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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-अनुशासन और उत्सव की नवरात्रि

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-अनुशासन और उत्सव की नवरात्रि

नवरात्रि का पर्व प्रारंभ हो रहा है। कुछ लोगों के लिए यह उत्सव का पर्व है तो कुछ साधकों के लिए यह शक्ति का पर्व है। बाकि उत्सवों और धार्मिक आयोजनों से परे यह पर्व कड़े अनुशासन और साधना से जुड़ा हुआ है। देवी के नौ रूपों की साधना करने वाले सच्चे उपासक नौ दिनों तक एक तपस्वी जीवन जी कर अपने आपको सभी तरह के व्यसन से दूर रखकर पूजा-अर्चना करते हैं। वहीं समाज का एक बड़ा तबका है जो देवी की उपासना के साथ पूरे नौ दिनों तक नये-नये वस्त्र, आभूषण पहनकर, सजधज कर गरबा करता है, उत्सव मनाता है। हमारी मिथकीय और पौराणिक कथाओं आराधनाओं के अनुसार जब शिव-पार्वती का शव लेकर निकले और जहां-जहां उनके अंग गिरे ऐसी 22 देवी के शक्तिपीठ माने गये है। इन सभी शक्तिपीठों में यूं तो सालभर भक्तों का आना-जाना बना रहता है। नवरात्रि के समय यहां की रौनक देखते बनती है। हमारे यहां 9 रसो के साथ नौ देवियों की कल्पना की गई है। देवियों के नौ रुप में शैलपुत्री, ब्रम्हाचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा होती है। ये सभी देवियां अलग-अलग रूपों में पूजी जाती है।

बाजार के चलते आजकल हमारे धार्मिक उत्सवो का स्वरूप बदल गया है। नवरात्रि के पर्व के साथ ही  दशहरा, धनतेरस, दीपावली का पर्व आता है जिससे बाजार में बहुत चहल-पहल रौनक होती है। बड़ी-बड़ी कंपनियां इसी समय अपने प्रोडेक्ट बहुत सारे आफर के साथ लेकर आती हैं। चूंकि नई फसल भी आ जाती तो किसान भी आर्थिक रूप से थोड़ा समृघ्द रहता है। ऐसे में नवरात्रि का उत्सव बाकी उत्सव से ज्यादा सम्पन्नता वाला होता है। साज-सज्जा, नये कपड़े-गहने, सजना-संवारना, उत्सव में समूह में शमिल होकर मौज-मस्ती करना सब कुछ होता है। गुजरात, बंगाल में इस उत्सव की रौनक देखते ही बनती है। बड़ी-बड़ी कंपनियां प्रायोजक के रूप में देश के नामी कलाकारों, गायको, कवियों को दुर्गा पंडाल में आंमत्रित करती हैं। स्थानीय स्तर पर भी आयोजन समितियां बहुत से आयोजन करती हैं। इस कोरोना कॉल में संक्रमण को देखते हुए इस बार पहले जैसी रौनक शायद ही देखने को मिले। बिहार और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव को देखते हुए राजनीतिक पार्टियां इस अवसर का लाभ लेना चाहती हैं।

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के बारे में हर कोई जानता है और नवरात्रि में मां के इन्हीं रूपों की आराधना की जाती है। हिंदू धर्म में नवदुर्गा पूजन के समय ही मां के मंदिरों में भी भक्तों का तांता लगता है और उनमें भी मां के शक्तिपीठों का महत्व अलग ही माना जाता है। पवित्र शक्ति पीठ पूरे भारत के अलग-अलग स्थानों पर स्थापित हैं। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है तो देवी भागवत में 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है, वहीं तन्त्र चूड़ामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण के मुताबिक 51 शक्तिपीठ में से कुछ विदेश में भी स्थापित हैं। भारत में 42, पाकिस्तान में 1, बांग्लादेश में 4, श्रीलंका में 1, तिब्बत में 1 तथा नेपाल में 2 शक्तिपीठ हैं।

कोरोना संक्रमण और मौजूदा समय में बहुत से साधक इस बात से निराशा है कि उन्हें पिछले सालों की तरह बड़े-बड़े पूजा-पंडाल लगाने नहीं मिल रहे हैं। जब अनलॉक पांच में सभी स्थल खोले जा रहे हैं तो फिर पूजा-अर्चना, उत्सव पर क्यों रोक लगाई जा रही है? ये प्रश्न भी बहुत से लोग पूछ रहे हैं।

दुर्गा पूजा को लेकर जारी गाइडलाइन के अनुसार इस बार कोई मेला नहीं लगेगा। इसके अलावा लाउड स्पीकर के इस्तमाल पर भी रोक रहेगी। पंडाल का निर्माण किसी विशेष थीम पर नहीं किया जा सकता। सामूहिक प्रसाद वितरण पर भी रोक रहेगी। गाइडलाइन के अनुसार दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा-अर्चना, सोशल डिस्टेसिंग के नियमों का पालन करते हुए कर सकते हैं। लेकिन देश के अधिकांश राज्यों में दुर्गा पूजा के दौरान लगभग एक से प्रतिबंध लगाए गये है। बंगाली वेलफेयर एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दुर्गा पूजा को सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति मांगी थी, लेकिन अब हाईकोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार कर दिया है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि सड़क पर कोई भी आयोजन नहीं होगा। कोई जुलूस नहीं निकालेगा और न ही मेला लगेगा। लोगों को गाइडलाइन के मुताबिक सोशल डिस्टेसिंग, मास्क और हाथ धोने के निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। हाईकोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक डीएम फैसला लेंगे। हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिलने के बाद यूपी में दुर्गा पूजा के सार्वजनिक आयोजन हो पाना मुश्किल है किन्तु धार्मिक आयोजनो और अवसरों को उपलब्ध कराने वाली सरकारें ये कैसे रोक पायेगी, यह देखना होगा।

बिहार में दुर्गा पूजा के खिलाफ सरकारी फरमान को लेकर गुरुवार को ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। सरकार के इस फैसले के खिलाफ लोगों ने सड़क पर जगह-जगह टायर जलाकर हंगामा किया। वहीं सरकार, प्रशासन व चुनाव आयोग के विरुद्ध जमकर नारेबाजी की। सभी वर्ग के लोगों ने अपनी-अपनी दुकानें बंद कर सरकार के आदेश का विरोध किया। दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर 'पूजा का प्रचार है, वोट का बहिष्कार है, रैली आपकी तय है, पूजा से क्यों भय है एवं कोरोना तो बहाना है, धार्मिक अनुष्ठान पर निशाना है, दुर्गा पूजा नहीं तो वोट नहींÓ लिखे पर्चे चिपकाएं। वहीं पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के बाद बंगाल में कोरोना वायरस का संक्रमण काफी बढऩे की आशंका जताई जा रही है। चिकित्सकों से लेकर विशेषज्ञों की इस आशंका के बीच कलकत्ता हाई कोर्ट में दुर्गा पूजा उत्सव पर रोक लगाने को लेकर एक मामला दायर किया गया है।

हमारे देश में उत्सवधर्मिता की वजह से लोग किसी न किसी बहाने सालभर त्यौहार मनाकर तरह-तरह के उत्सवों का आयोजन करते है। कुछ लोगों का कहना है कि जब ईद से लेकर गणेश पूजा को बंद रखा गया तो दुर्गा पूजा का आयोजन क्यों हो रहा है। इन विवादों के बीच राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को फिर स्पष्ट किया कि हम दुर्गा पूजा को बंद नहीं कर सकते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान राज्य में कोविड-19 मामलों में संभावित वृद्धि की आशंकाओं के मद्देनजर पश्चिम बंगाल ने दानिक प्रतिष्ठान नियामक आयोग (डब्ल्यूबीईसीईआरसी) ने चिकित्सकों को त्योहार के चार दिनों के दौरान शहर से बाहर नहीं जाने के लिए कहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 अक्टूबर को दुर्गा पूर्जा के मौके पर पश्चिम बंगाल की जनता को संबोधित करेंगे।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दुर्गा प्रतिमा की ऊंचाई एवं चौड़ाई 6से 5 फिट से अधिक नहीं होने, मूर्ति स्थापना वाले पंडाल का आकार 15बाई15 फीट से अधिक नहीं होने, पंडाल के सामने कम से कम 3000 वर्ग फीट की खुली जगह में कोई भी सड़क अथवा गली का हिस्सा प्रभावित न होने का नियम है। भोपाल में भी इस आशय के निर्देश जारी किये गये है कि दुर्गा प्रतिमा की ऊंचाई 6 फीट से ज्यादा नहीं होगी। गरबा और अन्य समारोह की भी अनुमति नहीं हैं। इसके साथ ही पंडाल की ऊंचाई 10 फीट से अधिक नहीं होगी।

कदाम्बिनी के संपादक सुरेश नीरव की एक कविता है।

भावना को जो भक्ति मिल जाए बहुत है

साधना को शक्ति मिल जाये बहुत है

सत्य को अभिव्यक्ति मिल जाये बहुत है।

हमारे यहां शिव को सृष्टि का निर्माणकर्ता, विष्णु को संचालनकर्ता और शिव को विनाशकर्ता के रूप में देखते है। कहा तो यह भी जाता है कि यदि शिव के साथ स्त्री नहीं है तो वह शव है। सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती यानी स्त्री के होने से ईश्वर हो या मनुष्य उसके जीवन में जीवंतता रहती है। बिना स्त्री के वह एक शव की तरह है। स्त्री को देवी के माध्यम से शक्ति का केन्द्र माना गया है। हमारे देश में तमाम तरह की पूजा-अर्चना के बावजूद स्त्री के साथ जिस तरह की घटनाएं, व्यवहार होता है वह हमारे समाज के दोहरे चरित्र को भी बताता है। दैवी पर्व मनाने वाले, कन्या भोज कराने वाले समूचे भारतीय समाज को ये सोचना चाहिए की हम अपने आसपास की स्त्रियों बच्चियों के प्रति क्या सोच रखते हैं। कहा जाता है की

'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।