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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-अभी शादी की उम्र एक हुई है, बहुत कुछ बाकी है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-अभी शादी की उम्र एक हुई है, बहुत कुछ बाकी है

मोदी सरकार ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र लड़को की ही तरह 21 वर्ष करने का फैसला ले लिया है। अभी तक शादी के मामले में लड़को की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों की उम्र 18 साल थी। हमारे देश में किसी को भी बालिग कहे जाने की उम्र 18 साल है। लड़कियों के विवाह की उम्र में यह बदलाव 43 साल बाद आया है। वर्ष 1978 में लड़कियों के विवाह की उम्र 15 साल से बढ़ाकर 18 साल की गई थी। इसके पहले 1929 के शारदा एक्ट के अंतर्गत लड़कियों की शादी की आयु 15 वर्ष थी। दरअसल हमारे भारतीय समाज में लड़कियों के पूरे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण शादी को माना गया है। लड़की के पैदा होने के साथ ही उसकी शादी की चिंता, उसे अच्छा वर मिले इसके लिए तरह-तरह के व्रत उपवास, लड़की के विवाह के लिए दहेज की चिंता माता-पिता के लिए सबसे बड़ा उपक्रम है। लड़की का मासिक धर्म शुरू होते ही बहुत से माता-पिता कथित सुरक्षा के नाम पर लड़की का विवाह करके पति के हवाले कर देना चाहते हैं। हमारे देश में अभी भी बाल विवाह का चलन है। सरकार को अभियान चलाकर अक्षय तृतीया जैसे त्यौहार पर इस तरह के सामूहिक बाल विवाह को रोकना पड़ता है। 

2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की 2.3 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष तक पहुंचने से पहले ही कर दी जाती है। इस मामले में देश के गांवों की स्थिति शहरों के मुकाबले ज्यादा खराब है। गांवों की 2.6 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी जाती है। वहीं शहरों की 1.6 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष तक पहुंचने से पहले हो जाती है।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2020 में लड़कियों के विवाह की उम्र 21 वर्ष किए जाने की घोषणा लालकिले से की थी। लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र क्या होनी चाहिए, इस पर जया जेटली की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था। 10 सदस्यों की टास्क फोर्स ने जाने-माने स्कॉलर्स, कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों के नेताओं से सलाह ली थी। लड़कियों की शादी की उम्र में वृद्धि करने का सीधा फायदा देश की करीब साढ़े 4 करोड़ से ज्यादा लड़कियोंको होगा. 2011 में हुई जनगणना के हिसाब से देश में 18 वर्ष के उम्र की करीब 1 करोड़ 29 लाखलड़कियां हैं. करीब 1 करोड़ लड़कियों की उम्र 19 साल है जबकि करीब 1 करोड़ 39 लाखलड़कियों की उम्र 20 साल है. देश में 21 वर्ष की करीब 1 करोड़ 94 लाख से ज्यादा लड़कियां हैं।

सरकार द्वारा लड़कियों के हित में लिए गए इस फैसले से उन लड़कियों को फायदा होगा जिनकी शादी कम उम्र में कर दी जाती थी। शादी की उम्र कम होने से, कम उम्र में लड़कियां मां बनती हैं, जिससे मां और बच्चे की सेहत पर काफी बुरा असर पड़ता है। कम उम्र में शादी होने से मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर बढ़ जाती है। कम उम्र में शादी होने से लड़कियों की शिक्षा और जीवन स्तर परभी बुरा असर पड़ता है।

हमारे देश का सामाजिक ढांचा पुरूष प्रधान व्यवस्था का पोषक है। आज भी बहुत सी महिलाएं पूरीतरह से आजाद नहीं है। देश की आधी आबादी को जो हक, हिस्सेदारी, हुकूमत मिलनी चाहिए थी वह अभी तक हासिल नहीं हो पाई है। लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने के बावजूद यदि हम अपने सामाजिक ढांचे को देखें तो हमारी पुरुषवादी मानसिकता में कोई खास बदलाव नहीं आया। अभी लड़कियों को कई स्तरों पर पुरुषों की बराबरी हासिल नहीं हुई है। देश की गिरती जीडीपी और आर्थिक स्थिति के बीच औसत दर्जे का बुद्घिवाला भी जानता है कि जिस चीज की मांग ज्यादा और पूर्ति कम हो उस चीज के दाम ज्यादा होते हैं। हमारे देश में पुरुषों की तुलना में औरतों का प्रतिशत कम होने के बावजूद दहेज में लड़की वालों को ही सब कुछ देकर भी झुकना पड़ता है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 1901 में 1000 पुरुषों की तुलना में 972 महिलाएं थीं। अभी हाल ही में आये आकड़ों में महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में बढ़ा है जो एक अच्छा संकेत है। 

