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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः रेशा-रेशा बिखरता चाँद

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः रेशा-रेशा बिखरता चाँद


चरखे पर

सूत कातती रहती कोई बुढ़िया

चाँद पर बैठी कबसे

कपड़ा बुनता है आसमान

काल के करघे पर पूरी रात


रंगरेजवा सूरज

रँगकर उसको रोज़ सुखाता

दिशाओं की अरगनी पर


साँझ घिरते ही धरती

उसको बटोरकर

तुरपाई करती है


लहराती हवा

बखिया उधेड़ती रहती 

सागर फँचीटता रहता उसको

पूरा चाँद बिखरता रहता 

लहरों पर

रेशा-रेशा होकर


समय की सुई में 

धागे-सा अटका रह गया

किसी फटे बादल को करके रफू

डूब जाता है पूरा चाँद