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"हत्या एक आकार की" गांधी का नाम लिए बिना गांधी की सारी बात कह गया

रायपुर, 14 जनवरी। बीथ्रिंग स्पेस जयपुर द्वारा अभिषेक  के निर्देशन में तैयार नाटक "हत्या एक आकार की"ने अपनी बुनावट और शिल्प  में बहुत ही सुंदर , तार्किक और प्रभावी तरीक़े से महात्मा गांधी का नाम लिए उनके विचारों , प्रयोगों और उन पर इल्जाम लगाने वालों की सारी बातों का जवाब बिना गांधी का नाम लिए ही दे दिया । एक नये तरह से गांधी की बात कहने वाला यह नाटक दर्शकों को बहुत पसंद आया । 

रायपुर में चल रहे युवा उत्सव के मंच से पंडित दीनदयाल आडिटोरियम में कल रात अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की ओर से छत्तीसगढ़ विजुअल आर्ट सोसायटी रायपुर के सहयोग से मंचित इस नाटक की प्रस्तुति 14 जनवरी को रायपुर में शाम 7 बजे वृंदावन हाल सिविल लाइन रायपुर में भी की जाएगी। नाटक में प्रवेश के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं है। 


ललित सहगल के नाटक ”हत्या एक आकार की” का, जो उन्होंने शायद गाँधी जन्म-शताब्दी के बरस 1969 में या उसके दो-एक साल बाद लिखा था। इस पर एक इंग्लिश फ़िल्म भी बनी थी, ‘एट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव’। 1969 में लिखे इस नाटक की प्रस्तुति हमारे समय के सवालों को ऐसे समेटती है मानो गांधी जी के जन्म के डेढ़ सौवें साल में हम उन्हें फिर उन्हीं सवालों के कटघरे में खड़े कर रहे हैं, और सच से नावाकिफ ही रहना चाहते हैं, अपनी कमजोरियों से घबराकर। नाटक में गांधी जी का तर्क रख रहा पात्र कहता है 'ये एक आकार की हत्या है' जो बार बार होती है। नाटक स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों, तत्कालीन राष्ट्रीय संगठन और महात्मा गांधी के विचारों का सम्यक विवेचन है। 

किसी ने प्रगतिशील लोकतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि लोगों को अपनी बात कहने की आजादी हो और मैं आपसे प्रेम, सौहार्द और शांति जैसे मूल्यों के प्रति आस्था हो। समाज की संस्कृति में विश्वास विश्वास हो एक-दूसरे के विचार से सहमत या असहमत होने की स्वतंत्रता हो। इस तरह की मूल्यों के बिना एक अच्छे समाज या राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी हैं। बीथ्रिंग स्पेस जयपुर के युवा साथियों  ने गॉधी और गोडसे का नाम लिए नाटक की पूरी कहानी का ताना बाना इन्हीं के इर्द-गिर्द बुनी गया है। गांधीजी के सिद्धांतों को बहस के ज़रिये बहुत ही अच्छे तरीक़े से बिना ज़्यादा कुछ किये प्रस्तुत किया गया है। जिन बातों को आज गांधीजी के संदर्भ मे तोड़मोड कर प्रस्तुत किया जाता है उन सारी बातों का जवाब इस नाटक में है। नाटक गांधी के प्रयोगों को उनकी सोच को बहुत ही बढ़िया तरीक़े से संप्रेषित करता है। सारी ऐक्टर की ऐक्टिग प्रभावी और विश्वसनीय है। नाटक में उपयोग में लाया गया रिकार्डड संगीत, भजन बहुत प्रभावी हैं। यह एक शोधपरक, तथ्यों पर आधारित नाटक है जो गांधी के संसार और सोच को व्यापकता प्रदान करता है।


