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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-ये आत्ममुग्धता और उत्सवधर्मिता का समय है

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-ये आत्ममुग्धता और उत्सवधर्मिता का समय है



इस समय राफेल लड़ाकू विमान के भारत आने को एक बड़ा इवेंट बनाया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि पौराणिक पात्र कल्कि का राफेल नया अवतार हो। फ्रांस से हमने जो लड़ाकू विमान राफेल खरीदा है क्या उसे दूसरे देश नहीं खरीद सकते? ये अच्छी बात है हम अपने देश की सीमा को सुरक्षित करके संभावित खतरों से आगाह रहें। हमारे पास नई से नई तकनीक औजार रहे। भारतीय हवाई दल में अब तक 118 जग्वार, 272 सुखोई, 45 मिराज, 65 मिग 29, 54 मिग 21, 17 तेजस शामिल हुए किंतु राफेल जैसी ड्रामेबाजी, इवेंट कभी नहीं बना। सोशल मीडिया और गोदी मीडिया के माध्यम से ऐसा प्रचारित किया जा रहा है मानो राफेल के आने से देश की बाकी समस्याएं हल हो जायेंगी। कुछ चैनल को देखकर तो लग रहा है मानो भारतीय वायु सेना की स्थापना ही अभी हुई है।

राष्ट्रीय सुरक्षा नि:संदेह केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए अत्याधुनिक हथियारों की उपलब्धता भी आवश्यक है लेकिन मौजूदा सरकार हथियारों की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित करने की बजाय सैन्य-शक्ति के अनावश्यक प्रदर्शन पर अधिक बल दे रही है। दरअसल, मीडिया को गुलाम बनाकर वह उसे सरकारी प्रचार तंत्र की तरह इस्तेमाल करती है। चारण मीडिया प्रत्येक सरकारी पहलकदमी का गुणगान कर सरकार के पक्ष में वातावरण बनाने में पूरी तरह अपने को झोंक देता है। राफेल के मामले में भी यही देखने में आ रहा है। गुणगान इस हद तक कि मात्र पांच राफेल विमानों के आने से भारत की ओर चीन और पाकिस्तान अब आंख उठाने की भी हिम्मत नहीं कर सकेंगे। दरअसल, इस घनघोर प्रचार से जनमत को अनुकूलित करने की नीति इसके पीछे काम कर रही है। इसके दो लक्ष्य हैं। हाल के दिनों में, खासतौर पर चीन के मामले में, कूटनीतिक मोर्चे पर सरकार की विफलता को झूठे प्रचार से ढंकने की कोशिश है। दूसरी तरफ यह जनता को देश की बढ़ती सैन्यशक्ति का झूठा आश्वासन देकर मज़बूत सरकार के मिथक के ज़रिए फुसलाने की भी कोशिश है। राफेल को लेकर अंधाधुंध प्रचार के पीछे एक तीसरा निहित उद्देश्य यह है कि यह भाजपा के अतिवादी राष्ट्रवाद के एजेण्डा को पुष्ट करता है। एक चौथा लक्ष्य यह भी है कि एक राफेल के आगमन को उत्सव में रूपांतरित कर देने पर उसके सौदे को लेकर पिछले दिनों हुए विवाद की स्मृतियों को पोंछ देने में भी कामयाबी हासिल की जा सकेगी। खासतौर से उसकी कीमत में हुई तीन गुना बढ़ोत्तरी को लेकर उठाई गई शंकाएं सरकार द्वारा दी गई सफाई पर उच्चतम न्यायालय की सहमति के बाद भी चिंगारी की तरह बची हुई है। सरकार के शौर्य प्रदर्शन के शोर में शायद ये चिंगारियां बुझ जाएं। गौर करें कि पूर्ववर्ती सरकारें भी ज़रूरी रक्षा सौदे करती रही हैं। उनके बारे में संसद या इतर मंचों से जनता को सूचित भी करती रही है, लेकिन इस तरह इतने बड़े पैमाने पर उनका भोंडा प्रचार कभी नहीं किया गया। यह अभूतपूर्व है। यह तब है, जब तय सौदे के छत्तीस में से अभी सिर्फ पांच विमान आ पाए हैं।

दरअसल, मौजूद सरकार अलग-अलग मोर्चों पर अपनी सक्रियता को भुनाने में माहिर है। वह काम करने की बजाय काम करते हुए दिखने में ज़्यादा विश्वास करती है। वह अपनी अकर्मण्यता का भी उत्सव मना सकती है, जैसा कि कोरोना-प्रबंधन में दिखाई देता है। इन नाकामियों के बीच वह राफेल के आगमन पर भव्य स्वागतोत्सव रचकर अपनी साख बिठाने का उद्यम कर रही है। अब तक यह समझना कठिन नहीं रहा कि वह कामयाबी को ही नहीं, अपनी नाकामियों को भी भव्य प्रचार के ज़रिए उत्सव के रूप में आदतन पेश करती है। राफेल उत्सव को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।