महिलाओं के हक में जब भी कोई फैसला आता है तो मेरे जैसे बहुत से लोग जो महिला-पुरुष को बराबरी के नजरिये से देखते हैं, खुश होते हैं। पूरी दुनिया की आधी आबादी जिससे दुनिया में रौनक है, जो पूरे परिवार को, घर को एक सूत्र में बांधे रखती है, उसे उसका वाजिब हक मिले, यह जरूरी है। महिला सशक्तिकरण को लेकर देश में बहुत से निर्णय हुए हैं, योजनाएं आई है, कानूनों में संशोधन किये गये हैं, किन्तु इन सबके बावजूद हमारे देश की अधिकांश महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक मानी जाती हैं। घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम की, काम की गिनती उस तरह से नहीं होती जैसे कि एक घर से बाहर काम करने जाने वाले पुरुष के काम की गिनती होती है। एक घरेलू महिला एक दिन में 16 से 18 घंटे काम करती है। जब महिला और पुरुष के बीच मजदूरी देने की बात आती है, तो सामान्यत: महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है। 8 मार्च को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है और 15 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस। 15 अक्टूबर 2008 से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की भूमिका को अलग से रेखांकित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। हमारे देश के ग्रामीण समाज में 90 प्रतिशत महिलाएं खेती पर निर्भर हैं। असंगठित क्षेत्र में 98 प्रतिशत महिलाएं काम करती हंै। यूं तो क्या शहर, क्या गांव सभी जगह महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी और सुरक्षित नहीं है। जहां कहीं भी महिलाएं अर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित और मजबूत नहीं है, वह चाहे घर हो, परिवार हो, समाज हो या देश में सभी जगह महिलाएं शोषण की शिकार हैं। महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार हमारी सोच, हमारी शिक्षा और हमारी सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर है।  

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तरप्रदेश चुनाव के बीच लड़की हूं, लड़ सकती हूं नारे देते हुए विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का ऐलान किया है।

हमारे देश में जेंडर के प्रति हमारी सोच का नजरिया यह है कि पुरूष की नकल करने वाली स्त्री को कमोडिटी मानकर उन्हें अपीलिंग या सेक्सिस्ट माना जाता है। संवैधानिक रूप से स्त्री बिल्कुल पुरूष के बराबर है, लेकिन वास्तविक जीवन में, उसकी वह स्थिति नहीं है। स्त्री मुक्ति पर बात करना, स्त्री मुक्ति की कामना करने की मतलब होता है, परिवार या पति से अलग तरह की स्वतंत्र सोच। पुरूषवादी व्यवस्था से बाहर सोचकर काम करने वाली स्त्री के प्रति समाज का रवैय्या खाप पंचायतों के फैसले की तरह या घर परिवार के भीतर कथित संस्कार परंपरा के नाम पर लिए जाने वाले फैसले की तरह स्त्री विरोधी होते हैं। स्त्रियों के समान अधिकार की लड़ाई हमारे यहां काफी पुरानी है। यदि हम पंडिता रमाबाई द्वारा लिखित किताबें हिन्दू स्त्री का जीवन किताब पढ़े तो हमें पता चलेगा कि यह शिक्षित विद्रोही, पितृसत्ता की कटु आलोचक रमाबाई 1870 के नागरिक समाज में बड़े विस्फोट के रूप में मौजूद रही। रमाबाई ने हाई कास्ट हिन्दू वूमेन नाम से किताब लिखकर भारतीय स्त्री की दशा की ओर तत्कालीन समाज का ध्यान आकृष्ट किया था। हमारे देश की महिलाओं की पतनशील स्थितियों को सुधारने के उद्देश्य से रमाबाई ने पूना में स्त्रियों की एक संस्था खोली जिसे आर्य महिला समाज नाम दिया गया।

