breaking news New

ध्रुव शुक्ल की कविताः कवि के चूल्हे की अगवारी में

ध्रुव शुक्ल की कविताः कवि के चूल्हे की अगवारी में


जितने जीवन के बीज

उतनी कई तरह की भाषा

पुराण और इतिहासों में

ऋतुकालों-बारह मासों में

रची-बसी-सी

रूप-धूप-सी

दरस-परस-सी

सुख-में, दुख-में

कहनी में अनकहनी-सी


बहुरंगे अर्थों के आटे-सी

कवि-हृदय में गुँथती रहती

काव्य-शिल्प-सी


कवि के चूल्हे की अगवारी में

अपनी पूरी साँस साधकर

फूलती रोटी-सी

जन्म लेती कविता-सी