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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-बिहार में का बा और ई बा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-बिहार में का बा और ई बा


बिहार में इस बार का बा और ई बा का शोर है।
अभिनेता मनोज वाजपेयी जो बिहार के ही हैं, का एक रैपसांग पर आधारित वीडियो आया जिसमें बम्बई में का बा बोल थे। इसके बाद बिहार की गायिका नेहा सिंह राठौड़ ने एक रैप सॉग तैयार किया जिसमें बिहार में का बा गाया। इस गाने के जरिये बिहार की दुर्दशा और व्यवस्था पर तंज कसा गया। इस गाने की सोशल मीडिया पर धूम मचने के बाद भाजपा ने गायिका मैथिली ठाकुर के जरिये बिहार में ई बा गाने के वीडियो वायरल किया। इस गाने के जरिये एक तरह से बिहार सरकार की उपलब्धियों का गान किया गया।

भिखारी ठाकुर की लोकनाट्य रचना बिदेसिया के जरिये बिहार की व्यथा गीत काफी चर्चित रही है किन्तु नये दौर में अब सोशल मीडिया का बा और ई बा के रूप में बिहार की एक और कहानी के दो रूप आये हैं और इसे गाने वाली दो महिला है। चुनाव के समय कलाकारों को याद करने की संस्कृति के वाहक नेता गण अच्छे से जानते हैं कि वे अब जनता का ध्यान अपने लच्छेदार भाषणों से आकर्षित नहीं कर सकते तो उन्हें गीत संगीत लोक कलाकारों की याद आती है। उन्हें याद आता है जातिगत समीकरण। विकास के सारे दावे धरे रह जाते हैं और टिकिट का बंटवारा जाति देख-देखकर होता है। जात ही पूछो नेता की।

किसी समय देश का बौद्घिक और राजनीतिक केन्द्र रहा पाटलीपुत्र मगध जहां से मौर्य गुप्त जैसे राजवंशों ने शासन किया जो अपने ज्ञानकेन्द्र नालंदा के कारण जाना जाता रहा है। जिसका नामकरण बौद्ध बिहारों के कारण बिहार पड़ा। वह अब का बा और ई बा गा रहा है। कवि श्रीकांत वर्मा की कविता है-

राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए

वे सिफऱ् कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं
जैसे कि यह
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है।


राजनीतिक पार्टियों का बा और ई बा उपयोग अपने पक्ष में कर रही है।

नेहा सिंह द्वारा गाये गानो के बोल
बिहार में का बा कोरोना से बीमार बा बाढ़ से बदहाल बा।
भरी जवानी में मंगरुवा गलत ठेगुरवा चाल बा।
अरे का बा बिहार में का बा। 15 साल चचा रहलन 15 साल पप्पा। तबो ना मिट बेरोजगारी का ठप्पा।
जब सइया होले मोरे अरब के रवाना तब तब जियरा खोजे एहो इहा खारखाना। बोला का बा।

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने आज से चालीस-पचास साल पहले एक व्यंग्य लिखा था हम बिहार के चुनाव लड़ रहे हैं। इस व्यंग्य रचना पर रंगमंच और टीवी के अभिनेता विजय कुमार की शानदार एकल नाट्य प्रस्तुति है। बिहार में व्याप्त जातिवादए राजनीति पर यह करारा व्यंग्य है। भगवान कृष्ण के चुनाव में खड़े होने को माध्यम बनाकर यह व्यंग्य फैंटसी के माध्यम से रचा गया है। परसाई जी की व्यंग्य रचना इतने अंतराल बाद भी बिहार का राजनीतिक परिदृश्य लगभग यथावत है।

कृष्ण ने कहाए श्श्मैं ईश्वर हूं। मेरी कोई जाति नहीं है। उन्होंने कहा देखिए नए इधर भगवान होने से तो काम नहीं न चलेगा। आपको कोई वोट नहीं देगा। जात नहीं रखिएगाए तो कैसे जीतिएगा। जाति के इस चक्कर से हम परेशान हो उठे भूमिहार, कायस्थ, क्षत्रिय, यादव होने के बाद ही कोई कांग्रेसी, समाजवादी या साम्यवादी हो सकता है। कृष्ण को पहले यादव होना पड़ेगा फिर चाहे वे माक्र्सवादी हो जाएं।

यह वहीं बिहार है जहां पर लालूप्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवानी की रथयात्रा को रोक दिया था। उसी बिहार में नीतिश कुमार के शासनकाल में पहली बार 2018 में रामनवमी के समय औरंगाबाद, नवादा, रोसडा और भागलपुर में दंगे हुए। मुस्लिम और यादव मतदाताओं के भरोसे लालू यादव की पार्टी जीतती थीए वह भी अब बिखर सा गया है। बीजेपी और नितिश कुमार ने बिहार में सवर्ण के साथ.साथ पिछड़े वर्ग और दलित वर्ग में अपनी पैठ मजबूत की है। 2015 के चुनाव में पुरुषों की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक महिलाओं ने मतदान किया था। नीतिश कुमार सरकार ने पूर्ण शराबबंदी लागू करके महिला मतदाताओं को निश्चित ही प्रभावित किया है। एनडीए गठबंधन 15 साल राज करने के बावजूद एक बार फिर से लोगों को लालू प्रसाद यादव के शासन की याद दिलाते हुए विकास बनाम विनाश की बात दोहरा रही है। आरजेडी कांग्रेस और वामदलों का गठबंधन दस लाख युवाओं को नौकरी देने, फीस माफ करने तथा नई दशा बनाम दुर्दशा जैसे मद्दों के साथ चुनाव मैदान में हैं।

बिहार के चुनाव के लिए टिकटों का जो बंटवारा हुआ है वह भी पूर्णता जातिवादी समीकरण को ध्यान में रखकर किया गया है। बिहार में मुख्यत: 16 प्रतिशत दलितए 16 प्रतिशत मुस्लिम 15 प्रतिशत यादव  है। इसके अलावा अगड़ी जाति के रूप में 5.5 प्रतिशत ब्राह्मण भूमिहर 4 प्रतिशत राजपूत एक प्रतिशत कायस्थ है। बिहार में 15 साल के नीतिश कुमार के सुशासन के दावों के बावजूद चुनाव में जातियों का समीकरण ही ज्यादा हावी है। नीतिश कुमार भी सोशल इंजीनियरिंग और सुशासन बाबू के तमगे के बावजूद आज बिहार में 22 महादलित जातियों को साधने की राजनीति चरम पर है। रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की राजनीति पर सबकी नजर है। अपने आपको मोदी जी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान खुलेआम नितिश कुमार की आलोचना करके उन्हें अगला मुख्यमंत्री नहीं देखना चाहते। इसके लिए वे अपने दिवंगत पिता की इच्छा और आदेश की बात कह रहे हैं। दिल्ली की राजनीति में एनडीए के साथ दिखने वाले चिराग पासवान बिहार में अधिकांश जगहों नीतिश कुमार की पार्टी से उम्मीदवार खड़े कर रहे हैं। भाजपा उन्हें वोट कटवा पार्टी कहकर भले ही पल्लेे झाड़ रही हो किन्तु यदि उन्हें ज्यादा सीटें मिलती हैं और नीतिश कुमार की पार्टी बहुमत के लिए पर्याप्त सीटें नहीं जुटा पाती तो फिर चिराग भाजपा को बिहार की सत्ता के लिए अलादीन का चिराग सिद्ध हो सकते हैं।
बिहार विधानसभा में 57 ऐसी सीटें है जहां मुस्लिम मतदाता किसी भी प्रत्याशी को हरा-जीता सकते हैं। इस बार जेडीयू प्रमुख नीतिश कुमार ने 115 में से 30 सीटों पर एमवाई 11 मुसलमान और 19 यादव को उतारकर तेजस्वी यादव की जीत को रोकने की कोशिश की है।

कांग्रेस ने भाजपा की राह पर चलते हुए 70 में से 32 सीटों पर सवर्ण उम्मीदवा उतारे हैं। बिहार चुनाव में नीतिश कुमार के लिए पहली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रचार करने वोट मांगने जा रहे है। 15 सालों में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की बात हो गया लालू राज मुक्ति दिलाकर सुशासन स्थापित करने की बात हो ये मुद्दे अब उतने महत्वपूर्ण नहीं रह गये हैं जितने कि जातिवाद समीकरण। जातिवाद की राजनीति में असली चुनावी मुद्दे कहीं नेपथ्य में चले गये है। अगड़ी-पिछड़ी, शोषित, दलित समाज की लड़ाई के बीच हर उम्मीदवार अपने जातिय समीकरण को साधने में लगा है।

बिहार का व्याप्त जातिगत समीकरण को उजागर करते हुए हरिशंकर परसाई ने हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं व्यंग्य में लिखा है कि भारतीय राजनीति में व्याप्त अवसरवाद, मूल्हीनता और अस्थिरता को देखकर हर सच्चे जनसेवक का हृदय फटने लगता है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण आज देश के करोड़ों मानव भूखे हैं नगे हैं बेकार। वे अकाल बाढ़ सूखा और महामारी के शिकार हो रहे हैं। असंख्य कंठों से पुकार उठ रही है हे भगवान आओ और नई राजनीतिक पार्टी बनाकर सत्ता पर कब्जा करो और हमारी रक्षा करो। जनता के आत्र्तनाद को सुनकर भगवान कृष्ण बिहार में अवतरित हो गए हैं और उन्होंने हरिशंकर नारायण प्रसाद सिंह नाम के विश्वविख्यात जनसेवक के साथ मिलकर एक पार्टी की स्थापना कर ली है।
पार्टी का नाम भारतीय जनमंगल कांग्रेस होगा। नाम में जन या जनता या लोक रखने का आधुनिक राजनीति में फैशन पड़ गया है। इसीलिए हमने भी जन शब्द रख दिया है। जनता से प्रार्थना है कि जन को गंभीरता से न लें इसे वर्तमान राजनीति का एक मजाक समझें। पार्टी के नाम से भारतीय इसलिए रखा है कि आगे जरूरत होएतो भारतीय जनसंघ के साथ मिलकर सत्ता में हिस्सा बंटा सके।

कांग्रेस हमने इसलिए रखा है कि अगर इंदिरा जी वाली कांग्रेस को अल्पमत सरकार बनाने की जरूरत पड़ेए तो पहले हमें मौका दें। जनता शब्द की व्याख्या किसी दल ने नहीं की है। हम पहली बार ऐसा कर रहे हैं। जनता उन मनुष्यों को कहते हैं जो वोटर हैं और जिनके वोट से विधायक तथा मंत्री बनने हैं। इस पृथ्वी पर जनता की उपयोगिता कुल इतनी है कि उसके वोट से मंत्रिमंडल बनते हैं। अगर जनता के बिना सरकार बन सकती है तो जनता की कोई जररूत नहीं है।

जनता कच्चा माल है। इसमें पक्का माल विधायक, मंत्री आदि बनते हैं। पक्का माल बनने के लिए कच्चे माल को मिटना ही पड़ता है।
हम जनता को विश्वास दिलाते हैं कि उसे मिटाकर हम ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाएंगे। हमारा न्यूनतम कार्यक्रम सरकार में रहना है।