यह आत्ममुग्धता और कथित आत्मनिर्भरता का समय है। गोदी मीडिया और भक्त फूलेे नहीं समा रहे हैं। चारों तरफ राफेल की जय-जयकार है। प्रधानमंत्री मोदी संस्कृत का श्लोक ट्वीट कर रहे हैं राष्ट्र रक्षा से बढ़कर ना कोई पुण्य है, न कोई व्रत, ना ही कोई यज्ञ। गृहमंत्री अमित शाह इन्हें गेम चेंजर बता रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि ये राफेल हमने फ्रंास से खरीदा नहीं, खुद बनाया है। राफेल की टेक्नालॉजी केवल हमारे पास है। पाकिस्तान, चीन, नेपाल,  बांग्लादेश,  अफगानिस्तान और बाकी देश यदि युद्ध हथियार बेचने वाले देश फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका, रूस के पास जायेंगे तो वे मना कर देंगे कि नहीं हम तो केवल मोदीजी के भारत को ही हथियार बेचेंगे। राष्ट्रभक्ति की धुन पर थिरकने वाले लोगों को शायद पता नहीं कि बहुत सारी कंपनियां मोटा कमीशन लेकर अपने हथियार, युद्ध सामग्री, जहाज बेचते हैं। बोफोर्स की दलाली की स्याही अभी ठीक से सूखी नहीं है। राफेल को भी बढ़ी हुई कीमत पर खरीदने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राहुल गांधी ने सरकार से पूछा है कि हर विमान को 526 के बजाय 1670 करोड़ में क्यों खरीदा गया? 126 के बजाय 36 राफेल ही क्यों? एचएएल को ठेका क्यों नहीं दिया गया। मेक इन इंडिया की जगह मेक इन फ्रांस क्यों? हमारे देश के रक्षा सौदे दलालों के माध्यम से ही तय होते हैं। सरकार कोई भी हो, युद्ध की बड़ी सामग्री वो सीधे नहीं खरीदकर दलालों के माध्यम से खरीदती है। इस खरीद में देशहित के साथ ही बहुत से लोगों के हित भी जुड़े होते हैं।

आत्ममुग्धता पतन का अंधा दरवाजा होता है। ये वो मानसिक दोष है जो इंसान को न केवल खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने की गलतफहमी की ओर ले जाता है, बल्कि आगे जाकर उसे वास्तविकता से कोसों दूर खड़ा कर देता है। मोदी सरकार की आत्ममुग्धता के चश्मे ने भी यही किया है और देश को एक बहुत बड़ी अंधेरी खाई की ओर धकेल दिया है। सन् 2014 की जीत और गुजरात की पृष्ठभूमि ने देश को उम्मीदों के दरवाजे पर लाकर खड़ा किया। शुरुआती दौर में सचिवालय पर कसावट, मंत्रियों की वेशभूषा पर नजऱ, होटलों में मंत्रियों के जाने पर प्रतिबंध जैसे कई शुरुआती कदमों ने मोदी मैजिक को भारतीय जनमानस के रंगमंच पर आशाओं की चमक से भर दिया। जनता अच्छे दिन आने का इंतजार करने लगी। सरकार हर निर्णय को इवेंट में बदलने लगी। इवेंट महिमामंडन में बदल गए। मीडिया को इस इवेंट रूपी आपदा को अवसर बनाने में देर नहीं लगी। इस सरकार ने नोटबंदी को इवेंट में बदला। जीएसटी को इवेंट में बदला। आधी रात को संसद खुली। झालर लगीं, आतिशबाजी हुई, बटन दबाकर एक देश एक कर का नारा बुलंद हुआ लेकिन जीएसटी की व्यवस्था में इतने अधिक बदलाव हुए कि ये जीएसटी व्यापारियों के लिए मानसिक संताप का कारण बन गया। 29 जुलाई 2020 को भारत सरकार के वित्त विभाग ने कह डाला कि जीएसटी में राज्यों को हिस्सा देना संभव नहीं। एक देश, एक कर के साथ शायद अगला नारा एक देश, एक कर और एक दल ना बन जाये।

आत्ममुग्धता अगर और बढ़ी तो देश ऐसे रास्ते पर चले जाएगा जिसकी कल्पना करना कठिन है। देश आत्ममुग्धता से नहीं बल्कि बेहद गंभीरता से चलता है। हर 50 किलोमीटर पर भाषा, संस्कृति, जीवनशैली और आय के साधन में विविधता वाले देश को आत्ममुग्धता की चाशनी में डुबाकर मीठा नहीं किया जा सकता। इसके अलावा वैश्विक परिदृश्य में आत्ममुग्धता और स्वयं की महिमा का मंडन तो केवल दूसरे देशों को या तो अपने स्वार्थ साधने का मौका देता है या फिर भारत पर हंसने का।

राफेल की अगवानी और राममंदिर के शिलान्यास के उत्सव के बीच राजस्थान विधानसभा का घटनाक्रम, मध्यप्रदेश में कांग्रेस के निर्वाचित विधायकों का अनायास इस्तीफा देना और उसके पीछे काम करती ताकतों, पैसों के खेल जैसे जरूरी सवाल भी हैं। कोरोना वायरस से उपजी आर्थिक तंगी, बेरोजगारी भी है जिसके बारे में सत्तापक्ष, गोदी मीडिया बात नहीं करना चाहता। वह देश की जनता को कभी युद्ध की ओर तो कभी धर्म की ओर ले जाता है। थोड़े दिन पहले असुरक्षा से गुजर रहे देश को राफेल के आ जाने से मिली सुरक्षा का गुणगान करते हुए रामनामी धुन पर थिरकने का एक और अवसर, उत्सव उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि वह अपने अवसाद, अपनी आर्थिक तंगी, बेरोजगारी को भूलकर हमेशा की तरह उत्सवों में मस्त रहे।