प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जाति न पूछो साधु की

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-जाति न पूछो साधु की


कबीर का दोहा है कि 


जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान                                                                                                                                                                               मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अब समय आ गया है कि साधु की जाति ही पूछी जायेगी। यह तलवार को म्यान में रखने का नहीं बाहर निकालकर लहराने का समय है। भारतीय राजनीति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण फैक्टर है, हमारी जाति। हमारी सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी तमाम धर्मनिरपेक्ष जाति निरपेक्ष छवि और बातों के बावजूद चुनाव में टिकिट का बंटवारा जात-पात देखकर ही करती है। यदि उम्मीदवार जातिगत बाध्यता के साथ दबंगता, अपराधिक रिकार्ड लोगों को भड़काने, बरगलाने की क्षमता रखता है, तो यह सोने में सुहागा जैसी बात होती है। हमारी जातिगत अस्मिता इतनी गहरी होती है कि हम चाहकर भी उसे नहीं भूल पाते। जब-जब कोई व्यक्ति अपनी जाति को भूलने की कोशिश करता है, तो बहुत सी खाप पंचायतें उसे उसकी जातिगत औकात बता ही देती है। गुरु घासीदास लाख कहें की 'मनखे-मनखे एक जात कुकुर बिलाई की जाति होथे । बहरहाल, अभी हम अपनी बात बिहार के चुनाव को लेकर कम और छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण-पत्र के नये नियमों को लेकर ज्यादा करेंगे। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी मरवाही आरक्षित सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं, उनके निधन के बाद मरवाही सीट पर हो रहे उपचुनाव में उनके बेटे अमित जोगी जो जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष भी हैं, चुनाव लड़ने जा रहे हैं। अमित जोगी ने आरोप लगाया है कि उन्हें चुनाव लडऩे से रोकने के लिए सरकार मनमाने ढंग से कानून में बदलाव कर रही है।

हमारे संविधान में प्रदत्त अधिकारियों के तहत अनुसूचित जाति, जनजातियों से जुड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ मिलता है। यह लाभ जातिगत प्रमाण-पत्र के आधार पर दिया जाता है। हमारी संसदीय प्रणाली में लोकसभा, विधानसभा चुनाव के लिए भी जाति की जनसंख्या के आधार पर आरक्षण होता है। आरक्षित क्षेत्र से उसी वर्ग का व्यक्ति चुनाव में खड़ा हो सकता है, जिसके लिए वह संसदीय विधानसभा क्षेत्र आरक्षित है। हमारे देश की आधी आबादी यानी हमारी नारी शक्ति को आरक्षण देने की बातें तो खूब हुई, विधेयक भी आया किन्तु नियम में खोट होने के कारण पुरुष प्रधान सत्ता ने उसे पारित नहीं होने दिया। महिलाओं को पंचायती राज, नगरीय संस्थाओं तक ही सिमटकर रहना पड़ रहा है। अनारक्षित क्षेत्र से जो महिलाएं लोकसभा, विधानसभा में जा रही है, वे अपने या अपनी पार्टी के बूते जाती है। चूंकि, हमारे यहां सरकारी नौकरी के अवसर कम है, अच्छी शिक्षण संस्थाओं में एडमिशन की मारामार है। ऐसे में कुछ लोग जो आरक्षित वर्ग के जातियों की परिभाषा में नहीं आते, वे जातिगत झूठे प्रमाण-पत्र बनवाकर नौकरी पा लेते हैं, अच्छी जगह एडमिशन ले लेते हैं। हमारे छत्तीसगढ़ में फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी पाने वालों के सैकड़ों केस लंबित है। सरकार की तमाम कोशिशों, कानूनी प्रावधान के बावजूद वे लोग लंबे समय से नौकरी में बने हुए हैं।
ऐसे लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित करने के लिए राज्य सरकार ने अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सामाजिक परिस्थिति को विनियमित करने वाले कानून के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए बदलाव के बाद जिला स्तरीय सत्यापन समितियों और राज्य स्तरीय छानबीन समिति को नए अधिकार दिए गए हैं। राजपत्र में प्रकाशन के साथ ये नए नियम लागू हो गये हैं। नए नियमों के मुताबिक सत्यापन समिति की नोटिस के 15 दिन के भीतर संबंधित व्यक्तिे को अपने जाति प्रमाण-पत्र के समर्थन में दस्तावेज पेश करने होंगे। ऐसा नहीं हुआ तो जिला स्तरीय सत्यपान समिति इस मामले को राज्य स्तरीय छानबीन समिति को भेज सकेंगी। पुराने नियम में जिला स्तरीय समिति के पास प्रमाण-पत्र निलंबित करने का अधिकार नहीं था।

नए नियमों के मुताबिक नियोजकों, संवैधानिक संस्थाओं को नियोजन अथवा नियुक्ति के तीन वर्ष के भीतर जांच के लिए सत्यापन समिति को भेजना होगा।

