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यह आपके गले में किसकी आवाज है मैत्रेयीजी!

यह आपके गले में किसकी आवाज है मैत्रेयीजी!

बाबरी ध्वंस के बाद हंस में लिखे राजेन्द्र यादव जी के सम्पादकीय का अंश

हैदराबाद एनकाउंटर पर कल सोशल मीडिया पर पढ़ी आपकी टिप्पणी के बाद से यही सम्पादकीय बार-बार ध्यान आ रही थी। लंबी यात्रा में हैं इसलिए लिखने का अवसर नहीं है - फिर भी आज हिंदुस्तान में आपका इसी पर लिखा किंचित विस्तार से छ्पा पढ़ा तो लगा कि मैत्रेयी पुष्पा जी से कुछ छूट रहा है ; एक बार तो लगा कि कुसमय में भी तन कर खड़ी रहने वाली मैत्रेयी पुष्पा ही कहीं उन्मादी भीड़ में तो नहीं छूट गई हैं।

अगर कानून और न्याय की व्यवस्था ठीक से चल रही होती तो शायद स्त्रियाँ हैदराबाद एनकाउंटर का इस तरह से स्वागत नहीं करतीं .... हम स्त्रियाँ तो यही मान रही हैं कि बलात्कारी असली अपराधी थे जिनका एनकाउंटर किया गया ...... देश की जनता खुश है और पुलिस पर उसका विश्वास लौट आया है" आदि इत्यादि कहीं कुछ ज्यादा ही सरलीकरण नहीं है।

 आप उस पुलिस में विश्वास लौटने की बात कर रही हैं (यहाँ थानों में बलात्कार, बलात्कारियों के बचाव की अनगिनत कथाओं का उल्लेख नहीं सिर्फ हैदराबाद के इसी हादसे का जिक्र है) जिसने पीड़िता की बहन और परिजनों को थाने से यह कहकर लौटा दिया था कि "कुछ नहीं हुआ है, वह किसी के साथ भाग गई होगी ।"खैर आपने जब मान ही लिया तो इस मामले के पहलुओं पर चर्चा से कोई लाभ नहीं।

बुलंदशहर, नोएडा और मुंबई की हाल की ताजी घटनाओं के उल्लेख का भी कोई लाभ नहीं जिनमें पुलिस की कूटरचना के आधार पर बनी आम धारणाओं के आधार पर जिन्हें दोषी बताया गया था, बाद में जब असली अपराधी पकड़े गए तो वे निर्दोष और पूरी तरह असंबद्द निकले । जरा सोचिए एक ख़रबवीं आशंका यदि इस मामले में भी कहीं सही निकली तो? खैर इसे भी छोड़िए!! इस पर भी आपसे चर्चा का कोई मतलब नहीं क्योंकि आपकी "हम महिलाओं" ने मान लिया तो मान लिया। हालांकि यह जानना भी दिलचस्प होगा कि आखिर इस देश की महिलाओं के मान लेने को कबसे मान दिया जाने लगा है? मगर उसे भी छोड़िए।

मैत्रेयी जी, भावनाओं के उद्वेग में आप पीड़िता के साथ जघन्यता, अभियुक्तों की पुलिसिया लिंचिंग और आप सहित समाज के बड़े हिस्से द्वारा किए गए "स्वागत" की मूल धातु को अनदेखा कर गई हैं । इसका नाम है #पितृसत्ताकता ; बलात्कारियों ने जो किया वह इसी का जघन्य रूप था। पुलिस ने जो किया वह इसी का बर्बर अमल था और इस का स्वागत करने वाले/वालियाँ इसी को व्यवहार मे ला रही हैं । राजेन्द्र जी के रूपक मे कहें तो आपके गले से पितृसत्ताकता बोल रही है । वही पितृसत्ताकता जो इस तरह के जघन्य बलात्कारों को मर्दानगी मानती है।

पितृसत्ता पिता या पुरुष भर में नहीं होती यह अमानवीकरण और मालिकीकरण की वह रासायनिक प्रक्रिया है जो हैरार्की -पदप्रतिष्ठा के श्रेणीक्रम- को स्वीकृत और सर्वमान्य बनाती है और इस तरह अपने अंतिम निष्कर्ष में समाज को अलग-अलग वजन की बेड़ियों में बांध कर रख देती है।

पितृसत्ताकता सिर्फ लैंगिकता भर नहीं है। सत्ता जो हमेशा (अब तक) पौरुषेय masculine रही है, इसका सर्वोच्च रूप है। इसकी पौरुषेयता को न्यूनतम करना समाज को सभ्य बनाने की मुहिम का अविभाज्य हिस्सा है। कायदे, कानून, लोकतांत्रिकता, संविधानसम्मत आचरण इत्यादि इसी मुहिम का अनिवार्य और अपरिहार्य अंग है। कहने की आवश्यकता नहीं कि कानून के राज की आवश्यकता समाज के बड़ों को नहीं, बेड़ियों में जकड़ों को होती है। इसमें किसी भी नाम पर किसी भी तरह की छूट अंतत; वर्चस्वकारी सोच को मजबूत करती है। न्याय प्रणाली से अलग किसी रास्ते की पैरवी या ताईद समाज के अंधेरे को बढ़ाती है। पितृसत्ता को मजबूत करती है ।

 जिस क्रोध और उन्माद के बहाने हैदराबाद एनकाउंटर को जायज बताया जा रहा है वह ना तो निरपेक्ष होता है ना न्यायसंगत । जम्बूद्वीपे भारतखंडे में क्रोध करने का अधिकार भी सबको नहीं है। इस तरह के भावनात्मक उन्माद और क्रोध का समर्थन करना महिलाओं और वंचित तबकों के पुरुषों के क्रूरतम दमन का लाईसेंस देने जैसा है। हमारे समाज में तो यह बाकायदा मनुस्मृति और गौतम स्मृतियों सहित अनेक ग्रन्थों में संहिताबद्द है।

अतिरिक्त विडम्बना यह थी कि 5000 साल के इतिहास में धरा के इस हिस्से में पहली बार कानून और न्याय की नजर में समानता का सार्वत्रिक और लिखित प्रावधान करने वाले भारत के संविधान से जुड़े बाबा साहब अंबेडकर के निर्वाण दिवस के दिन आप उन ही कोशिशों को ध्वस्त करने का स्वागत कर रही थीं।

"बहुतों द्वारा स्वागत करने, देश की जनता के खुश होने की" जिस कसौटी को आप काम में ला रही हैं वह कितनी खतरनाक है इसे बताने की जरूरत है क्या ? ये "बहुतों" कौन हैं मैत्रेयी जी?? ये वही तो नहीं जो 2002 के गुजरात के समय बहुतायत थे, 100 दिन से जारी कश्मीर त्रासदी पर भी बहुतायत हैं, सिर्फ बुंदेलखण्ड के मजरों और टोलों में नहीं दिल्ली की गगनचुंबी इमारतों से लेयकर मोहल्ले और गाँव में किसी स्त्री की पिटाई और दलित को सबक सिखाने के समय भी बहुतायत में होते है। हमें लगता था कि साहित्य सृजन का मूल काम इस बहुतायत के उन्माद को विवेक तक लाना है। आपने तो उलट कर ही रख दिया।

 न्याय प्रणाली गड़बड़ है तो अन्याय ही सही - यह बहुत ही खतरनाक प्रस्थापना है, बहुत ही खतरनाक !! उसकी हिमायत में जब आप खड़ी होती दिखती हैं तो भय बढ़ जाता है- जितना हैदराबाद की पीड़िता के वीडियो पॉर्न साइट पर ढूँढने वाले 80 लाख भारतीयों के बारे में पढ़कर हुआ था उससे कई गुना हो जाता है।

अपनी "हम महिलाओं" को राजेन्द्र यादव जी का वह सम्पादकीय पढ़वा दीजियेगा। उन्हें बता दीजिएगा कि उनका काम पूरा हो गया है। सांस्थानिक बर्बरता और हत्याओं के लिए उनसे जितने ढ़ोल -मंजीरे बजवाने थे बजवा लिए गए हैं। अब वे वापस चलें दड़बों की ओर, अपनी बारी का इंतजार करें।

 इसी सम्पादकीय में उन्होंने लिखा था कि शतरंज खत्म होने पर गोटियाँ डिब्बों मे वापस बांध दी जाती हैं, ठीक इसी तरह संवैधानिक राज प्रणाली की शह मात के इस खेल के बाद इन गोटियों को भी डिब्बे में बांध दिया जाना है। ताकि कठुआ में बलात्कारी हत्यारों के पक्ष में झंडे उठाकर रैलियाँ निकलती रहें, कुलदीप सेंगर की खूनी यात्रा चलती रहे, पीड़िता जेल मे पड़ी रहे और अस्पताल में चिन्मयानंद मालिश कराते रहें, कामुक और यौन अपराधियों का बाहुल्य संसद विधानसभाओं में बैठकर अपनी निर्लज्जता को राष्ट्रीय चरित्र साबित करता रहे। और आपकी हम महिलाएं हैदराबाद एनकाउंटर पर ताम्रपत्र बांटती रहें।

चंद साधनहीन आरोपियों के मारने से बलात्कार रुकने होते तो सऊदी अरब महिलाओं के लिए पृथ्वी का सबसे निरापद देश होना चाहिए था।

 बहरहाल फिलहाल तो यही कर सकते हैं कि आपकी लिखी सारी किताबों को फिर से इकट्ठा करें और उनमें आपको ढूँढे!!