प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-अपनी अस्मिता, पहचान तलाशता आदिवासी समुदाय

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-अपनी अस्मिता, पहचान तलाशता आदिवासी समुदाय

विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष...


आज विश्व आदिवासी दिवस है। इधर लंबे समय से दिवस मनाने के पीछे एक रस्म अदायगी रह गई है। इतिहास को खंगाल कर वर्तमान को लेकर मंथन या विश्लेषण अब नहीं किया जाता है। रेड इंडियन्स की जो स्थिति रही है, वहां से चलकर भारत में भी आदिवासियों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं रही है। हमारे यहां तो सभ्य समाज के लिए आदिवासी आज भी मानव समाज के सदस्य नहीं कौतूहल की वस्तु है। मानव समाज का सामान्य सदस्य मानकर उसका सम्मान नहीं करते हैं, बल्कि उत्सुकता, कौतूहल या घृणा का पात्र मानते हैं। गोया वे किसी दूसरे ग्रह के वासी है, उनके प्रति दायित्व की प्राथमिकता में प्रदेशों की सरकारें उनके नृत्य-गायन का आयोजन करके दायित्व मुक्त हो जाती है। कभी सोचा ही नहीं गया कि नृत्य-गायन, भगोरिया आदि के अलावा भी उनका जीवन है, जहां सामान्य आदमी की तरह उन्हें भी भूख लगती है। रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतें आज भी उनकी सबसे बड़ी जरूरत और प्राथमिकता है।

आज भी लाखों आदिवासी अपने घर जमीन से पलायन करने महानगरों में मजदूरी कर रहे हैं। उनके जंगल-जमीन-घर आदि पर कब्जा करके उन्हें बेदखल किया गया, ऐसी स्थितियां पैदा ही हैं कि वे मूल्यों, अपनी परंपरा, बोली और संस्कृति से भी परोक्ष रुप में बेदखल किए जा रहे हैं। विकास के नाम पर भी लाखों आदिवासियों को अपनी जंगल और जमीन छोडऩी पड़ी। जितना सरकारों का रवैया आदिवासियों के प्रति गैरजिम्मेदाराना रहा समाज का नजरिया भी उपेक्षापूर्ण रहा। आदिवासियों को दी जाने वाली सुविधाएं और मूलभूत अधिकारों के प्रति जानकारियां भी मुट्ठी भर लोगों के पास रही और आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा आज भी जंगलों में लंगोटी बचाए घूम रहा है। आदिवासियों की विनम्र खामोशी को उनकी कमजोरी मान लिया गया और असहमति को विद्रोह। आदिवासी आज भी इन दो स्थितियों के बीच त्रिशंकु है। दुख की बात तो यह है कि जो आदिवासी जनप्रतिनिधि केन्द्र और प्रदेश सरकारों में जाकर बैठे उनका रवैया भी धीरे-धीरे अपने जंगल और आदिवासी समाज के प्रति उपेक्षापूर्ण हो गया।
देश की आबादी का करीब 9 प्रतिशत से अधिक यानी 12 करोड़ आदिवासियों के सामने आज भी अपनी जातीय अस्मिता और पहचान का संकट गहराया हुआ है। देश की स्वतंत्रता के बाद जब 1951 में पहली बार जनगणना हुई तो आदिवासियों के धर्म का कालम 9 वें नंबर पर ट्राइब के नाम से उपलब्ध था। 2011 से पहले धर्म कोड में 7वां कॉलम अन्य हुआ करता था, जिसे अब हटा दिया गया है। अपनी जातिगत अस्मिता तलाशता आदिवासी किसी के लिए वनवासी है, तो किसी के लिए हिन्दू, किसी के लिए धर्म परिवर्तित करके क्रिश्चियन है। आदिवासी समुदाय में 83 धार्मिक रीतियां प्रचलित है जिनके अनुसार वे अपनी-अपनी मान्यताओं, रीति-रिवाजों, देवी-देवताओं, शादी-ब्याह, जन्म-मृत्यु के संस्कारों को पूरा करते हैं। 1950 के पहले से ही गोंडवाना महासभा द्वारा कोया पूनेम धर्म की मांग शुरू की गई थी जो अब तक पूरी नहीं हुई। अब बहुत से आदिवासी अपने को हिन्दू मानने लगे हैं। जल, जंगल, जमीन जिनके जीवन का आधार है, ऐसे बहुसंख्यक आदिवासियों के लिए जंगल और पहाड़ उनकी आजीविका नहीं, उनके जीवन का हिस्सा है। आदिवासी संस्कृति, भाषा बोली को बचाने के उद्देश्य से 9 अगस्त 1995 को जेनेवा में हुई प्रथम बैठक के बाद से अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने की शुरूआत हुई। कोरोना संक्रमण के विश्वव्यापी कहर को देखते हुए इस वर्ष ही 2020 में कोविड-19 इंडिजेनस पीपुल्स रेसिलेंस रखी गई है।

छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज की ओर से विगत कई वर्षों से पेसा के अंतर्गत नियम बनाने की मांग विभिन्न स्तरों पर की जाती रही है। अभी तक छत्तीसगढ़ राज्य में नियम नहीं बनने के कारण पेसा अधिनियम का लाभ अनुसूचित क्षेत्रों के लोगों को नहीं मिल पा रहा है। जबकि भारत वर्ष के अन्य अनुसूचित जनजाति बाहुल्य राज्य जैसे आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के राज्य सरकारों द्वारा नियम बनाकर उसका क्रियान्वयन किया जा रहा है। फर्जी जाति प्रमाण-पत्रधारी शासकीय सेवकों को एक माह के अंतर्गत बर्खास्त करने की संपूर्ण कार्यवाही की जाएगी। सर्व आदिवासी समाज जो अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ज्ञापन देने जा रहा है। उनका कहना है कि अभी तक कितने फर्जी जाति प्रमाण-पत्र धारी शासकीय सेवकों को सेवा से बर्खास्त किया गया है। इस संबंध में सर्व आदिवासी समाज को अवगत नहीं कराया गया है। आदिवासी समाज जो नदी, पहाड़ों के बीच रहता है उसका कहना है कि अनुसूचित क्षेत्रों में बगैर ग्रामसभा के अनुमोदन के भूमि अधिग्रहण कर कोयला, लोहा, बॉक्साइट, चूना पत्थर इत्यादि कच्चा माल खदानों से निकाला जा रहा है और उसका मुआवजा भी प्रभावित आदिवासी परिवारों को नहीं मिल रहा है।

गोंड समाज विकास समिति इस आश्वासन के बाद भी आदिवासी समाज के ज्वलंत मुद्दे जिसमें प्रमुख भारत में अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम 1996 बनाया गया है जिसे पेसा कानून कहा जाता है। इसमें अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों एवं ग्राम सभा को जल, जंगल ,जमीन से संबंधित विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार देने का प्रावधान है, लेकिन आज दिनांक तक इस कानून का क्रियान्वयन नहीं किया गया है। जिसे तत्काल लागू करने की मांग रखी है।

भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (ख) के तहत आदिवासी अपनी खोई हुई जमीन का केस जीत तो जाता है, लेकिन प्रशासन पर राजनीतिक दबाव के कारण उसे वास्तविक कब्जा नहीं मिल पाता। साथ ही इन प्रकरणों को राजस्व मंडल एवं उच्च न्यायालय में उलझा दिया जाता है, परंतु राज्य सरकार के द्वारा इन प्रकरणों में आदिवासी वर्ग का प्रतिरक्षण नहीं किया जाता है। 170 ख के मामले में कड़ा नियम बनाने की मांग भी की गई है।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी नेता बांग्लादेशी शरणार्थियों को कोसते हुए कह रहे हैं कि उसने आदिवासियों की घर-ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है। ये शरणार्थी जंगल काट रहे हैं, और उस पर कब्ज़ा कर रहे हैं। आदिवासी लड़कियों से ब्याह कर ये चुनावी राजनीति में घुस गए हैं। सच कहें तो इनके कारण आदिवासी समाज संकट में आ गया है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष और वरिष्ठ बीजेपी नेता नंदकुमार साय ने इस आशय की बात कही। वहीं सर्व आदिवासी समाज के नेता बीपीएस नेताम ने कहा है कि बाहरी शरणार्थियों के कारण आदिवासी हाशिए पर चले गए। 1960 के बाद से लगातार बांग्लादेशी यहां आकर बस रहे हैं। यहां का आदिवासी अल्पसंख्यक हो रहा है।

हमने देखना है कि अपनी जीवटता, साफ-सुथरी, जीवन-शैली और एक दूसरे से दूरी पर रहने के कारण आदिवासी क्षेत्रों में कोरोना का संक्रमण उस तरह से नहीं फैला जैसा शहरीय क्षेत्रों में। आदिवासियों में नागर समाज की तुलना में ज्यादा इम्युनिटी होती है। वे महामारी, प्राकृतिक आपदा विपक्ष को स्वीकार कर उससे जूझते हैं। उनके भीतर एक तरह का लचीलापन और प्रकृति से जुड़ाव उन्हें बहुत सारी बीमारियों से बचाता है, किंतु बहुत बार वे छोटी-छोटी बुनियादी सुविधाओं और बीमारियों की वजह से जीवन को खो देते हैं।

जल, जंगल और जमीन पर ही निर्भर रहने वाले आदिवासी सदियों से नदी के किनारे और जंगल में बसे रहते है। इन लोगों का संसाधनों पर नैसर्गिक अधिकार रहा है, लेकिन नवउदारवादी व्यवस्था की आड़ में अक्सर इन्हें इनके अधिकार से वंचित होना पड़ता है। देश में जल-जंगल-जमीन को लेकर झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सबसे खराब हालात देखने को मिलते हैं। सबसे ज्यादा उत्खनन कंपनियां इन्हीं राज्यों में सक्रिय हैं। नक्सल को लेकर सबसे ज्यादा हौवा भी इन्ही क्षेत्रों में खड़ा किया गया है। आदिवासी आज भी अपनी अस्मिता अपने जल-जमीन-जंगल के लिए संघर्षरत है। अधिकांश नेता जो आदिवासी क्षेत्रो से चुनकर आते हैं, अपने ही सजातियों से वर्ग शत्रु की तरह व्यवहार करते हैं।