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बेंगलुरुः पहले घोषित करें, 'पागल' या 'मूर्ख' तो नहीं? फिर रजिस्टर होगी शादी

बेंगलुरुः पहले घोषित करें, 'पागल' या 'मूर्ख' तो नहीं? फिर रजिस्टर होगी शादी

बेंगलुरु। बेंगलुरू में अपने वर्ग-धर्म से बाहर शादी करने के इच्छुक आवेदकों को अब यह भी घोषित करना होगा कि वह 'विक्षिप्त' तो नहीं हैं। स्पेशल मैरेज ऐक्ट, 1954 के तहत शादी रजिस्टर कराने वाले फॉर्म- III के एक क्लॉज में आवेदकों से यह घोषणा करने के लिए कहा गया है। विशेषज्ञों ने क्लॉज में इस्तेमाल किए गए इन शब्दों को लेकर आपत्ति जताई है।
गौरतलब है कि स्पेशल मैरेज ऐक्ट, 1954 का फॉर्म-III उन आवेदकों के लिए है जो धर्म-जाति के बाहर शादी के लिए आवेदन करते हैं। शादी के लिए आवेदन पत्र के एक क्लॉज में आवेदकों को यह घोषित करने के लिए कहा गया है कि उनमें से कोई भी 'विक्षिप्त' या 'मूर्ख' (idiot or lunatic) तो नहीं है। शादी के लिए आवेदन देने वाली एक महिला ने बताया कि दो साल पहले जब वह इस फॉर्म को भर रही थीं, तब उनके सामने भी यह दो ऑप्शन थे। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि यह आवेदक की मानसिक अवस्था का पता लगाने के लिए है लेकिन इसे पूछने का तरीका गलत है।
गैरजरूरी क्लॉज
महिला ने कहा कि अगर कोई मानसिक समस्याओं से पीड़ित है तो उसके लिए यह सवाल आघात पहुंचाने वाला हो सकता है। बेंगलुरु के रहने वाले मनोचिकित्सक आनंद ने कहा कि 'विक्षिप्त' और 'मूर्ख' जैसे शब्द औपनिवेशिक संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। मौजूदा वक्त में यह क्लॉज बिल्कुल गैरजरूरी है। उन्होंने कहा कि सेल्फ सर्टिफिकेशन का भी कोई मतलब नहीं है। इस सवाल के बदले आवेदक से यह पूछा जा सकता था कि वह यह शादी करना चाहता है या नहीं। या फिर यह शादी करने के लिए उस पर दबाव तो नहीं है।
सही शब्दों का हो इस्तेमाल
वहीं, मनोविज्ञान की प्रफेसर डॉ. प्रतिमा मूर्ति ने कहा कि भारतीय कानूनों में से 'विक्षिप्त' और 'मूर्ख' जैसे शब्दों को हटा दिया गया है। ऐसे में सभी ऐक्ट में इसका पालन करना चाहिए। उन्होंने बताया कि मेंटल हेल्थ ऐक्ट, 1987 के तहत 'विक्षिप्त' (lunatic) जैसे शब्दों को 'मानसिक बीमार' व्यक्ति से रिप्लेस कर दिया गया था। प्रफेसर ने कहा कि ऐक्ट में शब्दों का सही तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए।