मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग ने कहा, 'फेक न्यूज के पीछे राजनीति' दैनिक आज की जनधारा के 29वें स्थापना दिवस पर राष्ट्रीय वेबीनार

मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग ने कहा, 'फेक न्यूज के पीछे राजनीति' दैनिक आज की जनधारा के 29वें स्थापना दिवस पर राष्ट्रीय वेबीनार

जनधारा संवाददाता
रायपुर. दैनिक आज की जनधारा के 29वें स्थापना दिवस के अवसर पर आज सायं राष्ट्रीय वेबीनार सडडू स्थित जनमंच' में आयोजित किया गया. इसके मुख्य अतिथि मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार, पदमश्री विजय दत्त श्रीधर थे. उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का भाव बढ़ा है, भय बढ़ा है लेकिन इसकी प्रतिष्ठा घटी है. बाजार और विज्ञापन के दबाव के कारण मीडिया को जनहित को भी नजरअंदाज कर दिया. भाषा के क्षरण ने भी मीडिया की साख को गिराया है. कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व आइएएस डॉ. सुशील त्रिवेदी ने की. कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल पारे ने करते हुए कहा कि मीडिया दबाव में है. हमने ऐसी पीढ़ी पैदा नही कि जो दबाव झेल सके, डांट सह सके. कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन दैनिक आज की जनधारा के संपादक अनिल द्विवेदी ने किया. कार्यक्रम में स्थानीय संपादक विवेक मिश्रा, रंगकर्मी श्रीमती रचना मिश्रा, सुरूचि मिश्रा सहित अनेक श्रोतागण उपस्थित थे.


फेक न्यूज के पीछे राजनीति : रूचिर गर्ग

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग ने वेबीनार में अपने विचार रखते हुए कहा कि फेक न्यूज की चुनौती है. आपको याद होगा फिल्म पीपली लाइव. पीपली लाइव में जो बहस थी, वो टीआरपी को लेकर बहस होती थी, लेकिन आज यह बहस बहुत आगे निकल चुकी है. मीडिया पूरी तरह से रेगुलेटेड मीडिया है. मीडिया का सेल्फ रेगुलेशन होना चाहिए था. फेक न्यूज पैदा की जा रही है. फेक न्यूज का लक्ष्य स्पष्ट है कि सुनियोजित तरीके से देश में खास एजेंडा के साथ फेक न्यूज प्रसारित किया जाता है. कई अखबारों के संपादक रहे श्री गर्ग ने आगे कहा कि चाहे वो दो हजार के नोट में चिप की बात हो या अरूंधति राय को लेकर सेना के बयान का हो. फेक न्यूज की अगर समीक्षा कर ली जाए तो आप को पता लगेगा कि यह सब राजनीति के तहत है. उन्होंने श्रवण गर्ग की टिप्पणी को लेकर कहा कि विवि से निकल रहे छात्रों में आज राजनीतिक चेतना का अभाव है. सोशल मीडिया का खतरनाक तरीके से इस्तेमाल हो रहा है. यह बड़ी चुनौती, बड़ा खतरा है.

मीडिया का भाव और भय बढ़ा, प्रतिष्ठा घटी : पदमश्री विजयदत्त श्रीधर

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार, संपादक रह चुके, पदमश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि आज पत्रकारिता का भाव बढ़ा है, भय बढ़ा है लेकिन इसकी प्रतिष्ठा घटी है. बाजार और विज्ञापन के दबाव के कारण मीडिया को जनहित को भी नजरअंदाज कर दिया. भाषा के क्षरण ने भी मीडिया की साख को गिराया है. आज पाठक, दर्शक और श्रोता निराश है क्योंकि मीडिया का राजनीतिकरण होता जा रहा है. वह पार्टी और खेमों में बंटता जा रहा है और राजनेता मीडिया का उपयोग अपने फायदे के लिए कर रहे हैं. मीडिया ने अपनी आजादी बाजार और तमाम तरह की शक्तियों के सामने गिरवी रख दी है. हालांकि जब पूरे विश्व में आर्थिक आजादी खतरे में थी तब हिंदुस्तान बचा हुआ था. उन्होंने कहा कि भारत का संविधान दुनिया का एकमात्र संविधान है जहां विज्ञान को अहमियत दी गई है. उन्होंने कहा कि मीडिया में पूरी तरह से बर्बादी नहीं आई है, तो पूरी तरह अच्छाई भी नहीं है। थोड़े अलग किस्म के रुपांतरण मिल जाते हैं। इसके बाद भी बहुत सारे बिंदु है जो लगातार इकट्ठे होते जा रहे हैं और हमें परेशान कर रहे हैं। ये परेशानी समाज को है ऐसा तो नहीं लगता है। मगर जिस तरह की अराजकता का माहौल है सत्ता में विराजित लोग की इसका फायदा उठाते हैं। लेकिन यह सब ज्यादा चिंता का सबब मीडिया वालों को है। क्या अखबार निकालना वैसा ही धंधा है जैसे साबुन या अन्य समान बेचना। क्या मी़डिया टीआरपी के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। एक सवाल और भी है कि क्या तिजोरियां भरने के लिए करोड़ों पाठकों का भरोसे को दांव पर लगाया जा सकता है। 

मीडिया मालिकों के स्वार्थ पत्रकार को भटका रहे हैं : डॉ.सुशील त्रिवेदी

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व आइएएस और लेखक डॉ. सुशील त्रिवेदी ने वेबीनार का सारतत्व सामने रखते हुए कहा कि स्वतंत्रता समानता के साथ मीडिया तीनों स्तंभों को सतर्क करता था, पर अब वो नही हो रहा. बड़े मीडिया हाउस मजबूरीवश ही सही, अपना काम नही कर पा रहे लेकिन छोटे समाचार—पत्र अपनी बात सामने ला रहे हैं. कई न्यूज चैनल तो मनोरंजन करने में जुटे हैं. वे धार्मिक पक्षपात तक कर रहे हैं. राष्ट्रपतिा महात्मा गांधी की हम 150 जयंती मना रहे हैं, उस समय गांधीजी जी ने लिखा था कि बेईमानी ईमानदार लोगों को गलत रास्ते पर ले जा रही है. आज का मीडिया इसी का शिकार है. मीडिया उद्योग बन चुका है. मीडिया मालिकों के अपने स्वार्थ हैं इसलिए पत्रकार भटक रहे हैं. डिजिटल मीडिया जनता के नाम पर कुछ भी दिखा रहा है, छाप रहे हैं. सबसे ज्यादा परेशान सरकार के नियम नही, अपनी अनैतिकता करती है. पूंजी से बंधे हुए अखबार हैं.

जनता को विश्वसनीय मीडिया चाहिए : ईश्वर सिंह दोस्त

एनडीटीवी के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार ईश्वर सिंह दोस्त ने कहा कि पत्रकारिता कमजोर पड़ती है तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है. मीडिया से मीडिया को खतरा हो सकता है. जनता की भूमिका सोशल मीडिया के बाद में और ज्यादा हो रही है. आज एक सवाल हमें पूछना चाहिए कि क्या जनता को किसी विश्वसनीय मीडिया की जरूरत है. बात उस जनता की नहीं है जो पड़ी लिखी नहीं है, जिन्हें मीडिया की कीमत नहीं मालूम है. मैं बात कर रहा हूं पढ़े-लिखे तबके की और जिसको कई बार सांस्कृतिक तबका भी कहा जाता है. जिनको लगता है कि विश्वसनीय मीडिया की जरूरत नहीं है. एक विज्ञापन की जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज जनता को खुशियां ही अफवाहों से मिल रही है. वह अफवाह जो सोशल मीडिया में तैर रही है. यह लोकतंत्र है जिसमें बोलने, रोजगार, सुरक्षा, स्वतंत्रता, लिखने, सोचने का अधिकार होना चाहिए. न्याय का अधिकार होना चाहिए. अफवाहों से खुश होने का अधिकार जो है उस पर रोक लगना चाहिए. संकट मीडिया का नहीं है संकट पत्रकारिता है. पत्रकारिता के मूल्यों का है. पत्रकार निष्पक्ष हों, सच्ची खबर और तथ्यात्मक खबरे दें, जिस पर स्वतंत्र राय होना चाहिए. विचार लोगों के अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन तथ्य झूठा नहीं होना चाहिए.

सरकार से सवाल करना भूल गया है मीडिया : राकेश पाठक

आनलाइन वेबिनार को आगे बढ़ाते हुए ग्वालियर के डॉ.राकेश पाठक ने कहा कि 14 करोड़ की बेरोजगारी के खिलाफ एक किसी फिल्मी कलाकार के आत्महत्या के मुद्दे को देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना देता है मीडिया. मीडिया जो करोड़ों लोगों के विस्थापन को भूलकर,  आजादी के बाद विभाजन के समय को, कोरोना काल में विस्थापन जिसमें मजदूरों ने कामगारों ने एक जगह से दूसरे जगह दो पहिया, तीन पहिया और पैदल चलकर कुछ लोगों ने जान भी दी, को भूलकर, सरकार से सवाल करना छोड़कर मीडिया अपने काम में लगा है. कई अखबारों के पूर्व संपादक श्री पाठक ने आगे कहा कि मीडिया ने सरकार से सवाल नहीं पूछा कि जिसके पास प्रवासी मजदूरों का आकंड़ा भी नहीं है, दुर्भाग्य की बात है कि मीडिया सवाल पूछना भूलकर लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है. आश्चर्य की बात है कि जनरूचि के नाम पर सब कुछ थोप दिया जाता है, यह कहकर कि जनता वही देखना चाह रही है तो टेलीविजन दिखा रहे हैं.

बड़ी चुनौती फेक—पेड—एजेंडा न्यूज की है : कमलेश पारे

भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार कमलेश पारे ने कहा कि जिस मीडिया को हम लोकतंत्र का पहरी कहते हैं, वह किस तरह व्यवहार कर रहा है. आज मीडिया के लिए बुरा दौर है. पत्रकारों की नौकरियां जा रही हैं और संस्करण बंद हो रहे हैं. आज मीडिया कार्पोरेट की भाषा में बात करना चाहता है ना कि शुद्ध हिंदी की. यह हमारे विचार के साथ खिलवाड़ है. ये हमें अधचकरी और सरकारी जानकारियां उपलब्ध करा रही हैं. यह कोरोना के कारण हो रहा है, ऐसा बिल्कुल नहीं है. कादंबिनी का बंद होना कोरोना आने के पहले से तय हो चुका था. सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने फेक न्यूज, पेड न्यूज और एजेंडा न्यूज की है.

मेनस्ट्रीम मीडिया से ज्यादा बेहतर डिजिटल मीडिया : मिनहाज असद

नाट्य निदेशक व समीक्षक मिनहाज असद ने कहा कि हर पत्रकार की अपनी सोच होती है लेकिन पत्रकार का क्या कहना. मीडिया को अब गोदी मीडिया कहना वाजिब है. आज के दौर में समानांतर पत्रकारिता की जरूरत है. साहित्य का काम अब कम हो गया है. बड़े बड़े मीडिया हाउस जो काम नहीं कर पा रहे हैं, उसे अब डिजिटल मीडिया कर रही है. डिजिटल मीडिया जिस तरह से काम कर रहा है, वह काबिले तारीफ है. अपनी आवाज को पहुंचाने का माध्यम है।

मीडिया आम जनता के साथ नही, कंगना रानाउत के साथ है : रघुराज सिंह

मध्य प्रदेश में अपर संचालक रहे रघुराज सिंह ने कहा कि आजादी के पहले मूल्यपरक पत्रकारिता होती थी और अब मूल्यहीन. मीडिया ने समाज और डेमोक्रसी के सामने कई चुनौती पैदा की है. कमजोर होते मीडिया का फायदा ताकतवर लोग उठाते हैं. गांधी, जवाहर, माखनलाल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पहले मूल्य ही पत्रकारिता हुआ करती थी. विभाजन का नतीजा अब देखने को मिल रहा है. बोलने की आजादी मिली लेकिन अब वह छिनती जा रही है. पहले मीडिया की सम्मानजनक प्रवृति थी. मीडिया के दो काम रहे हैं सूचना पहुंचाना और राज की समीक्षा करना जो मीडिया ने लगातार किया. आपातकाल में मीडिया के हक को छीना गया था लेकिन इसे मीडिया ने नहीं स्वीकारा. आज की स्थिति वैसी है जैसी कि 50 के दशक में थी. मीडिया के रोल को हम नहीं नकार सकते हैं. मीडिया के बोल भी बदले हैं, वह पार्टीगत होता जा रहा है. यह धारणा कैसी बन गई कि मेरी बात को कौन छापेगा या सुनेगा. मीडिया आम जनता के साथ नहीं है, वो कंगना राणावत, या किसी बड़े वर्ग के साथ है।

अभिव्यक्ति के नाम पर प्रशासनिक जेहाद : सुभाष मिश्र

आनलाइन वेबीनार की शुरूआत अतिथियों के स्वागत से हुई तत्पश्चात दैनिक आज की जनधारा समाचार—पत्र तथा जनधारा24 न्यूज चैनल के प्रधान संपादक श्री सुभाष मिश्र ने आधार वक्तव्य रखा. उन्होंने कहा कि इस आयोजन के माध्यम से हम मीडिया की चुनौतियों पर विमर्श करेंगे. आज प्रतिरोध सुनने को कोई तैयार नही है, सब जय—जयकार चाहते हैं. ऐसे में बड़ा सवाल है कि मीडिया सर्वाइव कैसे करेगा. अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम मिक्स मीडिया को देख रहे हैं. मीडिया जनता की आवाज जरूर है लेकिन अभिव्यक्ति के नाम पर प्रशासनिक जेहाद की बात कर रहे हैं. कार्पोरेट पूंजी के सामने हमारे जैसे छोटे मीडिया हाउस भी हैं जो इस तरह कोशिश कर रहे हैं कि हम मुक्तिबोध की परंपरा से बात करते हैं, जिन्होंने कहा था कि जैसी है दुनिया, उससे बेहतर चाहिए, सारा कचरा साफ करने के लिए एक मेहतर चाहिए. हम इसी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं.