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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की दो कविताएं

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की दो कविताएं

हम प्रभुता के गुन गाते-गाते ऊब गये


युगों-युगों से हमें मिले

वरदानों के आकाँक्षी

शापग्रस्त नायक


उनने पायी जो विद्या 

वे बीच डगर में भूल गये

उनकी जय और पराजय की 

गाथाओं में

डूबता चला गया जीवन सबका

उनके दर्पों के सर्प 

काटते रहे हमें


पूरे जीवन का दाँव लगाकर

वे जुआ खेलते रहे

जीवन की जय तो हुई नहीं

उनकी प्रभुता के गुन गाते

हम ऊब गये

वे व्यर्थ हुए , सब डूब गये


चलो अब हम सब 

अपनी सुनीति रचें

अपने बीज बचाकर

अपनी सुरुचि रचें

अपनी बहुरूपा प्रकृति बीच

घुल-मिलकर 

अपना तन-मन साधें

कविता रचने के लिए 

शब्द बचाकर रख लें

सागर तट की ओर जा रही 

पृथ्वी को

हम अपने पास बुला लें

प्रलय रोक दें


कतार में खड़ा धीरज




वे बहुत देर तक 

खड़े नहीं रह सकते कतार में

उन्हें आदत है

समूह के धीरज में बँधने की


कतार में खड़े होकर

अपनी बारी आने के इंतज़ार में

वे खोते हैं धीरज को

पड़ जाते हैं अकेले

एक-दूसरे के पीछे खड़े होकर

कोई कैसे बँधाये किसी को धीरज

कैसे हो संगबोध


जो सीख जाते हैं

कतार में खड़े होना

उन्हें मन ही मन लगता है

वे किसी युद्ध के मोर्चे पर हैं

पीछे छूट जाता है प्रेम

खड़े रहते हैं अविश्वास से भरे

आगे न निकल जाये कोई उनसे


बहुत दिनों तक

सँभाली नहीं जा सकतीं कतारें

वे टूट पड़ती हैं अचानक किसी पर

भागती हैं लूट का माल उठाकर

वे परवाह नहीं करती किसी की


शहर में घर खड़े हैं कबसे कतारों में

कोई नहीं जानता

चुप्पी साधे घरों में बन्द लोग 

कब निकल पड़ें बाहर


कतार में रोपे गये वृक्षों ने

रोक दिया है रास्ता कतार तोड़कर

वे लौट जाना चाहते हैं

गोकुल ग्राम के निकट बसे

अपने वृन्दावन में