कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः बसा है वह सबके अनुरूप

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः  बसा है वह सबके अनुरूप

( कवि जयशंकर प्रसाद को याद करते हुए )


वह किसी की इच्छा से

नहीं बसा है पृथ्वी पर

सागर, नदी, बावड़ी, कूप

पानी सबमें सबके अनुरूप


वह बसा हुआ है वहाँ

जहाँ जीवन की प्यास

बदली जा रही हो ग़ुलामी में


वह बहता है पूरे जीवन में

क्षीण धार होकर भी

स्वराज्य के स्वाद की तरह


वह घनीभूत पीड़ा का आँसू

ऊँचा उठकर नभ में

अपने विकल राग से

बूँद-बूँद होकर

लौटता है पूरे का पूरा

बहता है पृथ्वी पर

अपनी जगह बनाता

मनु की नौका को पार लगाता


जीवन है पानीदार

कोई डुबाये तो डूबेगा संसार