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जिनकुशल सूरि जैन दादाबाड़ी में पर्वाधिराज पर्यूषण महापर्व का तृतीय प्रभात

जिनकुशल सूरि जैन दादाबाड़ी में पर्वाधिराज पर्यूषण महापर्व का तृतीय प्रभात

 कल्पसूत्र के हिन्दी भावांतर का वाचन आरंभ

रायपुर। जिनकुशल सूरि जैन दादाबाड़ी, एमजी रोड मेें रविवार को पर्वाधिराज पर्यूषण महापर्व के तृतीय प्रभात में भद्रबाहु स्वामी विरचित सूत्र शिरोमणि कल्पसूत्र के हिन्दी भावांतर का वाचन आरंभ हुआ। इससे पूर्व लाभार्थी श्रीमती चंचलदेवी प्रकाशचंद प्रवीण कुमार पाल कुमार दस्सानी परिवार ने सूत्रजी को बाजे-गाजे और सूत्रजी की जय-जयकार के साथ दादाबाड़ी में लाकर उसे पूज्य साध्वी भगवंत को विधिपूर्वक वोहराया। साथ ही पांच ज्ञान की पूजा हुई, जिसमें क्रमश: मति ज्ञान की पूजा लाभार्थी- श्रीमती पानीबाई भंसाली परिवार ने, श्रुत ज्ञान की पूजा श्रीमती चंद्री बाई भंवरलाल कांकरिया परिवार ने, अवधि ज्ञान की पूजा श्रीमती सरला देवी अमरचंद झाबक परिवार ने, मन: पर्यव ज्ञान: की पूजा मनमोहनचंद सुरेशचंद कानूगा परिवार ने एवं सर्वोच्च कैवल्य ज्ञान की पूजा श्रीमती सम्पत बाई मोतीलाल संतोष सचिन दुग्गड़ परिवार ने की।

कलियुग में सतयुग की कल्पना कर पाएं सकारात्मक उर्जा: साध्वी शुभंकराजी

मंगलाचरण से वाचना आरंभ करते हुए साध्वीवर्या नवकार जपेश्वरी शुभंकराजी महाराज साहब ने आज श्रद्धालुओं को कल्पसूत्र के तीन अधिकार- जिन चरित्र, स्थिरावली एवं समाचारी में से प्रथम अधिकार का शुभारंभ ग्रंथकार-टीकाकार द्वारा लिखी हुई पीठिका अर्थात् प्रस्तावना पर प्रकाश डालते पर्यूषण पर्व के महात्म्य से अवगत कराया। तदुपरांत साधु-साध्वियों के लिए बताए गए दस आचार-व्यवहार अर्थात् दस कल्पों का वर्णन सुनाते प्रथम व अंतिम तीर्थंकर के साधुओं और 22 तीर्थंकरों के समय के साधुओं की प्रकृति के बारे में श्रवण कराया। अंतिम तीर्थंकर के समय के साधू वक्र और जड़ थे। और मध्य के 22 तीर्थंकरों के समय साधु ऋजु और प्राज्ञ यानि सरल थे। उन्होंने कहा कि हमारा नंबर भी अंतिम तीर्थंकर के साधु की तरह वक्र और जड़ प्रकृति में ही है, किन्तु ऐसी बात नहीं है कि कलियुग में सतयुग नहीं आता। सतयुग की कल्पना करेंगे तो निश्चित रूप से हमें सकारात्मक उर्जा मिलेगी ही। काल के प्रभाव से व्यक्ति का स्वभाव समय-समय पर परिवर्तित होता रहता है।

