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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः पहचानो उनको जिन्हें ग़ुलामी भाती है

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः पहचानो उनको जिन्हें ग़ुलामी भाती है


शक्तिहीन लोगों की बस्ती को देखो

लोकतंत्र की शक्ति वहीं से आती है

शक्ति जुटाकर मिल जाती जिनको सत्ता

उनसे भी उनकी शक्ति छीन ली जाती है

कुछ शक्तिवान रचते हैं फिर अपना शासन

मतदान नहीं सत्ता पूँजी से आती है

लोकतंत्र को भरती रहती लालच से

जो झुके नहीं वह उसको मार गिराती है

देखो उनको जो घुसे चोर दरवाज़ों से

उनके ही हाथों में सत्ता क्यों आती है

उन्हें पुकारो जो स्वराज्य को तड़प रहे

पहचानो उनको जिन्हें ग़ुलामी भाती है


उधार का राज्य


मेल न बैठा था जिनसे अपना कभी

उनसे हमने कहा कि भारत छोड़ दो

न्यौता देकर फिर क्यों बुला रहे उनको

वे फिर पाँव जमाते आते हैं यहाँ

आये थे व्यापारी बनकर पहले भी

बन बैठे शासक वे हमको ललचाकर

चले गये फिर शासन का अधिकार सौंप

वे ही नयी दूकान जमाने आ रहे

शासन का अधिकार पा लिया था जिनने

वे टुकड़ों में बिखर गये पहचानहीन

छीन रहे हैं एक-दूसरे से सत्ता

नत हैं उनके आगे जो देते उधार

आतुर दिखते हैं ग़ुलाम फिर होने को

वही पुराना रोग उभर आया फिर से

जात-पाँत के बढ़ते जाते झगड़ों में

फिर भारत के लोग टूटते जाते हैं