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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -क्या अंतरिक्ष भी अब अमीरों का होगा?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -क्या अंतरिक्ष भी अब अमीरों का होगा?

-सुभाष मिश्र
दुनिया के सबसे अमीर समझे जाने वाले जेफ  बेज़ोस ने तीन अन्य लोगों के साथ ब्लू ओरिजिन के पहले मानव मिशन पर अंतरिक्ष में कुछ मिनट बिताए। यह दुनिया के कुलीन पर्यटकों के लिए एक नये युग और नये उद्योग की शुरुआत है। अब केवल इस पर्यटन में वही लोग शामिल होंगे जिनके पास अकूत धन सम्पदा है। एक तरह से जो आकाश सबके हिस्से का था, उस आकाश पर भी अब अमीरों का कब्जा होगा। हमारे बहुत सारे जनवादी रंगकर्मी मित्र अक्सर यह गाना गुनगुनाते हैं-
हमारी सारी दुनिया न देखो आसमान
हमी से रोशन दुनिया न देखा आसमान
आसमान देख सितारे हम काहे हैं हाथ पसारे
एक-एक बूंद पसीने की, मिट्टी के लट्टू सारे          
इंसानी सारी दुनिया, कहां है भगवान
सारी दुनिया न देखों आसमान।

यूं तो हमारे यहां आसमान, चंदा, सूरज, नक्षत्र, तारे और बादलों को लेकर बहुत सी कल्पनाएं की गई हैं। बहुत सी धार्मिक आस्थाएं, तीज-त्यौहार, गृह दशाएं और नक्षत्रों का निर्धारण गणना इन्हीं सब पर आधारित है। जातक का जन्म किस नक्षत्र में हुआ है, उसी से उसकी राशि, ग्रहदशा और नाम आदि का निर्धारण होता है। अंतरिक्ष को लेकर हमारी जिज्ञासा पौराणिक ग्रन्थों से लेकर आधुनिक युग तक मौजूद रही है, किन्तु आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोंण सदैव दो विपरीत ध्रुवों की तरह विद्यमान रहे हैं।

हमारे देवी-देवता आकाश में विराजे हैं। हमारे सिनेमा में अक्सर हमारे भगवान आकाश से पुष्पवर्षा, आशीर्वाद देने की मुद्रा में दिखाई देते हैं। हम अपने ईश्वर को तीन लोक का देवता मानते हैं। हमारे यहां ब्राहंड की उत्पति ब्रम्हा जी से मानी जाती है।

आकाश हमेशा से हमारी कल्पना और हमारी धार्मिक आस्थाओं का केंद्र रहा है। हम आकाशवाणी में विश्वास करते है। यह अलग बात है कि नये उत्तर आधुनिक समय में आकाशवाणी को एफ.एम. रेडियों ने हाशिये पर ला दिया है। भला हो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जो अपने मन की बात आकाशवाणी से करते हैं।

हमें जब अपनी मेहबूब को सैर कराना होता है तो हम कहते हैं-
 चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो, हम है तैयार चलो।

हमारे कवि, शायर ने आसमान, आसमान की ऊंचाइयों, सुंदरता और आकाशीय दुनिया को लेकर बहुत कुछ लिखा है। कवियों की कल्पना यानी फैंटसी में कहा गया है कि
जहां न पूछे रवि, तहां पूछे कवि।।
दुष्यंत कुमार का एक शेर है
कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।।
मनुष्य में अपने ज्ञान-विज्ञान, कल्पना और अपने संसाधनों के जरिये हमारे आसमान को नापने की कोशिश हमेशा से की है। आदमी के हौसले कुछ ऐसे भी रहे है-
गर चाहते हो देखना मेरी उड़ान को
तो पहले जा कर ऊँचा करो आसमान को।।

आध्यात्मिक दृष्टि से मानव नें सूक्ष्म शरीर से अंतरिक्ष की यात्रा की है और सम्पूर्ण सृष्टि को भगवान की कृति मानकर उस ब्रम्हाणीय परिप्रेक्ष्य में देखा, समझा और जाना है। विज्ञान ने अंतरिक्ष को पृथ्वी की सीमाओं से परे जाकर वैज्ञानिक तकनीकी विकास की नजऱ से खोजने का प्रयास किया है और सृष्टि की संरचना को बिग बैंग अर्थात प्रकांड ध्वनि के साथ एक बड़े पिंड से टूटकर क्रमिक रूप से स्वत: विकसित होने की प्रक्रिया माना है। ये नज़रिया की ब्रम्हांड में पहली गूंज ओमकार की थी, जो बिग बैंग सिद्धान्त ही है अभी भी वैज्ञानिक मन में अनसुलझा ही है।

