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12 जुलाई से रथ यात्रा, रथ बनाने में जुटे कारीगर

12 जुलाई से रथ यात्रा, रथ बनाने में जुटे कारीगर


जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा 12 जुलाई से शुरू होगी तथा 20 जुलाई को खत्म होगी

नई दिल्ली, 20 जून। इस बार ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत 12 जुलाई से हो रही है. इसके लिए भगवान विष्णु के अवतार भगवान जगन्नाथ उनके भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के रथों को बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी है. एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक रथों का निर्माण कार्य तेजी से शुरू हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा का शुभारंभ 12 जुलाई से होगा जबकि श्रीमंदिर के प्रांगन में 24 जून को स्नान पूर्णिमा का आयोजन किया जाएगा. इस बार COVID19 के कारण भक्तजनों की उपस्थिति नहीं रहेंगी. मंदिर के पुजारी एवं कर्मचारी ही सारे धार्मिक कार्यों का आयोजन करेंगे. 

चार बार RT-PCR जांच होगी

रिपोर्ट के मुताबिक इस वार्षिक रथयात्रा में शामिल होने वाले पुजारियों, पुलिस कर्मियों और सरकारी अधिकारियों को कम से कम चार बार आरटी-पीसीआर जांच से गुजरना होगा. यह फैसला कोविड-19 संक्रमण के खतरे को न्यूनतम करने के प्रयास के तहत किया गया है. पुरी के एक अधिकारी ने बताया कि श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) के अध्यक्ष डॉ.कृष्ण कुमार की अध्यक्षता में पुरी में हुई बैठक में सभी हितधारक इस फैसले पर सहमत हुए कि लगातार जांच से 12 जुलाई को होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की तैयारी में लगे सभी व्यक्तियों की की सुरक्षा सुनिश्चित होगी. यह तैयारियां और अनुष्ठान करीब एक महीने तक चलते हैं.

भक्तों की उपस्थिति नहीं 

पंचांग के मुताबिक साल 2021 में जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा 12 जुलाई से शुरू होगी तथा 20 जुलाई को खत्म होगी. संयोग से 20 जुलाई को देवशयनी एकादशी भी है. इस यात्रा के पहले दिन भगवान जगन्नाथ प्रसिद्ध गुंडिचा माता के मंदिर में जाते हैं. हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल जगन्नाथ पूरी रथ यात्रा आषाढ़ के महीने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है.यह रथयात्रा 10 दिनों तक चलती है. इस रथ यात्रा का आयोजन उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से होता है. इसमें बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. परंतु इस बार भी कोरोना महामारी के चलते इस रथ यात्रा में भक्त शामिल नहीं हो सकेगें.

किनका रथ कहां चलता है

भगवान विष्णु के अवतार भगवान जगन्नाथ उनके भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है. इस रथ यात्रा में सबसे आगे बलभद्र का रथ उसके बाद देवी सुभद्रा का रथ और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ चलता है. बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है जबकि देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन या पद्म रथ कहते हैं. सबसे अंत में चलने वाले भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदी घोष कहते हैं.

रथ यात्रा का महत्त्व

यह हिंदुओं के चार धामों में से एक है. इस मंदिर की स्थापना करीब 800 साल पहले हुई थी. इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ उनके भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा मूर्तियाँ हैं. इनके दर्शन से भक्त की मनोकामनाएं पूरी होती है. धार्मिक मान्यता है कि इस रथ यात्रा के दर्शन मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है.