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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- स्मृति शेष : ललितजी का निधन एक अपूरणीय क्षति

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- स्मृति शेष : ललितजी का निधन एक अपूरणीय क्षति

कला, साहित्य संस्कृति और पत्रकारिता को छ: दशक तक अपनी सक्रिय सेवाएं देने वाले वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन के निधन पर उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से किया गया। ताजिंदगी मीडिया में सक्रिय, अपना सब कुछ देने वाले शख्स को राजनीतिज्ञों से जितना सम्मान, स्पेस मिला उतना स्पेस मीडिया में दिखाई नहीं दिया। यह मामला केवल ललित जी का नहीं है। एमडीएच मसाले के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी के निधन की खबरें आज मीडिया में प्रमुखता से दिखाई जा रही है। इसके पहले स्वामी अग्निवेश जिन्होंने बंधुवा मजदूरी के खिलाफ ताजिंदगी काम किया, उनके निधन की खबरों को भी मीडिया में स्पेस नहीं मिला। समाज से गंभीर चीजों की जगह धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। गैर जरुरी चीजें स्पेस पा रही हैं। हमारा मीडिया अपने साथियों, गंभीर व्यक्तियों को उतना स्पेस नहीं देता जितना बाबाओं, चुटकुलेबाज कलाकारों और निगेटिविटी फैलाने वाले लोगों को देता है।

अभी हाल ही में हमने सुशांत सिंह राजपूत, कंगना रानौत जैसे मामले में देखा। राजनेताओं से जीवन में नकलीपन सीखने वाला मीडिया उनसे यह अच्छी बात नहीं सीखता कि जब भी किसी भी पार्टी के नेता का निधन होता है, सभी नेता पार्टी लाईन छोड़कर खुलकर उनकी मृत्यु आयोजन में जाते हैं, उनके बारे में अपने विचार रखते हैं। मीडिया में ना जाने क्यों तंगदिली का बाजार कुछ ज्यादा है। काम के दौरान हो सकता है हमारे वैचारिक मतभेद हों, वैमनस्यता हो, व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा हो किन्तु क्या हम किसी व्यक्ति के योगदान को, जो हमारी अपनी बिरादरी का है, भूल सकते हैं। हर तरह की प्रतिद्वंदिता मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती है। वह यह देखने तो उपस्थित नहीं रहता कि उसके बारे में कौन क्या कह रहा है, कौन उसे कांधा दे रहा है किन्तु हां उनका परिवार, आत्मीय जन यह देखते हैं कि इस आदमी के योगदान को उसकी बिरादरी, उसका समाज किस तरह से याद करता है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की अंत्येष्टि में यदि बहुत कम लोग थे तो इससे मुंशी प्रेमचंद का कद कम नहीं हुआ बल्कि समाज के रवैय्ये और सोच का ही पता चला। जो समाज अपने पुरखों, मार्गदर्शकों, साहित्यकारों और अच्छे कार्य करने वालों का सम्मान नहीं करता, वह समाज धीरे-धीरे मूल्यहीन होने लगता है। कोई भी अमर पत्ता खाकर नहीं आया है। सभी को एक न एक दिन मरना है किन्तु यदि हम अच्छे काम करने वाले मृत व्यक्तियों के काम का सम्मान नहीं करेंगे तो फिर ये कैसे उम्मीद करें कि लोग हमारे काम को याद करेंगे।

हमारे समाज में बढ़ती फूहड़ता का कारण यह भी है कि हमने गंभीर चीजों को हाशिए पर डाल दिया है। विनोद कुमार शुक्ल जैसे ख्यातिनाम कवि, उपन्यासकार पद्मश्री से वंचित होते हैं और चुटकुलेबाज, दोयम दर्जे के कलाकारों को पद्मश्री मिल जाता है।


