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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से जन आंदोलन और उनकी सार्थकता

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से जन आंदोलन और उनकी सार्थकता

सुभाष मिश्र
मेरे अग्रज बबन प्रसाद मिश्र की स्मृति में उनकी जयंती 16 जनवरी के अवसर पर वर्तमान दौर के आंदोलन व उनकी सार्थकता पर व्याख्यान, परिसंवाद आयोजित है, जिसमें बहुत से विद्वजन अपनी बात रखेंगे। मुझे लगा क्यों न इस सामयिक विषय पर मैं वर्तमान समय की बात करते हुए पिछले एक डेढ़ साल में हुए चार-पांच बड़े जनआंदोलनों की बात करुं। पचास दिनों से अधिक निरंतर चलने वाला किसान आंदोलन हो या उसके पहले का शाहिन बाग आंदोलन या निर्भया कांड के बाद उभरा जनाक्रोश।

इस दशक के प्रारंभ में, 2011 में जन लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। इस आंदोलन से लोगों को किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद भी किस दिशाहीन और विचारहीन होने के कारण यह आंदोलन बिखर गया। आज अन्ना हजारे लगभग हाशिये पर हैं। उनके आंदोलन के साथ जुड़े अरविंद केजरीवाल के पास दिल्ली की सत्ता है। बाबा रामदेव देश के बड़े व्यापारी समूह में शामिल हो गये हैं। इस आंदोलन के बाद 2012-15 में दिल्ली में एक लड़की के साथ हुई बर्बरतापूर्ण बलात्कार और उसके मृत्यु के बाद उपजे आंदोलन ने पूरे देश में लड़कियों, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किया। पूरे देश ने इस विषय को गंभीर बहस, प्रदर्शन हुए और संसद ने निर्भया के नाम से मौजूदा कानूनों में आवश्यक सुधार कर कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।

दोषियों को देर से ही सही सजा ए मौत हुई। लोगों को लगा की कड़े कानून से लोगों में भय व्याप्त होगा और औरतों के प्रति अपराध में कमी आयेगी, लेकिन पितृसतात्मक समाज की पुरुष मानसिकता में कोई खास तब्दीली नहीं आई। इसके बाद हैदराबाद और हाथरस में निर्भया जैसे केस की पुर्नवृत्ति हुई। देश में महिलाओं के खिलाफ रेप के प्रकरण दर्ज किये गये।  वर्ष 2019-20 आते-जाते देश में एक सीएए के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन प्रारंभ हुआ। दिल्ली के शाईन बाग की मुस्लिम महिलाओं ने इस विरोध प्रदर्शन में बढ़ चढ़कर हिस्सा  लिया जिसका विस्तार पूरे देश अलग-अलग जगह हुआ। यह आंदोलन पूरे देश में धीरे-धीरे जन आंदोलन बन गया। यह आंदोलन निरंतर चलता रहा।  इसी बीच कोरोना संक्रमण के कारण आंदोलन  समाप्त करना पड़ा। इस दौरान देश ख्यातिनाम जेएनयू विश्वविद्यालय में भी छात्र आंदोलन हुआ। जिसे राज्य विरोधी आंदोलन करार दिया गया। इस दशक के अंत में इस सदी का सबसे बड़ा किसान आंदोलन प्रारंभ हुआ जो अनवरत जारी है। इस आंदोलन को लेकर सत्ता पक्ष और किसान संगठनों, राजनीतिक दलों के बीच मतभेद है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के ाद किसानों का आंदोलन यथावत जारी है। दरअसल यह क़ानूनों की वापसी का ही नहीं, अपनी नागरिकता की बहाली का भी आंदोलन है।

जब भी कोई जन आंदोलन होता है, तत्कालिन सरकार और उसके नुमाइंदें से फेल करने पर, असफल करने के लिए कोई कोरकसर नहीं छोड़ते। आज किसान आंदोलन हो या शाहीन बाग इसे अपराधियों का गिरोह या संगठन बताया जा रहा है लेकिन ऐसा करने वाले भक्तगण यह भूल जाते हैं कि अपराधियों के संगठन कभी भी अहिंसक आंदोलन नहीं करते हैं इसलिए उन्हें अपराधी कहना एक किस्म का अपराध है।

अक्सर देखा गया है कि भीड़ अराजक होती है किन्तु यह आंदोलन अराजक नहीं है। इस पूरे आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या में शामिल आंदोलनकारी स्वप्रेरणा से संगठित और नियंत्रित हैं। पवित्र उद्देश्य यानी  जनहितकारी उद्देश्य को नष्ट करने या असफल करने के लिए सबसे आसान और क्रूर उपाय यह है कि उसे कलंकित किया जाए और इस उपाय में मिली असफलता किसी को भी गुस्से से भर सकती है। किसानों का आंदोलन गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन की याद दिला रहा है।

इस आंदोलन के चलते यह बात साफ हुई है कि ताकत से व्यक्ति को कुचला जा सकता है संकल्प और साहस को नहीं। जैसे अंधभक्ति होती है वैसे ही अंध शक्ति होती है और वह व्यक्ति से सोचने विचारने का अवकाश छीन लेती है। ऐसी शक्तियां इतिहास में हमेशा कलंकित रहती है और तानाशाही का दर्जा हासिल कर लेती है।

जिस तरह से शाहीन बाग आंदोलन में पहले आतंकवादियों का  हाथ देखा गया, नक्सलवादी होने का इल्ज़ाम लगाया गया फिर शांति भंग और आखिरी में उसके तार दिल्ली के दंगों से जोड़ दिए गए। अब किसान आंदोलन में भी खालिस्तानी तत्व खोज लिए गए है। नक्सली हाथ देख लिया गया और इसकी फंडिंग कहां से हो रही है इसको लेकर भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं। शाहिन बाग और किसान आंदोलन अपने चरित्र, स्वरूप और शांति सद्भाव के कारण गांधी जी के सत्याग्रह की याद दिलाता है। दोनों ने अपने राजनीतिक आंदोलन बनाने की पूरी कोशिश अपनी ओर से की और किसी राजनीतिक दल को अपना मंच नहीं दिया।

इस तरह के आंदोलन के दौरान ही स्वयं गांधी जी ने कहा था कि ''निष्क्रिय प्रतिरोध एक चौमुंडा खड्ग है, इसे किसी भी तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है, यह उसका भी भला करता है जो इसका इस्तेमाल करता है और उसका भी जिसके विरुद्ध इसका इस्तेमाल किया जाता है। एक बूंद भी रक्त बहाए बिना, यह दूरगामी परिणाम देता है। न इसे जंग लगती है, न इसे कोई चुरा सकता है। मेरे निश्चित मत है कि निष्क्रिय प्रतिरोध कठोर हृदय को भी पिघला सकता है। यह एक उत्तम और बड़ा ही कारगर उपचार है। यह परम शुद्ध शस्त्र है। यह दुर्बल मनुष्य का शस्त्र नहीं है। शारीरिक प्रतिरोध करने वाले की अपेक्षा निष्क्रिय प्रतिरोध करे वाले में कहीं ज्यादा साहस होना चाहिए।

ऐसा साहस यीशु डेनियल, क्रेमर लेटिमर और रिडली में था जिन्होंने चुपचाप पीड़ा और मृत्यु का वरण किया, ऐसा ही साहस टाल्सटॉय में था जिसने रूस के जारों की अवज्ञा करने का साहस किया, जो इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। वस्तुत: एक ही पूर्ण प्रतिरोधकर्ता बुराई के विरुद्ध अच्छाई की विजय के लिए काफी है।

चाहे वह गांधी जी का सत्याग्रह हो या शाहिन बाग का विरोध प्रदर्शन या किसानों का यह आंदोलन सबको लेकर इस तरह के सवाल उठते रहे हैं कि इनका औचित्य क्या है? सवाल यह है कि क्या ऐेसे आंदोलनों की कोई सार्थकता है? क्या यह आंदोलन भविष्य के नजीर बनेंगे, क्या यह लोकतंत्र की ताकत बनेंगे?  शाहिन बाग की तरह ही किसान आंदोलन को भी सोशल मीडिया पर बदनाम करने की पुरजोर कोशिश हुई। इसे अभी भी बड़े किसानों का आंदोलन बताकर खारिज किया जा रहा है। किन्तु देश की सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों को संविधान में प्रदत्त अधिकारों के तहत संरक्षण देकर आंदोलन करने से रोका नहीं।

कोई भी जन आंदोलन चाहे वह कितना ही छोटा या कितना ही बड़ा क्यों न हो वह जन भागीदारी और जन की ताकत और सच्चाई से चलता है। सत्ता किसी की भी हो हर तरह के आंदोलन को अपने खिलाफ मानकर कुचलने की, तोडऩे की कोशिश करती है। ऐसे समय जब पूंजी का प्रभाव बढ़ रहा है, गोदी मीडिया पूरी तरह से पूंजीपतियों के इशारे पर काम कर रहा हो, तब आंदोलन को सही तरह से संचालित करना बहुत कठिन है। कहा भी जाता है कि सत्य परेशान हो सकता है,पराजित नहीं।

हमारे पूरे मानव सभ्यता के इतिहास में अलग-अलग अवसरों पर जब की कोई प्रतिरोध के स्वर उठे हैं, लोग लामबंद हुए हैं तो सत्ता ने उन्हें कुचलने की, दबाने की फंसाने की पुरजोर कोशिश हुई है। वहीं आंदोलनकारियों के हौसले बढ़ाने के लिए इस समय के कलाकारों, साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
फैज अहमद फैज का एक मशहूर तराना याद आता है।
ऐ ख़ाक-नशीनो उठ बैठो वो वक़्त कऱीब आ पहुँचा है
जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे,
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब जि़ंदानों की ख़ैर नहीं,
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे।