कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः उपमाओं में बसी देह

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः  उपमाओं में बसी देह


उतरी कविता

आकाशगंगा से मस्तक पर

हृदय की गहराई में हिलुरी

नसों-नाड़ियों में बहकर

भवसागर में समा गयी

अनगिन उपमाएँ पाकर

धन्य हुई यह देह


देह के कमलों जैसे नयन

भुजाएँ दसों दिशाओं जैसी

अनन्त-सा रंग साँवरा

चन्द्रिका जैसा गोरा

तरुण-अरुण-सी देह

प्रियतम और प्रियतमा जैसी


बस्ती जैसी देह

बसे हैं जिसमें डेरा डाल

काल-कर्म-गुण-विद्या-भाव

ऐसी जैसे भवसागर की नाव

हाथों जैसी पतवार नियति की 


बूढ़ी होती पृथ्वी की माटी जैसी

सुख-सी, दुख-सी

उपमाओं में बसी देह

नयनों के जल में प्रतिबिम्बित

कभी साँवरी-सी, गोरी-सी

विरह-मिलन-सी