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व्यंग्य: गुंडा निर्माण के घरेलू नुस्ख़े

व्यंग्य: गुंडा निर्माण के घरेलू नुस्ख़े


अखतर अली
अगर आप अपने बच्चे को गुंडा बनाना चाहते हैं तो आपको उसके पीछे अपना दिन रात एक करना होगा। जब आप अपनी रातों की नींद खराब करेंगे तब आपका बेटा इस लायक बनेगा कि वह पूरे मोहल्ले की नींद हराम कर सके । बेटे को डाक्टर और इंजीनियर बनाने में मां-बाप को जितना परिश्रम और त्याग करना होता है। उतना ही त्याग और परिश्रम बेटे को गुंडा बनाने में करना होता है 7 कोई भी उपलब्धि बैठे ठाले प्राप्त नहीं हो जाती। यहां जो विधि बताई जा रही है यह टू इन वन है। यानि बच्चे को गुंडा बनाना है तो भी यह विधि आपके काम की है और उसे गुंडा बनने से बचाना है तब भी यही विधा आपका मार्ग दर्शन करेगी।

आज तक आपने किसी भी चीज़ को बनाने की आसान विधि पढ़ी होगी आज पहली बार आप कठिन विधि पढ़ रहे होंगे। अन्य चीजं़े आसान विधि से बन जाती है इसलिए उसे आसान विधि घोषित किया गया था लेकिन यह सही में एक कठिन प्रक्रिया है तभी तो गुंडों की संख्या अच्छे लोगो की तुलना में इतनी कम है।

शहर में जैसे चर्चित डाक्टर, चर्चित वकील, चर्चित शिक्षक और चर्चित व्यवसायी होते है वैसे ही चर्चित गुंडे भी होते हैं। चर्चित डाक्टर और चर्चित वकील को हर शहरी नहीं जानता लेकिन चर्चित गुंडे के नाम, काम और दाम से सभी वाकिफ़ होते है परिचितों को तो नमस्ते किया ही जाता है लेकिन गुंडों को वे लोग भी नमस्ते करते है जिनसे गुंडे का कोई परिचय नहीं। अगर नमस्कार को लोकप्रियता का पैमाना माना जाये तो गुंडे सब से शीर्ष पर मौजूद है। गुंडे वकील नहीं होते लेकिन कानून की अच्छी-खासी जानकारी रखते है कभी कभी तो वकील को यही कानून बताते हैं।

सिफऱ् इमारतों, बाग-बगीचों, होटलों-कारखानों, खिलाडिय़ों और लेखकों से ही शहर की पहचान नहीं होती नामी गुंडे भी शहर का नाम रोशन करते हैं। उस शहर की कोई कद्र नहीं जिसमे ढंग के गुंडे न हो जिस शहर में लड़की देर रात तक इत्मीनान से घूम फिर सके ऐसे शहरो का नाम देश के नक्शे में अपनी पहचान को तरसता रहता है। इन शहरों के गुंडों पर थू है। यह बात उन शहरो के गुंडों के लिये शर्म की बात है जिस शहर में पोलिंग रोकने के लिए, मकान खाली कराने के लिए, दंगे संपन्न कराने के लिए जैसे कामों के लिए दूसरे शहरो से गुंडे मंगवाए जाते हैं। गुंडों के लिए ये सब काम सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तरह होते हैं, खराबी के जो विद्धान हैं उनकी कोशिश है कि गुंडों के मामले में शहर को आत्मनिर्भर होना चाहिए।

प्राय: जो काम हाथ, पैर और जुबान से किये जाते हैं ऐसे अधिकांश काम गुंडे आंख से ही कर देते हैं। इनमे देखने की अद्भुत कला होती है। एक बार किसी को देख ले उसे फिर कुछ नहीं दिखता 7 गाली इनका हुस्न है। धमकी इश्क और असला ही असली श्रृंगार है। इन्हें शिक्षा से नफऱत लेकिन कालेज से बेहद लगाव होता है ये छात्र नहीं होते लेकिन छात्रसंघ इनके होते हैं।

ये बिल्डर, सप्लायर , उत्पादक , प्रकाशक वगैरह वगैरह कुछ नहीं होते लेकिन इस तरह के हर काम में इनका हिस्सा ज़रूर होता है। गुंडे विशेष ढंग से जीते ही नहीं मरते भी विशेष ढंग से है। इनके मरने की सूचना जब एक से दूसरे तक पहुंचती है तो कोई यह नहीं कहता कि उनका निधन हो गया। देहांत हो गया गुजऱ गए, डेथ हो गई बल्कि कहा जाता है वो मर गया। भाषा का यह लहजा ही इसकी जीवन भर की कमाई होती है।  किसी स्कूल-कालेज और कोचिंग सेंटर में गुंडों को प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध नहीं है। गुंडों का निर्माण उनके घर में ही होता है 7 वही लड़के आगे चलकर ख्यातिप्राप्त गुंडे बनते है जिनका प्रशिक्षण बचपन से घर में ही शुरू हो जाता है।

जब बच्चा पहली बार गाली बकता है और उसे सुन कर मां बाप बहुत खुश होते है समझो गुंडा निर्माण की प्रक्रिया चालू हो गई है। जब बच्चा दूसरे बच्चे के खिलौने छीनता है, दूसरे बच्चो को धकेलता है। उनको मारता है तब उसका बाप मूंछो पर ताव देकर कहता है कि शेर का बच्चा है किसी से नहीं डरता यह गुंडा निर्माण का अगला पाठ होता है। बच्चा आवारा निकले इसके लिए चुप रहने के समय बोलने वाली मां और बोलने के समय चुप रहने वाले बाप का होना बहुत जरुरी होता है। उस घर के बच्चे गुंडे बन ही नहीं सकते जिस घर में औरत पति के सम्मान के लिए बेटे को डांटे। जो पत्नी अपने पति को बेटे को डांटने का अधिकार खत्म कर देती है उसी के बच्चे गुंडे बनते हैं।

गुंडा बनने  के लिए बच्चे के पास ऐसी मां का होना निहायत ज़रूरी है जिसके पास लोग उसके बच्चे की शिकायत आये तो वह साड़ी का पल्लू घोस कर , दोनों हाथ उठा उठाकर कहे कहीं कुछ भी गलत हो तो सब को बस मेरा ही बच्चा दिखता है।