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डॉ. योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित नाटक की प्रस्तुति 'बाबा पाखण्डी' राष्ट्रीय नाट्य समारोह उज्जैन में

डॉ. योगेंद्र चौबे द्वारा निर्देशित नाटक की प्रस्तुति 'बाबा पाखण्डी' राष्ट्रीय नाट्य समारोह उज्जैन में

उज्जैन: अभिनव रंगमंडल के 34वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में 21 जनवरी की शाम नाट्य संस्था गुड़ी, रायगढ़ द्वारा 'बाबा पाखंडी' नाटक खेला गया। लोक नाट्य शैली नाचा की रंग आभा वाले और छत्तीसगढ़ी बोली बानी से सराबोर 'बाबा पाखंडी' नाटक की कहानी लोककथा शैली के अद्वितीय अप्रतिम कथाकार विजय दान देथा की मूल कहानी पर आधारित है। नाट्यालेख, परिकल्पना और निर्देशन प्रसिद्ध रंगकर्मी और रंग शिक्षक डॉ योगेंद्र चौबे का था। योगेंद्र चौबे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली के परिकल्पना एवं निर्देशन में निष्णात प्रसिद्ध रंगकर्मी हैं। उनके द्वारा निर्देशित यह जनता का नाटक था। इसमें तकनीकि कम कला कौशल एवं जीवन अधिक था।

बाबा पाखंडी, लोक को समर्पित नाटक है। नाटक की उस प्रतिबद्धता को साकार करने वाला है जिसमें नाटक लोक को संबोधित होगा। लोक को अपने केंद्र में रखकर उसे जाग्रत करेगा। नाटक में जहां एक ओर यथार्थ, स्मृति, राग और लोक जीवन के रंग हैं वही इसके भीतर समकालीन देशकाल को अपने भीतर समाहित करने और उसे अद्यतन रूप में प्रस्तुत करते चलने की प्रगतिशील परिवर्तनकामी धारिता है। नाटक राजनीतिक दृष्टि में प्रखर है। यह राजनीति में धर्म, धन और अंध विश्वास के मेल से उपजने मिलने वाली सफलताओं पर न केवल तीक्ष्ण दृष्टि रखता है बल्कि उनकी काट प्रस्तुत करता है।

ऐसे समय में जब सिस्टम को राजनीति ने अपना घोड़ा बना लिया है और मीडिया की चाबुक लेकर रोज़ जन चेतना जीतने निकलती है तब इस नाटक में विद्रोही एक गधा है। वह सच बोलता है। गधा नाटक में बाबा का वाहन है। जब गधा बाबा के ख़िलाफ़ मुंह खोलता है तो उसी क्षण समूह गीत 'गधे ने किया कमाल जी सच का लिया है नाम' दर्शकों के मन में आत्मबल भरने लगता है। मंच पर अंत की ओर बढ़ता यह दृश्य दर्शक दीर्घा में एक शुरुआत है। वह शुरुआत जिसके लिए इप्टा जैसे सांस्कृतिक आंदोलनों का जन्म हुआ था और गौरी लंकेश ने गोली खायी।

पाखंडी बाबा, गांव के एक अपढ़ मंद किंतु अति चतुर व्यक्ति के अपनी अटकलों के बल पर कथित शिक्षितों की महत्वाकांक्षा की शह और अनुसरण पाकर प्रसिद्ध बाबा बन जाने की कहानी है। बाबागीरी के चहुंओर बुनी गयी कहानी लोक विश्वास, ग्रामीण खेलों, रिश्तों, लोभ, भयादोहन, पुत्रकामना और सत्ता कामना को अपने भीतर खिलंदड़ और लुभावने अंदाज़ में सहज समेट लेती है। यही कारण है कि नाटक देखते हुए जहां नरेंद्र दाभोलकर की बुआबाज़ी से संघर्ष और उनकी शहादत की याद आ जाती है तो वहीं दूसरी ओर बाबा रामदेव के धंधे से लेकर आशाराम बापू के नृत्य, देश में चल रही एनआरसी पर बहसों और विरोध आंदोलनों की याद ताज़ा हो जाती है।

नाटक लोक संगीत में रचा बसा है। जनचेतना का कला समृद्ध उत्प्रेरक है। बांसुरी, हार्मोनियम, तबला और बैंजो की मोहक धुनों और कई समवेत गानों से न केवल आगे बढ़ता है बल्कि जीवंत बना रहता है। दर्शकों को बांधे रखता है। नाटक के गीत प्रतीकात्मक प्रतिरोधपरक जनगीत सरीखे हैं। नदिया बेचागे नरवा बेचागे गीत से शुरू होने वाला यह नाटक 'गधे ने किया कमाल सच का लिया है नाम' से सम्पन्न होता है।

नाटक का मुख्य पात्र टेटका है। टेटका छत्तीसगढ़ी का शब्द है जिसका अर्थ होता है गिरगिट। यथा नाम तथा गुण अनुसार ही टेटका बाबागिरी से लेकर नेतागिरी तक की सभी सीढियां चढ़ता है। इस मुख्य पात्र की भूमिका में कलाकार ने कमाल का यादगार अभिनय किया। नाटक के दूसरे कलाकार भी अपने उत्कृष्ट अभिनय से इस प्रस्तुति को दर्शकों के लिए एक विशिष्ट रंग अनुभव बना देते हैं।

नाटक की बांसुरी को भी भुलाया नहीं जा सकता। बांसुरी की मधुर धुन आनन्दित करने के साथ साथ तंत्र की विफलता विलासिता और शासन की नपुंसकता को प्रकट कर देती है। कुल मिलाकर लोक से लेकर राजभवन तक के पाखंडों लोलुपताओं को उद्घाटित करने वाला यह नाटक एक विलक्षण समर्थ लोकधर्मी नाटक है। 

नाटक की समाप्ति के बाद डॉ योगेंद्र चौबे को शॉल श्रीफल 11 हज़ार रुपये की सम्मान राशि और प्रशस्ति पत्र द्वारा 8वें अभिनव रंग सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रभावी संचालन अभिनेता और रंग समीक्षक गिरिजेश व्यास ने किया।

- शशिभूषण