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गुरु पूर्णिमा पर विशेषः माता, पिता, गुरु, दैवम

गुरु पूर्णिमा पर विशेषः माता, पिता, गुरु, दैवम


प्रश्न: हमारी संस्कृति ने हमें सदैव बताया है, "माता, पिता, गुरु, दैवम"। इस उक्ति का वास्तव में क्या अर्थ है ?

सदगुरु: जब वे कहते हैं, "माता, पिता, गुरु, दैवम" तो वास्तव में उनका कहना ये है कि, "माता, पिता, गुरु और दिव्यता"। मैं चाहता हूँ कि आप इसे सही संदर्भ में समझें। जब आप का जन्म होता है तब आप के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन होता है? ईश्वर तो बिलकुल ही नहीं! न ही गुरु, और न ही पिता!! ये माँ होती है। उस समय, जब आप को स्तनपान की, गले लगाने और चूमे जाने की तथा पोषित किये जाने की आवश्यकता है, तब माँ ही महत्वपूर्ण है। मुझे नहीं लगता कि इसे कहने की भी कोई ज़रूरत है। यह एकदम स्पष्ट ही है। जीवन स्वयं यह कह रहा है कि नवजात शिशु के लिये माँ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।


जब वे कहते हैं, "माता, पिता, गुरु, दैवम" तो वे बस जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया के बारे में ही एक वक्तव्य दे रहे हैं। जब बच्चा चलना शुरू करता है तो पिता महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पिता को बाहरी दुनिया की परिस्थितियों के बारे में जानकारी है, वहाँ उसकी पहुँच है। इसे आज के संदर्भ में मत देखिये, उन दिनों, पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। अगर बच्चे को दुनिया के बारे में, जीवन के कौशलों के बारे में तथा समाज में कैसे रहना है, इसके बारे में जानना हो तो उन दिनों पिता की भूमिका महत्वपूर्ण थी। जब ये सब हो जाता है तो एक उच्चतर संभावना को प्राप्त करने के लिये, गुरु आवश्यक हैं। अगर आप को एक उच्चतर संभावना के बारे में जिज्ञासा है, उसे पाने की ललक है और आप उसे पाने में सफल हो जाते हैं तो दिव्यता एक स्वाभाविक वास्तविकता हो जाती है।

जब वे कहते हैं, "माता, पिता, गुरु, दैवम" तो वे जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया के बारे में एक वक्तव्य दे रहे हैं।

संस्कृत की आधी-अधूरी समझ होने के कारण लोग हर तरह के अर्थ निकालते रहते हैं। माँ कहती है, "ये उक्ति बताती है कि माँ ही प्रथम है, तुम्हें पूर्ण रूप से मेरे प्रति ही समर्पित होना चाहिये" । पिता कहता है, "मैं दूसरे नंबर पर हूँ, तुम्हें मेरे प्रति समर्पित होना चाहिये, गुरु और फिर परमात्मा की तरफ आगे मत बढ़ो, यह आवश्यक नहीं है"। अगर लोग इस तरह की बात करने की कोशिश कर रहे हैं तो ये दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि आप की माँ सिर्फ माँ नहीं है, पिता सिर्फ पिता नहीं हैं, वे भी उसी तरह के जीव हैं जैसे कि आप हैं। उनका भी विकास होना चाहिये। उनका विकास तो आप से पहले होना चाहिये था। अगर माता -पिता विकसित होना भूल गये और बच्चे उन्हें राह दिखा रहे हैं, तो ये बड़े सौभाग्य की बात है। माता - पिता को इसका सदुपयोग करना चाहिये।


अगर आप का जीवन सांसारिक है तो जन्म से आप की यात्रा बस गर्भ से क़ब्र तक की होगी। अगर आप जागरूकता और जिज्ञासा का जीवन जीते हैं तो जन्म से दिव्यता की ओर आप की यात्रा घर वापसी की यात्रा जैसी होगी। अतः, यह युक्ति इस यात्रा की बात कर रही है। वे जीवन के क्रम का सुझाव दे रहे हैं। अगर आप की जीवन यात्रा जागरूकता की यात्रा है तो पहले माँ, फिर पिता की भूमिका, तब गुरु की भूमिका और फिर दिव्यता।

यदि आप जन्म से ले कर दिव्यता तक जागरूकता और जिज्ञासा का जीवन जीते हैं, तो ये घर वापसी की यात्रा है।

माँ आप को पालती है और आप का पोषण करती है, पिता आप का मार्गदर्शन करते हैं, गुरु आप को गूंथते हैं क्योंकि जब तक आप गूंथे न जायें तब तक कुछ भी अच्छा नहीं कर सकते। जब तक आटे को अच्छी तरह से गूंथें ना जाए, तब तक वैसी रोटी नहीं बन पाएगी जिसे कोई भी खाना चाहे। आप को वैसी रोटी बनाने के लिये, जिसका परमात्मा उपभोग करना चाहें, गुरु की आवश्यकता है।

लेकिन, गुरु केवल एक साधन ही है, एक माध्यम है, वह परे जाने का द्वार है। जब द्वार खुलता है तभी आप दूसरी ओर देख सकते हैं। तो इसलिये द्वार बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह इस द्वार की फ्रेम के माध्यम से ही होता है कि आप दूसरी ओर देखते हैं। गुरु सिर्फ इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि ये आप को बाहर पहुँचा देता है। यदि आप कमरे में बंद हैं तो द्वार ही परे की संभावना है।