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मज़हबी ऊब के बीच फँसा देश

मज़हबी ऊब के बीच फँसा देश

ध्रुव शुक्ल

किसी दल की तरफ से नहीं, अपने दिल की तरफ से सवाल करता हूँ कि महाकाव्यों के वृन्दावन बागों में बसा मेरा देश धूल-कचरे से भरे उन शाहीन बागों में क्यों बदलता जा रहा है जो आज भी मेरा रास्ता रोक रहे हैं। वे लोग जो लुटेरे और फिर शासक बनकर मेरे देश की प्रकृति और जीवन को सदियों तक घायल करते रहे, उनके राजनीतिक नुमाइंदे आज भी अपने विशेषाधिकारों की मज़हबी सियासत क्यों कर रहे हैं। मेरे देश में अब कोई निज़ाम नहीं है, संवैधानिक लोकतंत्र है फिर क्यों वे अपने लिए किसी शाही मुकाम की ज़िद बांधकर मेरे देश को धमका रहे हैं। वे अपनी सुविधा से संविधान का सहारा भी लेते हैं और मज़हबी ओट में छिपकर वार भी करते हैं। दुनिया के किसी भी देश में इन लोगों ने रहने का यही तरीका क्यों अपनाया हुआ है कि देश में रहकर भी देश से दूर बने रहो।

पन्द्रह सौ साल बीत गये और ये लोग अभी भी यह भ्रम पाले हुए हैं कि पूरी दुनिया पर इन्हीं का झंडा फहराएगा। मानव जाति के लिए उदारता के मूल्य को सबसे ऊँचा मानने वाले मेरे देश पर ये मुट्ठी भर लोग पड़ौसी होकर भी चाहे जब अपने आतंक की छाया डालते रहते हैं। ये लोग अब तक क्यों नहीं समझ पाये कि दुनिया संगठित मज़हबी निजामों में कभी शांत और सुखी नहीं रही। पृथ्वी पर बसे लोगों से जरा पूछकर तो देखो, वे हाथ उठाकर यही कहेंगे कि हम किसी भी तरह की कौमी एकता नहीं, सबकी इन्सानी बिरादरी चाहते हैं।

मेरे देश से अधिक धर्मनिरपेक्ष कौन देश होगा जहाँ सब धर्मों को त्यागकर ही सच्ची शरण मिलने का भगवद् उपदेश किया गया है। यही कारण है कि मेरे देश के उदार हृदय में वे मज़हब भी सदियों से जगह पाये हुए हैं जिनका धर्मनिरपेक्षता से कोई गहरा रिश्ता बना ही नहीं और इस पर ये राजनीतिक तुर्रा कि हम तो धर्म निरपेक्ष हैं। ये कैसे लोग हैं कि दुनिया में अपनी जगह तो चाहते हैं पर सवालों के जवाब देने से भी कतराते हैं।

कोराना वायरस से जितनी साँसें रुँध रही हैं, उससे कई गुनी ज़्यादा यह मज़हबी ऊब मेरे देश का दम घोंट रही है और बर्दाश्त के बाहर है। यह मेरे दिल की आवाज़ किसी का दिल दुखाने के लिए नहीं है। मैं तो अपने नागरिक अधिकार से कुछ सवाल पूछ रहा हूँ। कोई जवाब दे और शायद न भी दे।