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बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षता से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफर आसान नहीं था, समस्याओं का सामना कर के ही सफलता मिली - प्रभा दुबे

बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षता से लेकर राष्ट्रीय पुरस्कार तक का सफर आसान नहीं था, समस्याओं का सामना कर के ही सफलता मिली - प्रभा दुबे

आशिका कुजूर 

राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित प्रदेश बाल संरक्षण अधिकार आयोग की अध्यक्षा प्रभा दुबे ने बाल चौपाल के माध्यम से बच्चों के अधिकारों की जानकारियां  प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में घर घर पहुंचाने की कोशिश की, जिसकी वजह से आज बच्चे और उनके पालकों के साथ अन्य लोग भी बच्चों के अधिकार और उनकी सुरक्षा को लेकर जागरूक हो रहे हैं। शहरों में ही नहीं बल्कि गावों में भी अब लोग बच्चों के अधिकारों के प्रति सजग हो रहें हैं। नारायणपुर जैसे क्षेत्रों में भी बाल चौपाल की मुहीम रंग लाई और वहां के लोग अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत दिखा रहें हैं, यह एक बड़ी सफलता है की आयोग ने जनता का विश्वास जीता है।

अपने सफर का अनुभव साझा करते हुए प्रभा दुबे कहती हैं कि 1 फ़रवरी में पदभार ग्रहण करने के बाद बहुत बड़ी जिम्मेदारी कंधे पर आई। बच्चे जो आने वाले भविष्य की नींव हैं उन्ही के भविष्य को सँवारने के लिए काम करना था। बाल संरक्षण आयोग को मॉनिटरिंग का अधिकार है। अगर सिर्फ बालक/बालिका गृह को देखते रहे तो बच्चों को जागरूक कब करेंगे। इसलिए निर्णय लिया कि इन तमाम जिम्मेदारियों के अलावा भी हमें जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। इस जागरूकता अभियान को नाम दिया बाल चौपाल। पहला छुपाल 30 मार्च को नंदनवन में रखा गया जहाँ आस पास के गावों के लोगों को बच्चों के 4 महत्वपूर्ण अधिकारों के बताया जाना था। लेकिन इन सब मुद्दों पर कभी लोगों ने सुना नहीं था इसलिए पहले तो लोग आने से हिचकिचा रहे थे।, फिर जब धीरे धीरे बात उनके समझ में आने लगी कि क्या क्या अधिकार प्राप्त हैं और उनकी जानकारी होना आवश्यक है तो लोगों की भीड़ बढ़ती गई। लोगों से जुड़ने के लिए उनकी ही भाषा का उपयोग करना  जरुरी है जैसे ज्यादातर लोग छत्तीसगढ़ी समझते हैं। ऐसे में लोग जल्दी घुलते मिलते हैं और सभाओं में रूचि बढ़ने के लिए यह बहुत जरुरी हिस्सा है।

 बाल चौपाल कार्यक्रम के माध्यम से बताया जाता है कि बच्चों के मुख्यतः चार अधिकार हैं -1.जीवन का अधिकार, 2.विकास का अधिकार, 3.संरक्षण का अधिकार, 4.सहभागिता का अधिकार, जिसकी जानकारी सभी लोगों को होनी चाहिए। और साथ ही यह जानकारी भी होनी चाहिए कि बच्चों के साथ क्या नहीं होना चाहिए जैसे बालविवाह, भिक्षावृति, नशापान और बालश्रम नहीं होना चाहिए। यदि कहीं इस प्रकार की घटनाएं होती है तो उसके लिए हेल्प लाइन नंबर 1098 और बाल संरक्षण का टोल फ्री नंबर 1800-2003-3055 पर संपर्क कर जानकारी दी सकती है। सूचना देने वालों की गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रदेश के लगभग 23  जिलों में यह कार्यक्रम आयोजित की जा चुकी है और यह लगातार आगे बढ़ रही है।

 कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों में जागरूकता बढ़ाना है लेकिन साथ ही इस विषय में उनकी रूचि बढे इसके लिए सवाल जवाब कर विजेताओं को पुरुस्कृत भी किया जाता है। इसमें केवल बच्चे ही नहीं बल्कि उनके अभिभावक भी भाग ले सकते हैं। जब गुड टच एंड बैड  टच के बारे में बताया जाता है तो महिलायें अक्सर सवाल करने लगती हैं कि आखिर ये क्या होता है, तो प्रभा दुबे ने सरल भाषा में बतातीं हैं कि जब कोई गलत तरीके से प्राइवेट जगहों को छुए तो वह बैड  टच होता है और जब कोई स्नेह दिखाने के लिए छुए तो वो गुड टच होता है। यह बच्चों को जरूर बताना चाहिए क्योंकि उनकी साथ ये सब घटनाएं ज्यादा होती हैं जिसके बारे में वो अभिभावकों से बात नहीं करते हैं। महिलाओं को जब मालूम हुआ कि अन्याय के विरुद्ध कोई भी शिकायत कर सकता है, यह जरुरी नहीं है कि जिसके साथ घटित हुई है वही रिपोर्ट कर सकता है।

सूरजपुर की घटना का जिक्र करते हुए प्रभा दुबे बताती हैं की जब वहां बाल चौपाल आयोजित की गई तब सभा खत्म होते ही एक लड़की ने उनसे कहा कि उसकी सहेली की शादी हो रही है जबकि वह नाबालिक है। सूचना मिलते ही उनकी टीम शादी वाले घर पहुंची और मामले की छानबीन की, जहाँ पता चला कि लड़की नाबालिक है। लड़की के घर वालों को समझाइश दी गई, उसके ससुराल वालों को भी समझाया गया की अगर शादी हो भी जाती है तो अगले दिन ही को जेल हो सकती है। थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी क्योकि उस दिन उस लड़की की हल्दी की रस्म चल रही थी और अगले दिन उसकी शादी होने वाली थी।अंततः परिजनों को शादी रोकनी पड़ी और लड़की की उम्र पूरी होने तक उसकी शादी नहीं करने कहा गया। इसके बाद लड़की ने आएगी की पढाई भी पूरी की।

प्रभा दुबे बताती हैं बाल चौपाल में अधिकारों की जानकारियां तो दे जाती है लेकिन उसका हनन होने पर आयोग को जानकारी कैसे मिलेगी, इस समस्या का समाधान करते हुए बाल मितान बनाने की योजना शुरू की जिससे हर गांव के लोग इस अभियान से जुड़ सकें । गांवों में अक्सर देखने को मिलता है कि बच्चों के साथ जब गलत होता है तो वो किसी को बता नहीं पाते हैं इसलिए ये बाल मितान बनाये जा रहे हैं जो आयोग को जानकारी दे सके और पीड़ितों की मदद की जा सके। अब तक 40-45 बाल चौपाल किये जा चुके हैं, जिसमे हर जगह 10-15 बाल मितानों की सहायता मिलती है। कई बालविवाह इन बाल मितानों की मदद से रोकी गई है।बाल मितान बनने के लिए ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता बस एक फॉर्म भर कर जमा करना होता है।

राष्ट्रीय पुरस्कार टॉप 3 में मिलने का श्रेय बच्चों को देते हुए कहती हैं कि ये उन्ही की दुआ है जिनकी ममदद हमें की थी। पुरूस्कार मिलने से पहले ही उन्होंने 3 योजनाएं शुरू की की थी जिसमे 1. मयारू गुरूजी, 2.आहवान, 3. समझदार पालक, सशक्त प्रदेश शामिल है। इन कार्यक्रमों का आयोजन महीने में कम से कम एक बार जरूर होता है। विशेषकर रायपुर में इस कार्यकर्म का आयोजन अनिवार्य होता है। जब गलत व्यक्ति को भी बच्चों से सम्बंधित जानकारी दी जाती है तो वह जरूर सुनता है, क्योकि व्यक्ति कितना भी गलत क्यों न हो बात जब बच्चों की आती है तो हर कोई सतर्क रहता है। राजधानी में भी कई जगहों पर भिक्षावृति कर रहे बच्चों को बाल संरक्षण गृह में लाकर रखा जाता है और उनकी अच्छे से देखभाल की जाती है। अक्सर गावों में बालश्रम की शिकायत ज्यादा आती है, ऐसे में अभिभावकों को प्राथमिक समझाइश दी जाती है और ना मानने पर कार्यवाही भी की जाती है। जब जिले में या कार्यक्रम आयोजित की जाती है तो वहां के सभी सम्बंधित अधिकारियों की मीटिंग रखी जाती, उन्हें जानकारियां दी जाती है। जिससे की जिला स्टार पर भी निगरानी रखी जा सक। अब लगभग हर जगहों पर सी सी टीवी कैमरा लगाया जा रहा है, स्कूल बसों में महिला कंडक्टर होना अनिवार्य कर दिया गया है। ये सारी चीजें बाल संरक्षण आयोग की समीक्षा बैठक में ही तय की जाती है। सभी विभागों को उनके दायरे में जो जिम्मेदारियां दी जाती हैं वे उसे बखूबी निभाते भी हैं।

इन सब कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों में जागरूकता आई है । अब वे बेखौफ्फ़ होकर सहायता के लिए महिला हेल्प लाइन में कॉल करते हैं ,पुलिस को जानकारी देते हैं। नारायणपुर क्षेत्र में हुए कार्यक्रम के बारे में प्रभा दुबे बताती हैं कि वहां जाने से पहले ही लोगों ने ये कहा था की ये नक्सली क्षेत्र है इसलिए वहां ना जाएँ तो अच्छा होगा लेकिन जा ही रहे हैं तो जितनी जल्दी हो सके काम खत्म कर वहां से निकल जाएँ। लेकिन जब वहां बाल चौपाल शुरू किया गया तो लोगों ने बड़ी उत्सुकता से उन्हें सुना और अंत में कई लोगों ने अपनी समस्याएं बभी बताई।बाल मितानो को इसकी ट्रेनिंग भी जाती है, कब किसे जानकारी देनी है इस बारे में बताया जाता है  इस तरह से जब कार्यक्रम के अंत में लोग अपनी परेशानियां बताते हैं तो अच्छा लगता है की आयोग ने जो मुहीम शुरू की है वह सार्थक साबित हो रही है।

जानकारी के लिए बता दें कि बाल चौपाल मार्च 2018 से आरम्भ किया गया है।इस आयोजन में आयोग अध्यक्ष और अन्य सदस्य गावों में जाकर ग्रामीणों से बाल अधिकार एवं बाल संरक्षण विषय पर चर्चा करते हैं। बाल चौपाल का मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों एवं विषेशतः ग्रामीणों में बाल अधिकार के प्रति जागरूकता लाना है। बाल संरक्षण के प्रति व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना है। साथ ही सरल तरीके से बच्चों से सम्बंधित कानून को समझाना है। इस आयोजन के साथ ही बाल अधिकार से क्षेत्र में कार्य करने वाले स्वैक्षिक व्यक्तियों को बाल मितान बनने के लिए प्रेरित करना है। इस कार्यक्रम  के द्वारा दूरस्थ अंचलों में जाकर आम नागरिकों से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। यह आयोजन ग्रामीण क्षेत्रों में जिला प्रशासन/सरपंच / महिला एवं बाल विकास विभाग के पर्यवेक्षक आदि के माद्यम से पूर्व सूचना देकर किया जाता है। शालाओं में भी बाल चौपाल का आयोजन किया जाता है। औधोगिक संस्थाओं के अनुरोध करने पर भी कार्यक्रम किया जाता है। बाल चौपाल बिना व्यय किये आयोजन करने का प्रयास किया जाता है।