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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविता : आखिर ये किस बात का रोना है

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविता : आखिर ये किस बात का रोना है


क्या हाथों से छूट रहा

क्या बचा हुआ है --

रोना- धोना मचा हुआ है

आखिर ये किस बात का रोना है

पता करो, आगे क्या होना है


लोग छू नहीं रहे अपने आपको

बार- बार धोते हैं हाथ

दूर से करते हैं बात

हाथों से छूटता संसार

नहीं दिख रहा उनको


कोई अदृश्य गहरा राज है

विष-बुझा मुखौटा पहनकर घूर रहा है सबको

हाथ धोकर पीछे पड़ा है सबके

सबको खींचे लिए जा रहा है

उस दुनिया से दूर

जो बसी रही है अब तक

सबकी आँखों में, सबके स्पर्श में


डर का प्रचार

सबको घरों में क़ैद कर लेने का विचार

जो कबूल करेंगे घरों में अपनी क़ैद, वे जियेंगे

जो बेघर होंगे, उन्हें नहीं होगा जीने का अधिकार


जो बेघर हैं, उनके नेता अब न होंगे

अब न होंगे राजा-रानी

जाने किस अदृश्य राज की

अब होगी सब पर निगरानी

घर ही जब कारागृह होगा

यही एक बस नारा होगा--

अपने काम से काम, सबको दूर से सलाम