आजादी के बाद स्त्रियों को समान अधिकार दिलाने के संघर्ष में बाबा साहेब आंबेडकर ने केन्द्रीय मंत्री मंडल से इस्तीफा तक दिया। महिलाओं के संघर्ष की कहानी में 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की समीक्षा करना, महिला उत्पीडऩ संबंधी शिकायतों का समाधान ढूंढना और सरकार को महिलाओं से जुड़ी नीतिगत समस्याओं पर परामर्श देना। कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में विशाखा केस के जरिये विशाखा दिशा-निर्देश जारी कर कार्यस्थल पर महिलाओं से किसी तरह की छेड़छाड़ को मौलिक अधिकारों के हवस का अपराध करार दिया। पंचायती राज अधिनियम के जरिये महिलाओं को त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण दिया गया। महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह बहुत महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। इन सबके बावजूद आज भी चाहे सरकारी दफ्तर हो या कारपोरेट के ऑफिस या ग्लैमर की दुनिया सब जगह स्त्रियों के साथ छेड़छाड़, दैहिक शोषण के किस्से आम हैं। हमारे यहां स्त्री की ना को ना नहीं समझा जाता।

हमारा संविधान, हमारे कानून और हमारी धार्मिक परंपराओं, हमारी बातों में महिलाओं के लिए पर्याप्त सुरक्षा सम्मान है किंतु हमारे सामाजिक जीवन में इसके ठीक विपरित आचरण है। कभी निर्भया कांड तो कभी हैदराबाद कांड के रूप में महिलाओं के साथ क्रूरता होती है। अभी हाल ही में बुलंद शहर में देश की होनहार बेटी सुदीक्षा जिसे अमेरिका में चार करोड़ की स्कॉलरशिप मिली थी, से हुई छेड़छाड़ की घटना में उसकी जान चली गई है। इसी तरह दिल्ली में एक बच्ची से अस्पताल में हुई घटना बताती है कि हमारे यहां लोगों की सोच कैसी है। ये सोच बदलनी होगी और बदलेगी भी। अब लड़कियां किसी भी क्षेत्र में किसी से कम नहीं हैं।

भारत में बाल विवाह के मामले 50 प्रतिशत तक बढ़े हैं। बाल विवाह यानी 18 वर्ष से कम उम्र मेंशादी हो जाना है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2020 में बाल विवाह के 785 मामले दर्ज किए गए थे। ये आंकड़ा वर्ष 2019 के मुकाबले 50 प्रतिशत अधिक था। साल 2019 मेंबाल विवाह की 523 शिकायतें आई थीं। बाल विवाह के सबसे ज्यादा केस कर्नाटक में दर्ज किएगए हैं, पिछले 5 सालों की रिकॉर्ड देखें तो 2015 से 2020 तक बाल विवाह की शिकायतों मेंबढ़ोतरी हुई है। 2015 में बाल विवाह के 293, 2016 में 326, 2017 में 395, 2018 में 501, 2019 में 523 और 2020 में 785 केस दर्ज हुए हैं।

प्रसंग और संदर्भवश -

मैं लड़की हूं लड़ सकती हूं ।

इस ज़माने से आगे निकल सकती हूं।

बड़े है सपने मेरे, ऊंची है ख्वाहिशें,

अपनी ताक़त से कि़स्मत बदल सकती हूं।

कहते हैं लोग,

कोई पहचान नहीं तेरी,

मायके में पापा से ,

ससुराल में पति के नाम से जानी जाती है तू।

अनजान है मेरे हुनर से वो,

मैं अपनी कलम से,

इतिहास बदल सकती हूं।

लड़की हूं लड़ सकती

जहां की नजऱ में सफर है मेरा बस इतना ,

पीहर से ससुराल, ससुराल से पीहर।

अरे कोई बता दो सबको,

मैं आसमां का सफऱ भी

तय कर सकती हूं।।

लड़की हूं मैं लड़ सकती हूं

जिनको करना है , अपने सपनों पर फतेह,

वो मजबूरियों और तानों से डरती नहीं।

अभी दुर्गा के रूप में हूं मैं।

वक़्त आने पर काली भी बन सकती हूं ।।

लड़की हूं मैं लड़ सकती हूं

इस जहां से आगे निकल सकती हूं।।