्ट्राइज़ेशसन में महारत हासिल थी। इसी शहर में ग्रुप वायलिन का परिचय पहली दफा उन्हीं के माध्यम से देखने मिला। सिने सँगीत की कोई न कोई हस्तियां उनके आमंत्रण पर रंगमदिर परिसर में थोड़ा समय बिताया करती थीं। इसी फरवरी महीने की 22 तारीख़ को वे आंखरी दफ़ा मंच पर देखे गए थे। लता जी ने अपने जीवन का पहला और आंखरी छत्तीसगढ़ी गीत कल्याण सेन के संगीत में उषा मंगेशकर के साथ मिलकर 22 फरवरी को ही गाया था । उस प्रसंग-तिथि की महत्ता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने स्वयं की मेहनत और अपने सेंटपॉलियन मित्रों के सहयोग से उस दिन फिर ऐसे गानें चुने जिनमें रागों की छटा दिखाई देती है। अजीब इत्तफाक है कि वही उनके जीवन का आंखरी शो साबित हुआ। ना ही लता जी ने उसके बाद कोई फ़िल्म रिकॉडिंग की। यादें हैं अब उनकी।

हारमोनियम भी उनका अब उदास होगा!