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इस संकट की छह भुजाएं हैं

इस संकट की छह भुजाएं हैं


कोरोना वायरस संकट ने जो हालात पैदा किए हैं उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि बंटवारे के बाद से देश ने इतना मुश्किल वक्त कभी नहीं देखा

रामचंद्र गुहा

1947 में अपने जन्म के बाद से अब तक अपने सफर में भारत कई मुश्किल मोड़ों से गुजरा है. बंटवारा, 1960 के दशक के युद्ध और अकाल, 1970 के दशक में इंदिरा गांधी की इमरजेंसी और 1980 और 90 के दशक के सांप्रदायिक दंगे इनमें गिने जा सकते हैं. लेकिन आज जो हालात हैं उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा मुश्किल वक्त इस देश ने पहले कभी नहीं देखा. यह इसलिए कि कोविड-19 नाम की इस महामारी ने कम से कम छह अलग-अलग संकट पैदा किए हैं.

पहला और सबसे साफ दिखता संकट स्वास्थ्य व्यवस्था का है. जैसे-जैसे कोरोना वायरस के मामले बढ़ते जाएंगे, पहले से ही कमजोर और बोझ से कराह रही हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा. ऐसा भी होगा कि सारा जोर और संसाधन इस महामारी पर लगने के चलते वे मरीज उपेक्षित रह जाएंगे जो दूसरी गंभीर समस्याओं की चपेट में हैं. टीबी और हृदय संबंधी बीमारियों के लाखों मरीजों के लिए डॉक्टर और अस्पताल मिलना मुश्किल हो सकता है.

इससे भी ज्यादा चिंताजनक तथ्य उन लाखों बच्चों की सेहत से जुड़ा है जो हर महीने भारत में जन्म लेते हैं. इन नवजातों को खसरा, गलसुआ, पोलियो और डिप्थीरिया जैसी घातक बीमारियों से बचाने के लिए टीके लगाए जाते हैं. इसके लिए कई सालों में जाकर एक सरकारी व्यवस्था बन पाई है. अब जमीनी रिपोर्टें बता रही हैं कि सारा ध्यान कोविड-19 पर होने की वजह से राज्य सरकारें देश के सबसे नए नागरिकों के टीकाकरण अभियान के मोर्चे पर पिछड़ रही हैं.

दूसरा संकट आर्थिक है और यह भी बहुत स्पष्ट दिख रहा है. इस महामारी ने टेक्सटाइल्स से लेकर एयरलाइंस, पर्यटन और होटल जैसे रोजगार देने वाले उद्योगों को भारी चोट पहुंचाई है. माना जा रहा है कि लॉकडाउन का इससे भी ज्यादा बुरा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ा है जिसने दसियों लाख मजदूरों और कारीगरों का रोजगार छीन लिया है. मुंबई स्थित ‘द सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनॉमी’ का अनुमान है कि मार्च की शुरुआत में जो बेरोजगारी दर सात फीसदी थी वह अब 25 फीसदी के करीब हो चुकी है. पश्चिम यूरोप के अमीर और बनिस्बत बेहतर व्यवस्था वाले देशों में सरकारें नौकरी खोने वालों का ठीक-ठाक वित्तीय राहत दे रही हैं ताकि वे इस संकट का सामना कर सकें. दूसरी तरफ वित्तीय रूप से अपेक्षाकृत कमजोर और कुप्रबंधन के शिकार हमारे देश में इस संकट ने जिन्हें बेसहारा कर दिया है उन्हें सरकार से बहुत थोड़ी ही मदद मिली है.