हिन्दी पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक, साहित्यिक दुनिया में पिछले छ: दशक से सक्रिय ललित सुरजन के निधन से प्रगतिशील मूल्यों में विश्वास करने वाले लोगों की ताकत कमजोर हुई है। पत्रकारिता, साहित्य कला जगत में हमेशा सक्रिय रहने वाले ललित सुरजन ने छत्तीसगढ़ में प्रगतिशील लेखक संघ, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा), इस्कस हिन्दी साहित्य सम्मेलन और ना जाने कितनी साहित्यिक संस्थाओं को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। अपने पुरातात्विक प्रेम के कारण उन्होंने पुरानी इमारतों, चीजों को सहेजने संवारने के लिए भी हरसंभव प्रयास किया। वे एक गंभीर विचारक, चिंतक थे जिनका नजरिया बहुत साफ था। वे यूं तो एक अखबार समूह के मालिक, प्रधान संपादक थे किन्तु हमेशा से वे आम आदमी के पक्ष में खड़े रहकर साम्प्रदायिकता और कट्टर पंथ के खिलाफ मोर्चा लेने में पीछे नहीं रहते थे। वे थोड़े आभिजात्य भी थे। वे सभी से सहज नहीं मिलते थे। वे अपनी मित्रमंडली चुनने में बहुत सजग थे। सत्ता के साथ दूरी दिखाने वाले ललितजी की सत्ता में भी अच्छी खासी पकड़ थी। वे नेताओं और ब्यूरोक्रेट के भी नजदीक थे। उनकी पकड़ केवल क्षेत्रीय नहीं होकर राष्ट्री य स्तर पर भी थी। संगठन और अपने समाचार पत्र समूह के माध्यम से उन्होंने बहुत से पत्रकारों, साहित्यकारों को प्रशिक्षित कर आगे बढ़ाया। अपनी वैचारिक प्रतिबद्घता और अपनी आधुनिक प्रगतिशील सोच की वजह से ललित सुरजन सामाजिक जीवन में अपनी विशिष्ट पहचान रखते थे। पिता मायाराम सुरजन से मिली साहित्यिक सांस्कृति कविरासत, हरिशंकर परसाई जैसी शख्सियत का साथ और लगातार नये पुराने साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों का सानिध्य और पढऩे-लिखने में गहन रुचि के कारण ललित सुरजन का व्यक्तित्व निखरता गया। उन्होंने अपनी सामाजिक प्रतिबद्घता के चलते साक्षरता अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वर्ष 1961 में जबलपुर में एक प्रशिक्षु पत्रकार के रुप में अपनी पारी की शुरुआत करने वाले ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते थे। साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, साम्प्रदायिक सद्भाव व विश्व शांति से संबंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी रुचि थी।

 अपने समाचार पत्र देशबंधु को पत्र नहीं मित्र बनाने वाले ललित सुरजन की मुस्कान पर बहुत लोग फिदा थे। बहुतों के लिए वे ललित भैय्या थे। छोटे-बड़े साहित्यिक, सांस्कृतिक आयोजनों में सहर्ष सहभागिता के लिए तत्पर स्व. ललित सुरजन ने अपने अखबारी लेखन के अलावा दो काव्य संग्रह अलाव में तपकर तथा तिमिर के झरने में तैरती अंधी मछलियों के अलावा बहुत से निबंध, यात्रा संस्मरण भी लिखे। उनके पांच काव्य संग्रह प्रकाशित है। इधर के दिनों में वे सोशल मीडिया के साथ-साथ देशबंधु समाचार पत्र में देशबंधु चौथा स्तंभ होने से इंकार सीरिज लिख रहे थे। जनसरोकारी और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के पक्षधर ललित सुरजन यूं तो वामपंथी प्रगतिशील विचारधारा से गहरे जुड़े थे किन्तु उनकी उपस्थिति रोटरी क्लब में भी दिखाई देती थी। आप फिल्म और नाट्य लेख, रंगकर्मी अशोक मिश्रा की तरह ललित सुरजन को अच्छा  कवि, अच्छा साहित्यकार, पत्रकार न माने आप उनसे  सहमत असहमत हो सकते थे किन्तु आप उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते हैं। वे सभी जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे फिर चाहे वह भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटेक) तथा भारतीय शांति एकजुटता संगठन ही क्यों ना हो।

अपने नवोदित साथियों को लेखन शिविर, पत्रकारिता की कार्यशालाओं के माध्यम से अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढऩे को प्रेरित करने वाले ललित सुरजन जी ने बहुत सी विदेशी कविताओं का अनुवाद भी किया। अभी हाल ही में उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर 24 नवंबर को मांगपत्र शीर्षक से फरीदा हसनजाद मुस्तफावी की फारसी कविता के अंग्रेजी अनुवाद को हिन्दी में अनुवादित कर पोस्ट किया।  

मांगपत्र

हुज़ूर !