नाटक में चार लोग हैं, जो 'उस' की हत्या करना चाहते हैं, जिसके सत्य, अहिंसा और सांप्रदायिक सद्भाव के 'फ़ालतू', बल्कि 'ख़तरनाक' नारों ने हिन्दू राष्ट्र को कमज़ोर कर दिया है, जो 'क्रांतिकारियों' की आलोचना करता रहा है; जिसने मौत के डर पर विजय पा ली है, जनता पर ऐसा जादू कर दिया है कि उसे जान से मार कर ही चुप किया जा सकता है। ये चारों लोग अपने मिशन पर निकलने ही वाले हैं कि उनमें से एक को संदेह होने लगता है कि मिशन सही है या ग़लत? उसे मनाने की तमाम कोशिशें नाकाम हैं क्योंकि वह चाहता है कि किसी को प्राणदंड देने के पहले अपराध और दंड पर गंभीर विचार हो। आख़िरकार तय होता है कि एक मुक़दमे का अभिनय किया जाए। जिसे संदेह है, वह 'उस अभियुक्त' के वकील की भूमिका करे, जिसे गोली चलानी है वह 'सरकारी वकील' की, तीसरा साथी जज बने, और चौथा बाक़ी बचे सारे रोल निभाए।

नाटक की निर्देशिकीय पक्ष 

किसी भी स्वस्थ और प्रगतिशील लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण एवं उसके अस्तित्व को बनाए रखने में इसके नागरिकों में प्रेम और सौहार्द,शांति जैसी मूल्यों के साथ जीवन यापन की प्रतिबद्धता अपनी साथी नागरिकों के प्रति सहानुभूति पूर्ण व्यवहार और संवाद की संस्कृति में विश्वास तथा समालोचनात्मक विवेक शीलता का मौजूद होना एक अपरिहार्य शर्ते है। इनके अभाव में एक लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज की कल्पना बेमानी है।

ललित सहगल द्वारा बहुत ही सहज प्रतीकात्मक शैली में लिखिए नाटक भारत की आजादी के संघर्ष और आजादी उपरांत अपने सामाजिक और राजनीतिक हालातों की ढोल यथार्थ और तथ्यों के आलोक में अहिंसा और हिंसा के द्वंद का आईना है। मेरी अपनी राय में हत्या एक आकार की महात्मा गांधी की अहिंसा की भावना से लबरेज अध्यात्म, विवेक और नैतिकता की जमीन पर लिए गए निर्णय और उससे उपजे असंतोष एवं घटनाओं की व्यक्ति पर राजनीतिक कुंठा से तोड़ मरोड़ कर की गई यात्राओं की टकरा हट की कहानी है जो उत्तर उत्तर एवं हिंसक होते जा रहे समाज में एक बहुत ही जरूरी रोकती की जाने वाली बात के तौर पर उभर कर सामने आती है।


रंगमंच अपने अनेक स्वरूपों में ऐतिहासिक रूप से ऐसा माध्यम रहा है जिसमें मनोरंजन की अतिरिक्त समाज में समय-समय पर जनमानस को ना केवल शांति और अहिंसा जैसे मूल्यों की स्थापना के लिए प्रेरित किया है बल्कि विचार और कर्म के स्तर पर विरोधाभासी जीवन में एकरूपता लाने की राशि दिखाए हैं। उम्मीद है कि महात्मा गांधी की जीवन मूल्यों पर आधारित या नाटक दर्शकों के लिए गांधी के प्रति दुराग्रह से व्यक्तित्व को न्यायोचित व्याख्या करते हुए अहिंसात्मक जीवनशैली को विकल्प के रूप में अपनाने हेतु प्रेरित करेगा।

मंच पर प्रथम समूह में राजेश, पूजा, निखिल, अनुरंजन द्वितीय समूह में निशांत, कमलेश,योगेश, सोमेश व मंच पर लेखक- ललित सहगल, प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन स्वप्निल एवं देशराज वेशभूषा, मेकअप- पूजा एवं निशांत, ध्वनि प्रभाव- सुमित एवं अनुरंजन, मंच एवं मंच सामग्री- निखिल एवं कमलेश पुरुष एवं पब्लिसिटी अभिषेक , छायांकन-प्रशांत, मंच व्यवस्थापक देशराज एवं स्वप्निल, परिकल्पना एवं निर्देशन अभिषेक एवं स्वप्निल ने किया है।