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पुस्तक समीक्षा: व्यवस्था की कड़ियों पर चोट

पुस्तक समीक्षा:  व्यवस्था की कड़ियों पर चोट

 रमेश कुमार "रिपु"

विचाराधीन कैदियों को तिल तिल गलाकर मार देने वाली व्यवस्था के बारे में बारीकी से बात करती है ‘‘खोई हुई कड़ियाँ’’। अंधा कानून में विचारधीन कैदी की मनः स्थिति का व्यापक चित्रण है। कहने की बात है कि, मानवाधिकार आयोग कैदियों के हक के लिए तत्पर है। कहने की बात है कि, अपराधी भले छूट जाएं लेकिन, किसी निर्दोष को सजा न हो। कहने की बात है कि, जेल यातना गृह नहीं,सुधार गृह है। पत्रकार दीपांकर के मन में संवेदना के साथ जिज्ञासा है ,यह जानने की,स्कूल के मास्टर अवनीश चन्द्र अपनी पत्नी मानसी देवी की हत्या क्यों और कैसे की। वाकय में वे अपनी पत्नी के हत्यारे हैं या फिर उन्हें फंसाया गया है?

अवनीश चन्द्र जैसे देश में लाखों विचारधीन कैदी हैं,जो बेवजह  जुर्म की तय सजा से, अधिक सजा काटते हुए जेल में हैं। अपराधी बाहर मजे से हैं और निर्दोष जेल में यातना सह रहे हैं। पुलिस अब, पुलिस नहीं है। यही वजह है कि, अवनी जैसे कई निर्दोष पुलिस व्यवस्था का शिकार होकर,नक्सली का मुखबिर और साथी के आरोप में जेल में सड़ रहे हैं। बस्तर, झारखंड और बिहार में आम बात है।

बालूघाट का सामान्य मास्टर अवनीश उर्फ अवनी,कैदी नम्बर 2001 बन गया है। पत्रकार दीपांकर विचाराधीन कैदी अवनी के जरिये देश की न्यायपालिका,कार्यपालिका,पत्रकारिता और पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़े करतेकई सवाल करते हैं। अवनी की कथा,सत्य घटना है भी, और नहीं भी। इसलिए कि, आज हर जेल में कई अवनी हैं। हर जेलर को यही लगता है कि, सारे कैदी जेल को अपनी ससुराल समझते हैं। भरपेट मुफ्त की रोटी,टांगे फैलाकर चैन की नींद, लिबास, रिहाइश और महफूज रहने की गारंटी।

इस किताब में व्यवस्था के छल को ईमानदारी से उकेरा गया है। ऐसा लगता है कि लेखक स्वयं सड़ी व्यवस्था के शिकार हुए हैं। यह किताब व्यवस्था की खामियोंं की एक चलती फिरती पटकथा है। कैसे किसी को अपराधी बनाया जाता है। कैदी की बीमारी पर पर्दा डालकर डाॅक्टर, कैसे उसे मरने की हालत में पहुंँचा देते हैं। पुलिस की बेईमानी भले आदमी को, कैसे गंभीर अपराधी बनाकर उसका जीवन नरक बना देती है, उस भक्षक व्यवस्था के सच को निचोड़ दिया है। देश में किसी भी हत्या की न्यायिक जांँच का नतीजा सुखद नहीं निकला। जेल में वे हैं,जिसके पास कोई राजनीतिक पाॅवर नहीं है। सत्ता से संपर्क नहीं है। गरीब हैं। ऐसे लोगों के प्रति सरकारी वकील भी कोई दिलचस्पी नहीं लेते। क्यों कि, ऐसे विचाराधीन कैदी से उन्हें कुछ भी मिलने की उम्मीद नहीं होती।

पत्रकार दीपांकर विचाराधीन कैदी नम्बर 2001 के पत्नी हंता होने का सच जानने डाल्टन गंज मंडल कारावास और आरा जेल तक सफर करते हैं। अवनी बाबू को देखकर और उनकी बातें सुनकर उनकी रूह काँंप जाती है। विचाराधीन कैदी अवनी के मन में सड़ी व्यवस्था के प्रति इतना गुस्सा है कि, वह जज से लेकर दीपांकर पर भी भरोसा नहीं करते। दीपांकर अवनी से कई सच चतुराई से उगलवा लेते हैं। अवनी भी नहीं जानते कि, उनकी पत्नी को किसने मारा। मगर, दरोगा जानता है। फिर भी, वह अवनी के खिलाफ झूठा और मजबूत केस बनाता है।

अवनी कहते हैं,’’मैं जेल में तब तक सड़ता रहूंँगा,जब तक निर्दोष न सिद्ध हो लूँ। मैं निर्दोष तभी साबित हो सकता हॅू,जब मुझ पर मुकदमा चले। बहस हो। फिर कोर्ट का निर्णय मेरे पक्ष में हो। लेकिन, मानसिक संतुलन खो चुके आदमी पर मुकदमा आज तक नहीं चल सका। जबकि मैं स्वस्थ हूूॅ। क्या, मैं अब भी पागल हॅू, दीपांकर! अवनी झूठे हत्या के आरोप में तीस साल से जेल में हैं। दीपांकर उनके बारे में सिलसिलेवार बहुत कुछ लिखना चाहते हैं,लेकिन उसके पहले एक रात जेल में अवनी के साथ एक घटना घट जाती है।इस पर दीपांकर की जेलर कुरैशी से बहस हो जाती है। दीपांकर कहते हैं,मैं दावे से कह सकता हॅू कि,अवनी बाबू को टी.बी. थी। उन्हें जुकाम की दवा डाॅक्टर जान बुझकर देता था। अब आप कुछ मत करिये। अब जो कुछ करेगा प्रेस करेगा। जेलर बड़े ताव से कहता है,वो दिन चले गये, जब किसी पत्रकार का लिखा एक जुमला देश की तक़दीर बदल देता था।’’आज की पत्रकारिता पर यह तीखा व्यंग्य है।

एक सामान्य सी घटना को लेखक ने खोजी पत्रकारिता की शैली में लिखा है। कई जगह भावानात्मक पीड़ा को खुद भी महसूस किया है।‘‘खोई हुई कड़ियां’’ में अंधा कानून की ऐसी जागती तहरीर है, जो पाठक को हिला देती हैं। कई जानकारियों से आवगत कराती यह कथा अंत तक पठनीयता के गुणों से भरपूर है। और यही इस उपन्यास की सार्थकता है।

लेखक - राकेश कुमार सिंह

कीमत- 200 रूपये

प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन मुंबई