फर्जी जाति प्रमाण-पत्र के प्रकरणों को देखें, तो छत्तीसगढ़ में लगभग 80 मामले उच्च न्यायालय में स्टे पर चल रहे हैं अर्थात् 80 ऐसे अधिकारी कर्मचारी हैं, जो फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार कर आरक्षित कोटे से नौकरी पाने के बाद छत्तीसगढ़ में नौकरी कर रहे हैं और उनके जाति प्रमाण पत्र छानबीन समिति ने निरस्त कर दिए थे। ऐसे अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवाएं तत्काल समाप्त करने के निर्देश हैं, परंतु उच्चाधिकारियों की मिलीभगत या फिर मंत्रालय के प्रशासकीय विभाग में जुगाड़ करके इन सेवकों ने 8 /10 दिन का समय लेकर इस बीच हाइकोर्ट से स्टे लिया है और धड़ल्ले से 10-0 साल से नौकरी कर रहे हैं।
इधर, माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा यदि केवल एक जस्टिस को दो हफ्ते केवल इन 80 प्रकरणों की सुनवाई के लिए आरक्षित कर दे दिया जाए तो सभी प्रकरणों का निपटारा हो सकता है। यहां न्यायालय की प्रशासकीय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है कि आखिर एक स्टे लेने के बाद प्रकरण 5/10 साल तक सुनवाई में क्यों नहीं आता है, और यदि आता भी है तो स्टे को निरन्तर क्यों रखा जाता है?

अंतत: ये फर्जी कर्मी नुकसान किसका कर रहे हैं? यदि एक आदिवासी की सीट पर एक फर्जी आदिवासी का कब्ज़ा है तो नुकसान एक सच्चे आदिवासी का ही है, क्योंकि वो आज उस पद पर आसीन होता। इसके अलावा करोड़ों की तनख्वाह फर्जी प्रमाणपत्रधारी बंदा लोकधन से खा रहा है, ये और भी बड़ा नुकसान है।
सरकार के कानून में बदलाव से आगे होने वाली जांच की प्रक्रिया तेज होगी। लेकिन जो पहले के मामले हैं, उनके स्टे हाइकोर्ट से रद्द करवाने और उन्हें तत्काल पद से अलग करने की भी तत्परता सरकार को दिखानी ही होगी।

फर्जी किसी भी प्रमाण-पत्र पर शासकीय नौकरी पाना तो जुर्म है, मगर फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर नौकरी पाना तो संगीन जुर्म है, उसके बाद उन्हें पद पर बनाये रखना तो शायद अपराधी की मदद करने की श्रेणी में आएगा।

सरकार द्वारा मरवाही चुनाव के पहले किये गये इस बदलाव का विरोध करते हुए जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष और मरवाही से उम्मीदवार अमित जोगी ने इसे कानून में मनमाना बदलाव बताया है। उन्होंने कहा कि इन बदलावों का पहले से चल रही प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद सरकार तिनके का सहारा ढूंढ रही है। अमित जोगी के पिता अजीत जोगी के जाति प्रमाण-पत्र को राज्य स्तरीय छानबीन समिति अगस्त 2019 में ही खारिज कर चुकी है। जाति प्रमाण-पत्र बनवाने/सत्यापन हेतु प्रचलित व्यवस्था के अनुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार आरक्षित पदों पर नियुक्ति एवं व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु अभ्यार्थियों को अनुविभागीय अधिकारी या डिप्टी कलेक्टर द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र एवं जाति प्रमाण-पत्र उच्च स्तरीय छानबीन समिति का जाति सत्यापन प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना आवश्यक है।

एक ओर जहां आरक्षित वर्ग के भीतर असली-नकली की पहचान और कार्यवाही के बीच अब अलग-अलग राज्य सरकारों की मांग पर सर्वोच्च न्यायालय अब फिर से ये विचार करेगा कि क्या सरकारी नौकरी में पदोन्नति में एससी/एसटी को आरक्षण दिया जा सकता है।

एससी/एसटी को सबसे पहले 1955 में पदोन्नति में आरक्षण दिया गया था। इस नए कानून की संवैधानिकता वैधता को फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा का निर्धारण करते हुए 1963 में बाला जी मामले के फैसले को दोहराते हुए इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ख्याल रखना होगा तो दूसरी तरफ हमें सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना होगा। बहुत सी सरकारों ने वोट बैंक के कारण इस सीमा को लांघा है। अनारक्षित वर्ग में आरक्षण के विरूद्ध बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए आर्थिक आधार पर सवर्ण वर्ग के लोगों को भी आरक्षण का लाभ दिया गया है। जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर बड़े-बड़े पदों पर पावर सेंटर में आ गये हैं उनका वर्गीय चरित्र बदल गया है। बहुत लोग अपने वर्ग के शत्रु हो गये हैं। दरअसल हमारी व्यवस्था में लंबे समय से शोषक और शोषित का जो वर्ग चला आ रहा है, सुविधाओं का लाभ पाकर बहुत से लोग अपने वर्ग का ही शोषण करने लगते हैं, उनकी हितों पर कुठाराघात करते हैं। गरीबों, उपेक्षितों, आदिवासियों और अनुसूचित जातियों से जुड़े दलितों, पिछड़ों के नाम पर साधन संपन्न होते हुए केवल जाति को आधार बनाकर लाभ लेना कहां तक न्यायोचित है? अब इस मामले में भी सोचने की जरूरत है।