क्या मुझे इजाज़त है

कि मैं अपने दिल की खिड़कियाँ

रौशनी के कोमल स्पर्श के लिए खोल सकूँ?

और फिर, दूर से ही सही,

जीवन की खूबसूरत नेमतों को निहार सकूँ?


हुज़ूर!

तीन सौ पैंसठ दिन में

सिर्फ एक दिन के लिए,

क्या मैं

आपकी हर वक्त की

यह करो और यह न करो

से मुक्त हो,

अपने आपको पा सकती हूं

अपने औरत होने को?


हुज़ूर! क्या मुझे इजाज़त है

कि मैं हरी घास पर लेटने की

अपनी आज़ादी हासिल कर सकूँ,

और प्रतीक्षा करती धरती को

अपनी देह और आत्मा की

गरमाहट से सहला सकूं

सूरज की किरणों से कुछ ज्यादा

मुरव्वत के साथ,

या फिर सुदूर मैदानों में

किसी अकेले पेड़ की डाल पर बैठ

पक्षियों के सुर में सुर मिलाकर गा सकूँ,

या नदियों से एकाकार हो

तैर लूँ उल्लास में भीगी मछलियों के साथ,

और बारिश के साथ अपनी

कानाफूसियां याद करते हुए

समर्पित कर दूँ खुद को

अपनी जन्म-जन्मांतर से प्रतीक्षित

स्वतंत्रता के सामने?


हुज़ूर!

क्या मुझे इजाज़त है

भले ही एक क्षण के लिए, कि

आपकी बनाई चौहद्दी के भीतर

रहते हुए मैं राहत पा सकूँ

बात करो, रुक जाओ, ऐसा नहीं,

और कभी नहीं के आदेशों के दर्द से ?


आला हुज़ूर!

अगर आपकी कृपा हो जाए तो

क्या मैं प्रेम का स्वप्न देख लूँ?

बगावत की पुरानी कविताओं की तड़प,

और एक गहरे चुंबन की उत्तेजना तथा

आज़ादी की खिलती चमक के बीच

घरेलू कामकाज की थकावट

जो औरतजात पर ही थोपी जाती है,

अपने आपको कहीं दूर ले जाऊँ?


हुजूर!

क्या मुझे इजाज़त है कि

चंद लम्हों के लिए मैं

सुई और धागे से,

कपड़ों और इस्तरी से

चूल्हे और चौके से

छूट्टी पा लूं,

और प्यार के अनंत आकाश तले

अपने होने को विलीन कर दूँ

भावना और बुद्धि के उन प्यार भरे क्षणों में,

जिनकी इजाज़त आपकी संहिता ने मुझे कभी नहीं दी?


हुज़ूर!

हुज़ूर!

क्या मुझे इजाज़त है कि

किसी दिन मैं पड़ौसी से

दुआ-सलाम कर सकूँ

या फिर अपने दबे हुए आँसुओं की लड़ी से

किसी मुसाफिर के लिए

बुन सकूँ एक मफलर?

और क्या मुझे इजाज़त है कि

बिना किसी परमिट के

गुलाबों की वेदी पर चढ़

बसंत के खुशनुमा बागों में भटक सकूँ?


हुज़ूर!

अगर आपकी कृपा हो जाए तो

क्या मैं थोड़ी सी खिल्ली उड़ा लूँ?

हाँ, मेरे आका, हँस लूँ, खिल्ली उड़ते हुए,

और तुम्हारे मुँह पर कह सकूँ

कि तुम्हारी लगाई पाबंदियाँ शर्मनाक हैं

और जिसे तुम न्याय और उचित कहते हो

दरअसल, वह बेहद घटिया शै है।