बाजार और कारपोरेट जगत का प्रवेश अंतरिक्ष की दुनिया में कोई नया कदम नहीं है। अनेक प्राइवेट सेटेलाइट, क्लॉउड्स स्टोरेज की उपलब्धता आदि कारपोरेट जगत से जुड़ चुकी है, मगर नया मसला पूंजीपतियों के अंतरिक्ष पर्यटन के व्यापार का है। व्यापार में मुनाफा अनिवार्य शर्त होती है और इसके लिए एक घोषणा पत्र पर दस्तखत करवाकर पर्यटक की जान पर खेल जाने का खतरा व्यापारिक दृष्टि से उठाने में कोई भी अरब या खरबपति नहीं हिचकेगा। धंधे में नफे के लिये एक फैक्ट्री में चाहे मजदूर की जान का खतरा हो या अंतरिक्ष में ढाई करोड़ लेकर धरती का एक नज़ारा देखने में जान जाने का, दोनों में एक बराबर खतरे हैं। मगर मुनाफे से समझौते के लिए व्यापारियों का दिल है कि मानता नहीं। 57 वर्षीय बेजोस ने 2000 में ब्लू ओरिजिन की स्थापना एक दिन कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण के साथ अस्थायी अंतरिक्ष कॉलोनियों के निर्माण के लक्ष्य के साथ की, जहां लाखों लोग काम करेंगे और रहेंगे। उनकी कंपनी न्यू ग्लेन नामक एक भारी-भरकम कक्षीय रॉकेट विकसित कर रही है और एक चंद्रमा लैंडर भी है जो नासा को अनुबंधित करने की उम्मीद कर रही है।  

मनुष्य की आकाशीय सोच की अंतिम सीमा तक संभावनाओ और नई उचाईयों को छूने वाला यह दल, न्यू शेपर्ड कैप्सूल 66.5 मील (107 किलोमीटर) की ऊंचाई पर पहुंचा, जिससे यात्रियों को पृथ्वी के वक्र को निहारते हुए भारहीनता का अनुभव हुआ। इस यात्रा में एविएटर वैली फंक, बेजोस, उनके भाई और 18 वर्षीय डचमैन ओलिवर डेमेन में शामिल हुए, जो अब तक के सबसे कम उम्र के अंतरिक्ष यात्री बन गए।
अंतरिक्ष में पहले अमेरिकी एलन शेपर्ड के नाम पर, न्यू शेपर्ड सबऑर्बिटल रॉकेट ने इसे अपने पेस और परीक्षण सुरक्षा तंत्र के माध्यम से रखने के लिए 15 बिना रुकी उड़ानों को उड़ाया था।

बेजोस, ब्रैनसन और मस्क अपने अंतरिक्ष स्टार्टअप में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। प्रत्येक ने ग्राहकों को अंतरिक्ष में सवारी कराने का वादा किया है। ब्रैनसन के वर्जिन गेलेक्टिक में पहले से ही 600 से अधिक टिकट आरक्षण होने की सूचना है, जिसकी कीमत लगभग $ 250,000 है।
अंतरिक्ष की खोज का मुख्य ध्येय मानव के लिए उपयुक्त नई वैज्ञानिक व तकनीकी उंचाईयों को पाना है जो धरती पर मानव के जीवन को सुलभ कर सकें। एक उद्देश्य अनसुलझे रहस्यों को जानना भी है। लेकिन पर्यटन और व्यापारिक दृष्टि से धरती, आसमान और अंतरिक्ष से खिलवाड़ करना एक बहुत बड़ा खतरा है। प्रकृति के प्रकोप पर कोरोना महामारी जैसी सीखों से सबक लेना जरूरी है। कुदरत सहती है मगर फिर एक बार खुद को रिसेट करके पुरानी स्थिति में लाने का बटन भी दबाती ही है। कहीं ऐसा न हो कि अंतरिक्ष पर्यटन किसी बड़ी भीषण प्राकृतिक आपदा को मौन आमंत्रण दे दे। इस पर यूनाइटेड नेशन्स को विचार करके प्रतिबंधित करने की दृष्टि से सोचना चाहिये क्योंकि दुनिया की 99 प्रतिशत आबादी को न इससे कोई लाभ होगा औऱ न ही वो इसका आनंद उठा सकेंगे।

तकनीकी, विज्ञान और पूंजी के इस नये खेल ने अब धीरे-धीरे गरीबों से उनकी कल्पनाओं को, उनकी आकाशीय उड़ानों को छीनना भी शुरू कर दिया है। आने वाले दिनों में पर्यटन के नाम पर बहुत सारे लोग आकाश की उंचाइयां नापेंगे। हम अपने देश के मौजूदा हालात को देखकर बस यही कह सकते हैं-
तुम आसमां की बुलंदियों से लौट आना।
हमें जमीं के मसायल पे बात करनी है।