II अफसरनामा : असली पुलिस, फर्जी वर्ल्ड रिकॉर्ड. कलेक्टर बना दो. सिंघम मंत्री या आइपीएस. वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी का अफसरनामा

II अफसरनामा : असली पुलिस, फर्जी वर्ल्ड रिकॉर्ड. कलेक्टर बना दो. सिंघम मंत्री या आइपीएस. वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी का अफसरनामा
  • ओलंपिक संघ में 'खेल'

    सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को धता बताते हुए अंतत: छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ का गठन हो ही गया. ऐसा इसलिए क्योंकि कोर्ट ने खेल संघों को राजनीति से मुक्त रखने को कहा है लेकिन जब पिछली बार कुछ नही उखाड़ सके तो अब क्या कर लोगे! कोर्ट में मामला जायेगा, तब देखेंगे. लेकिन सबसे ज्यादा जददोजहद रही गुरूचरण सिंह होरा के नाम पर. उन्हें महासचिव बनाया गया है. यानि सीएम के दाएं हाथ रहेंगे वे. कई सदस्यों ने होरा के नाम पर आपत्ति की थी लेकिन वीरजी ने ऐसी गोटियां बैठाईं और पार्टी दी कि सारे विरोधी चित्त हो गए. कांग्रेस का एक खेमा होरा को आरएसएस समर्थक मानता है क्योंकि पिछली रमन सरकार में भी सिसोदिया का वरदहस्त उन्हें हासिल था. हां यह अलग बात है कि अब सिसोदिया को ही होरा ने राम राम कर दिया. कार्यकारिणी में सदस्य का पद तक नसीब नही हुआ. बामुलाहिजा...पिछली बार भी ओलंपिक संघ को सरदार जी ने चलाया था, अब इस बार भी. तुसी ग्रेट होजी.

    असली पुलिस, फर्जी वर्ल्ड रिकॉर्ड!

    कोरोनाकाल में पुलिस के कई चेहरे सामने आए हैं और इनमें से एक समाजसेवा का भी है. दूसरे राज्यों की पुलिस ने लॉकडाउन में लोगों के घर बर्थडे केक तक पहुंचाने का काम किया तो अपनी रायगढ़ पुलिस ने वर्ल्ड रिकॉर्ड ही बना डाला. मंत्री उमेश पटेल, कलेक्टर भीम सिंह और एसपी संतोष सिंह के नेतृत्व में टीम ने एक दिन में 12 लाख 37 फेस मास्क लोगों को बांटे और वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो गए. इसमें पुलिस की टीम, एनजीओ का भरपूर सहयोग रहा. आमजनों ने भी इस अभियान की तारीफ की. लेकिन सोशल मीडिया पर वर्ल्ड रिकॉर्ड को फर्जी ठहराया जाने लगा. दरअसल जिस संस्था 'गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड' में इसे दर्ज किया गया, उसने प्रदेश में कई आयोजन किए और हजारों की तादाद में प्रमाण—पत्र बांट दिए हैं. रमन सरकार में तो लाइन लग गई थी. वर्ल्ड रिकॉर्ड के नाम पर ही लाखों का बजट हड़प लिया जाता है. वास्तविकता यह है कि देश और प्रदेश में दो ही संस्थाओं का विशेष महत्व है, एक है वर्ल्ड लेवल की संस्था गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और दूसरा है लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड. अब ये तीसरी कहां से आ गई भई. खैर.. हम तो रायगढ़ पुलिस के इस आयोजन के मुरीद हैं!

    ढांड की ना, राउत की हां..!

    भूपेश बघेल सरकार ने अपना डेढ़ साल का कार्यकाल तो पूरा कर लिया लेकिन प्रशासन पर लगाम नही डाली जा सकी. हाल यह हैं कि  जिले के एसपी और कलेक्टर छह—छह महीने या उससे कम समय में बदले जा रहे हैं. इसके पीछे की वजह यह है कि सरकार के पास पिछली रमन सरकार की तरह अच्छे प्रशासनिक सलाहकार नही हैं. चर्चा थी कि पूर्व मुख्य सचिव रहे विवेक ढांड को आफर दिया गया था लेकिन वे 'रेरा में ही खुश हैं! हालांकि पर्दे के पीछे ढांड के कई सुझाव माने जा रहे हैं लेकिन फुल—फलैश होकर साथ देने वाला अफसर कौन होगा! तब ऐसे में एम के राउत पर नजर फेरी गई है. राउत साहब सूचना विभाग के मुख्य आयुक्त तो हैं ही. अभी दो साल का कार्यकाल ही बचा है. चूंकि वे रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ के कलेक्टर रह चुके हैं, कई कांग्रेस नेताओं से भी उनके अच्छे संबंध हैं. डिसिजन मेकर भी हैं, फॉलो करवाना भी खूब जानते हैं. सबसे बड़ी बात : राउत हर अफसर की क्रॉस आफ लिमिट और हाईट दोनों जानते हैं.

    आओ टिवट टिवट खेलें

    प्रदेश के बहुत से आइएएस—आइएफएस—आइपीएस टिवटर पर सक्रिय हैं. एक तरह से आओ टिवट टिवट खेलें' जारी है. एक पोस्ट करता है तो कई उसे आगे बढ़ाते हैं. आइएएस सी आर खेतान को उनके टिवट पर जवाब आया : राजनीति काहे कर रहे हैं! साहब ने फिर रिप्लॉय किया : इसमें क्या राजनीति की बात है! खैर. टिवटर प्रेमियों के लिए आश्चर्यजनक यह है कि यहां भी अफसरों ने अपना कैडर' बना रखा है. वे साहब हैं और आम आदमी फरियादी. क्योंकि उसे फाइलों पर न्याय मिले या ना मिले, टिवटर पर घण्टों में ही जवाब मिल जाता है. कोई ना कोई अफसर उसे कैच कर लेता है, गारंटेड. इतनी स्पीड तो सीएमओ आफिस में भी नही है. सो लेटस कम आन टिवटर.

    कोई कलेक्टर बना दो!

    रायपुर जिला पंचायत के सीईओ हैं डॉ. गौरव सिंह. यंग आइएएस हैं, यूपी से हैं, अफसोस कि तीन सालों से सीईओ की कुर्सी ही चिपकी है. कम्बख्त पीछा ही नही छोड़ती. इसके पहले भी वे दंतेवाड़ा के सीईओ थे. इनके बैच के साथी कलेक्टर बन गए लेकिन गौरव का समय मानो जकड़ा सा है. सीएस से भी उनकी अच्छी पटरी बैठती है लेकिन सीएम आर्शीवाद नही दे रहे इसलिए मामला पेंचीदा है. हालांकि गौरव ने जिला पंचायत में गौठान, गोधन और गौबर खरीदी योजना पर अच्छा काम किया है. राजधानी में भी उन्होंने गौशालाओं का चेहरा संवारा है. बस इंतजार है तो गौमाता का आर्शीवाद मिलने का.

    सिंघम मंत्री या आइपीएस

    तेजतर्रार आइपीएस जितेंद्र शुक्ला अब राजनांदगांव से भी विदा हो गए. अफसास कि उन्हें तीन महीने से भी कम समय तक पुलिस कप्तान का सुख मिला और सरकार ने लूपलाइन में डाल दिया. इसके पहले उन्हें महासमुंद से और उसके पहले सुकमा से खो' कर दिया गया था. सुना है कि वहां भी मंत्री कवासी लखमा से पंगा हो गया था. कवासी महासमुंद के प्रभारी मंत्री थे. साहब की खासियत यह है कि अन्य दागदार आइपीएसों की अपेक्षा जितेंद्र शुक्ला तुरंत एक्शन में आते हैं फिर चाहे उनके सामने महापौर हो, विधायक या पत्रकार. यह बुरा भी नही है. कानून का राज कायम रखना है तो डण्डा ब्लाइंड' होते रहना चाहिए. रमन सरकार में तो खूब चलता था. यकीन ना हो तो उन विधायकों से पूछो जिनकी पीठ—हाथ पर बरसे! अभी तक दर्द सता रहा है. पर यह कांग्रेस सरकार है. अफसरों को लोकतांत्रिक तो होना ही पड़ेगा.

    लास्ट पंच : आइपीएसों की एक सर्जरी और हो सकती है. इसके लिए जिला कप्तान बनने की होड़ शुरू हो गई है, मोटा और बड़ा खेल के साथ. देखते हैं किसकी किस्मत संवरती है!


    अनिल द्विवेदी