तीसरा है मानवीय संकट और यह भी बड़ा संकट है. भविष्य में इस महामारी को सैकड़ों मील दूर अपने घरों को लौटते प्रवासियों की तस्वीरों और वीडियो के साथ याद किया जाएगा. कोविड-19 की गंभीरता को देखते हुए पूरे देश में कुछ समय के लिए लॉकडाउन के बारे में सोचा गया होगा, लेकिन इसकी योजना बनाते हुए थोड़ी ज्यादा समझदारी बरती जानी चाहिए थी. जिसे भी भारत के जीवन की बुनियादी समझ है उसे पता होगा कि देश में लाखों प्रवासी हैं जो अपने परिवारों से बहुत दूर कहीं नौकरी या छोटा-मोटा काम धंधा करते हैं. यकीन करना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री या उनके सलाहकारों का ध्यान इस पर नहीं गया होगा. अगर प्रधानमंत्री लोगों को चार घंटे के बजाय एक हफ्ते का नोटिस और यह भरोसा देते कि इस दौरान देश में ट्रेनें और बसें सामान्य तरीके से चलती रहेंगी तो घर लौटने की इच्छा रखने वाली एक बड़ी आबादी बहुत आसानी से ऐसा कर सकती थी.

जैसा कि विशेषज्ञ भी बता रहे हैं, लॉकडाउन की योजना ठीक से नहीं बनाई गई इसलिए स्थिति और बिगड़ गई है. अगर रोजगार खोने वाले कामगारों को मार्च की शुरुआत में ही अपने परिवारों के साथ घर लौटने दिया जाता तो वायरस लेकर लौटने वालों की संख्या कहीं कम होती. अब दो महीने बाद अपराधबोध से दबी सरकार जब ट्रेनें चला रही है तो दसियों हजार लोग वायरस के वाहक बनकर अपने-अपने जिलों को लौट रहे हैं.

यह मानवीय संकट एक बड़े सामाजिक संकट का हिस्सा है जो इस देश के सामने मुंह बाए खड़ा है. लंबे समय से भारतीय समाज अलग-अलग वर्गों और जातियों के आधार पर बंटा रहा है. धर्म को लेकर भी यह पूर्वाग्रहों का शिकार रहा है. कोविड-19 और जिस तरीके से इससे निपटा गया है, उसने इन खाइयों को और चौड़ा कर दिया है. इसका सबसे ज्यादा शिकार उन्हें होना पड़ा है जो पहले से ही आर्थिक रूप से पिछड़े हैं. इसके अलावा जिस तरह से सत्ताधारी पार्टी के सांसदों ने कोरोना वायरस के मामलों को धर्म के आधार पर बांटा (इससे भी ज्यादा खेद की बात यह है कि कुछ वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने भी ऐसा किया) उसने मुस्लिम समुदाय की असुरक्षा को बढ़ाने का काम किया है. भारत के मुसलमानों के साथ जब कोरोना वायरस का दाग जोड़ा जा रहा था तो प्रधानमंत्री चुप रहे. जब खाड़ी देशों ने इसकी तीखी आलोचना की तब जाकर उनका बयान आया कि यह वायरस कोई धर्म नहीं देखता. तब तक सत्ताधारी पार्टी और इसके ‘गोदी मीडिया’ द्वारा फैलाया गया जहर देश के आम नागरिक की चेतना में गहरा समा चुका था.

चौथा संकट पहले तीनों जितना साफ तो नहीं है, इसके बावजूद यह काफी गंभीर हो सकता है. यह संकट मनोवैज्ञानिक है. लंबे लॉकडाउन के चलते जिन्होंने अपना रोजगार खोया है और जो पैदल ही घर लौटने को मजबूर हुए हैं उनमें अब शायद ही कभी इतना आत्मविश्वास आ सके कि वे शहरों की तरफ रुख कर सकें. इस संकट का स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चों पर क्या मनोवैज्ञानिक असर होगा, यह भी खास तौर पर सोचने वाली बात है. बड़ों की बात करें तो आर्थिक अनिश्चितता के चलते उनमें अवसाद यानी डिप्रेशन और दूसरी मानसिक बीमारियां बढ़ सकती हैं. इसका उन पर और उनके परिवारों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है.

पांचवां संकट भारत में संघीय व्यवस्था के कमजोर होने का है. इस महामारी से निपटने के लिए केंद्र ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एक्ट लागू किया. इससे उसके पास असाधारण शक्तियां आ गई. कम से कम शुरूआती महीनों में राज्यों को वह आजादी नहीं दी गई कि वे स्थानीय हालात को देखकर अपनी जरूरतों के हिसाब से फैसले ले सकते. इसके उलट केंद्र ही मनमाने और कभी-कभी विरोधाभासी दिशा-निर्देश जारी करता रहा. और इस दौरान राज्य धन की कमी से जूझ रहे हैं और उन्हें जीएसटी का उनका हिस्सा तक नहीं मिल सका है.

छठा संकट पांचवें संकट के साथ ही जुड़ा हुआ है और यह है भारतीय लोकतंत्र के क्षरण का. इस महामारी की आड़ में बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को यूएपीए जैसे बर्बर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया जा रहा है. संसद में बिना किसी चर्चा के अध्यादेश पारित हो रहे हैं और बड़े नीतिगत फैसले लिए जा रहे हैं. बड़े अखबारों और टीवी चैनलों पर दबाव डाला जा रहा है कि वे सरकार की आलोचना न करें. उधर, राज्य व्यवस्था और सत्ताधारी पार्टी प्रधानमंत्री के छवि निर्माण कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं. आपातकाल के समय सिर्फ एक देव कांत बरुआ थे जिन्होंने कहा था कि ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’. आज प्रधानमंत्री की सरेआम चापलूसी करने में उनके कैबिनेट मंत्री एक दूसरे को मात देने में लगे हैं.

स्वास्थ्य व्यवस्था पर क्षमता से ज्यादा बोझ है; अर्थव्यवस्था की हालत जर्जर है; समाज बंटा हुआ और नाजुक है; संघीय व्यवस्था अब तक की सबसे कमजोर अवस्था में है; राज्य व्यवस्था लगातार एकाधिकारवादी होती जा रही है - इन सभी बातों का मेल इतना बड़ा संकट बनाता है जो शायद भारत ने बंटवारे के बाद से अभी तक नहीं देखा.

सवाल उठता है कि एक देश के रूप में हम क्या जतन करें कि यह असाधारण संकट जब भी खत्म हो, हमारी अर्थव्यवस्था, हमारा समाज और हमारी राजनीति कुछ हद तक बचे रहें. सबसे पहले सरकार को स्पष्ट तौर पर यह स्वीकार करना होगा जिन समस्याओं का सामना इस वक्त हमारा देश कर रहा है उनके कई - और अक्सर आपस में जुड़े हुए - आयाम हैं. दूसरी बात यह है कि सरकार को उससे सीख लेनी चाहिए जो नेहरू और पटेल ने 1947 में किया था. इन दोनों हस्तियों को जब देश के सामने खड़ी असाधारण चुनौती का अहसास हुआ तो उन्होंने विचारधारा के मतभेदों को किनारे रख दिया और बीआर अंबेडकर जैसे उन दिग्गजों को भी कैबिनेट में शामिल किया जो उनके विरोधी हुआ करते थे. उस तरह की एक राष्ट्रीय सरकार अभी तो संभव नहीं लेकिन, यह तो निश्चित रूप से हो ही सकता है कि प्रधानमंत्री क्षमता और विशेषज्ञता रखने वाले पक्ष-विपक्ष के नेताओं से सलाह-मशविरा करते रहें.

तीसरा, प्रधानमंत्री को जल्दबाजी में ऐसे निर्णय लेने से बचना चाहिए जिनका पहला मकसद नाटकीय प्रभाव पैदा करना हो. इसके बजाय उन्हें अर्थशास्त्र, विज्ञान और जनस्वास्थ्य के विशेषज्ञों की राय पर भरोसा करना चाहिए. चौथा, केंद्र और सत्ताधारी पार्टी को गैर भाजपा शासित राज्यों को परेशान करना बंद करना चाहिए. पांचवां, सिविल सेवा, सैन्य बलों, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों को सत्ताधारियों के हाथों का हथियार बनाने की कोशिश करने के बजाय केंद्र को उन्हें पूरी स्वायत्तता देनी चाहिए.

सुझावों की यह सूची आंशिक है और हमारे अतीत और वर्तमान की एक व्यक्ति की समझ पर आधारित है. आखिर में मैं फिर दोहराऊंगा कि यह कोई साधारण परिस्थिति नहीं है बल्कि यह हमारे लोकतंत्र के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. इससे पार पाने के लिए हमें अपनी सारी बुद्धिमत्ता, सारे संसाधन और सारी करुणा का इस्तेमाल करना होगा.