अगले क्रम पर उन्होंने आज श्रद्धालुओं को साधु-साध्वियों के विराजने के स्थल उपाश्रयों के अनुकूल प्रबंधों का वर्णन, परमात्मा के निर्वाण से 980 वर्ष बाद कल्पसूत्र का वाचन होने के कथानक और सूत्र में साधु-साध्वी के लिए वर्णित संवत्सरि पर्व के चार कर्तव्यों के बारे में अवगत कराया। जिनमें प्रथम है आपस में खमतखामणा अर्थात् क्षमापणा करें और उनके क्षमापणा अवश्य करें जिनसे बोलचाल नहीं है। द्वितीय- केश लुंचन, संवत्सरि प्रतिक्रमण से पूर्व केश लुंचन अवश्य करें। तृतीय- चैत्य परिपाटी अर्थात् जिन मंदिरों के दर्शन और चतुर्थ है अटठ्म तप की आराधना। इस पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व में हम स्वयं को अधिक से अधिक तप-त्याग, साधना-आराधना, स्वाध्याय, भक्ति से जोड़कर जिनशासन का कर अदा करें। सभी पुण्य कर्म मन और काया के योग से करें। नागकेतु के कथानक से प्रेरणा प्रदान करते उन्होंने कहा कि सहनशक्ति से ही सिद्धी की प्राप्ति होती है। ऋषि पंचमी पर गंगाधर और बैल व कुतिया बने हुए उसके माता-पिता के कथानक का वर्णन करते उन्होंने कहा कि पर्व के दिनों में जो उपवास-पचक्खाण नियम आदि का पालन नहीं करते, उन्हें निम्न भव मिलता है। इसीलिए पर्व के दिनों में त्याग-तप, व्रत-आराधना आदि प्रत्याख्यान लेकर करें अैर धर्म करने वालों का कभी उपहास न करें।

पीठिका के अध्ययन उपरांत पूज्या साध्वी भगवंत ने सूत्र की प्रथम गाथा प्रारंभ करते हुए नमस्कार महामंत्र की महिमा से जुड़े कथानकों का श्रवण कराया। उन्होंने कहा- नमस्कार महामंत्र परलोक व इहलोक दोनों को ही संवारने वाला है। चैदह पूर्वों का सार है यह नवकार महामंत्र। अगले क्रम पर भगवान महावीर के छह कल्याणकों और उनके पूर्व 27 भवों का विस्तृत वर्णन श्रवण कराया गया। नयसार के रूप में भगवान महावीर के जीव ने अतिथि सत्कार और सुपात्र दान कर सम्यकत्व का उपार्जन किया था, फलत: उन्हें दूसरा भव आदिनाथ भगवान के पोते और भरत चक्रवर्ती के पुत्र मरीची के रूप में प्राप्त हुआ। कथानक से सीख प्रदान करते हुए साध्वी ने कहा कि रूप मद, तप मद, क्रिया मद कभी नहीं करना चाहिए, इन मदों को करने से नीच गोत्र का कर्मबंध होता है।

इन छह कर्तव्यों का अवश्य करें पालन: साध्वी सुभद्राजी

धर्मसभा के उत्तरार्ध में साध्वीवर्या सरलमना सुभद्राजी महाराज साहब ने कहा कि पर्यूषण पर्व के इन दिनों में प्रतिदिन 6 कर्तव्यों का पालन अवश्य करना चाहिए। वे हैं- देव पूजा, गुरू पूजा, संयम पालन, दान, तप और कल्पसूत्र का श्रवण। साथ ही उन्होंने द्वितीय गाथा के अंतर्गत दस अछेरों का वर्णन सुनाया। उन्होंने कहा कि इस पंचम आरे में हम पर भी वक्र और जड़ होने का कलंक टीका लगा हुआ है। सद्ज्ञान बार-बार समझाने पर ही हमें बड़ी मुश्किल से समझ में आता है।

नवाणु यात्रा कर लौटे तीर्थयात्रियों का हुआ बहुमान

 जैन श्वेताम्बर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विमलचंद मालू, सचिव निलेश गोलछा, प्रचार-प्रसार प्रभारी तरूण कोचर ने बताया कि आज धर्मसभा में नवायु यात्रा से आए धर्मानुरागियों का श्रीमती सुजाता-नरेन्द्र पारख परिवार की ओर से बहुमान किया गया। तदुपरांत तपस्वी कल्प कोचर का बहुमान संघ की ओर से ऋषभदेव मंदिर ट्स्र्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली व चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विमलचंद मालू द्वारा किया गया। जैन मंदिर सदर बाजार में सजे नवकार दरबार में रविवार को जाप के लाभार्थी रहे- इंद्र कुमार अशोक कुमार सांखला व मनमोहन पारख परिवार।

अक्षय निधि के तपस्वियों को एकासना कराने के लाभार्थी

चातुर्मास समिति के प्रचार-प्रसार प्रभारी तरूण कोचर ने बताया कि रविवार को अक्षय निधि समवशरण, विजय कसाय तप के तपस्वियों को एकासना कराने का लाभ भागचंद अजीत अमित मूणोत