डॉक्टर होने के नाते जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, घर पर शांत नहीं बैठ सकते थे

डॉक्टर होने के नाते जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, घर पर शांत नहीं बैठ सकते थे

AKJ-रायपुर : कोरोरना के कर्मवीरों की कड़ी में आज हमारी टीम एक ऐसे सख्स के पास पहुंची जिन्होंने तालाबंदी के दौरान प्रदेश का पहला ऑनलाइन स्टार्टअप शुरू किया और उनके अस्पताल में काम करने वाले स्टाफ को एक नया रोजगार और अनुभव दिया। राजधानी रायपुर के नई राजेंद्र नगर इलाके के जाने माने दन्त चिकित्सक डॉ अरविन्द जैन MDS का में रोड पर ही उनका अपना दातों का अस्पताल है, लेकिन तालाबंदी के दौरान आंख, कान, दांत के अस्पताल बाद किये गए थे ताकि कोरोना से सोशल डिस्टेंसिंग बनाई जा सके। लेकिन जो कर्मवीर होते हैं उन्हें चैन कहां, और ऐसा ही कुछ अनुभव तालाबंदी के दौरान रहा डॉ अरविन्द जैन का। तालाबंदी के दौरान जहाँ लोह डॉक्टर या फिर मेडिकल जाने के नाम पर घरों से निकलने से बाज नहीं आरहे थे, वहीं डॉ. अरविन्द उनके सरे परिचितों और पेशेंटों सहित हजारों लोगों को घर पर ही रोके हुए थे। 


हप्ते भर तो निकल गए लेकिन उसके बाद बड़ी मुश्किल थी 

तालाबंदी का पहला दिन ही बड़ा अटपटा लग रहा था, क्योंकि इसके पहले हर रोज 12-12 घंटे तक काम करने आदत हो चुकी थी। शुरुआती हप्ते भर तो कैसे भी चीजे कंट्रोल में थी लेकिन मरीजों के फोन कॉल्स इतने ज्यादा बढ़ गए की की घर से मैनेज कारण मुश्किल हो गया। फोन पर सजेशन दे रहा था घरेलु नुख्से बता रहा था, लेकिन उसकी भी एक लिमिट थी। फिर ऑनलाइन वीडियो कॉल्स पर मरीजों से बात करना शुरू किये, इस दौरान एक बड़ी आश्चर्यजनक घटना घटी की जब तक फोन पर नार्मल कॉलिंग पर दवाइयां बता रहे थे तब तक लोग संतुस्ट नहीं हो रहे थे, लेकिन जैसे ही वीडियो काल पर लोगों से बात करना शुरू किया लगभग 30% मरीज मेरी बताई हुई दवाइयों से संतुस्ट हो रहे थे। 


कोरोना से लोग बहुत ज्यादा डरे हुए थे 

इस दौरान तालाबंदी के वक्त दूसरे लोगों की तरह खाली नहीं बैठ पाया, बल्कि फोन पर ऑनलाइन वीडियो कलिंग के माध्यम लोगों का इलाज करता रहा। इसके साथ ही होम कोरेन्टीन में जो लोग थे उनसे लगातार संपर्क में था, उनको दवाइयों से ज्यादा मानसिक तौर पर उनके मनोबल को स्थिर बनाये रखने की आवश्यकता थी तो मैं लगातार संपर्क में रहकर उनके स्वास्थ्य की समीक्षा कर रहा था। उनके मन के भीतर के डर से उनको बहार निकलना बहुत मुशकित था लोगों को लाख समझाने के बावजूद उनको चिंता बनी हुई थी। लेकिन जैसे ही छत्तीसगढ़ में पहले कोरोना मरीज के ठीक होने की जानकारी बहार आई उसके बाद घरों में या अस्पतालों में जिन्हें कोरेन्टीन किया गया था उनके आत्मविस्वास में चमत्कारिक बढ़ोतरी हुई। इसके आलावा आस-पास, पहचान के लोग बार-बार फोन करके या घर में आकर कोरोना से सम्बंधित जानकारी ले रहे थे। 


लम्बे समय के बाद खुद के लिए समय मिला

घर में थे तो टीवी देखना सबसे ज्यादा हुआ और ये पिछले कई सालों बाद ऐसा हुआ की इत्मीनान से घर में बैठकर टीवी देख रहे थे और कोई डिस्टर्ब करने वाला नहीं था। इसके साथ ही बच्चों के साथ खुद के बचपन को दोबारा जीने का मौका मिला। इस तालाबंदी के दौरान मुझे मेरे बालपन की कई घटनाएं याद आती रहती थी और उन सभी घटनाओं को मई अपने बच्चों के साथ शेयर करने का मौका मिला। 


तालाबंदी के दौरान पहला ऑनलाइन स्टार्टअप शुरू किया

तालाबंदी के दौरान दूसरे राज्यों से आये मेरे अस्पताल में काम करने वाले लड़के जो यहां फसे हुए थे उनके लिए एक ऑनलाइन हरी सब्जी होम डिलेवरी का प्लेटफार्म तैयार किया, जिसका नाम मोर सब्जी डॉट कॉम रखा गया था। इसके माध्यम से ऑनलाइन लोगों को उनके घरों तक सब्जियां पहुंचवाने का काम भी किया। इसमें जिसको जो सब्जी चाहिए होती थी वो ऑनलाइन बुक करते थे जिसे हमारे लड़के उनके घर पर डिलवर्ड करते थे। ये तालाबंदी के दौरान ऑनलाइन खरीदी का पहला ऑनलाइन स्टार्टअप प्लेटफार्म है। 


कोई तो मेरे पापा की भी मदद करेगा 

मेरे पापा भी तालाबंदी में कोटा में फसे हुए थे जो हमारे लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात थी। इसलिए हम उन सभी परिवारों का दर्द महसूस कर रहे थे जिनके परिजन तालाबंदी में बहार फसे हुए थे। और ये सबसे बड़ा कारन बना की मैं रायपुर में बहार के फसे लोगों की मदद करने निकल पड़ा इस आस में की यदि मैं यहां पर लोगों की मदद करूंगा तो कोटा में फसे मेरे पापा की भी कोई न कोई मदद जरूर करेगा। 


अपील 

जैसा की आज कल टीवी चैनलों के समाचारों में देखने को मिल रहा है की पूरी दुनिया भर में तालाबंदी के दौरान नेचर में हुए अभूतपूर्व बदलाव को देखकर आधी दुनिया के देशों में ये बहस चल रही है की पूरी योजना के साथ अब हर वर्ष 20 दिन से लेकर महीने भर का लॉकडाउन किया जाये, ताकि प्रकृति को खुद को सुधारने का मौका मिले। और ये तो बहुत ज्यादा जरूरी भी है नहीं तो भविष्य में इसके बहुत ही ज्यादा विनाशकारी परिणाम भुगतने पड़ेंगे।