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छत्तीसगढ़ में अपनी लोक संस्कृति को भी नहीं बचाया जा सका: मंगलेश डबराल

छत्तीसगढ़ में अपनी लोक संस्कृति को भी नहीं बचाया जा सका: मंगलेश डबराल

’पहाड़ पर लालटेन’ (1981) से अपनी काव्य यात्रा की शुरूआत करने वाले साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित मंगलेश डबराल समकालीन हिंदी कविता के एक विशिष्ट हस्ताक्षर है। ’घर का रास्ता’, ’हम जो देखते हैं’, ’आवाज भी एक जगह है’ और ’नये युग में शत्रु’ काव्य संग्रह सहित बट्रोल्ट ब्रेख्त, तादेऊष रूजेविच, पाब्लो नेरूदा तथा एनैस्तों कादैनल जैसे महत्वपूर्ण विदेशी कवियों की कविताओं के अनुवाद का श्रेय भी कवि मंगलेश डबराल के खाते में जाता है। ’साहित्य अकादमी’, ’पहल सम्मान’, ’कुमार विकल सम्मान’ जैसे सम्मानों से सम्मानित मंगलेश डबराल आठवे दशक के पश्चात् के हिंदी के महत्वपूर्ण कवियों में से एक है। 

’तुम्हारा प्यार लड्डूओं का थाल है, जिसे मैं खा जाना चाहता हूं, तुम्हारा प्यार एक लाल रूमाल है, जिसे मैं झंडे-सा फहराना चाहता हूं, तुम्हारा प्यार एक पेड़ है, जिसकी हरी ओट से मैं तारों को देखता हूं, तुम्हारा प्यार एक झील है, जहां मैं तैरता हूं और डूबा रहता हूं’ जैसी काव्य पंक्तियां लिखने वाले पिछले दिनों कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के हिंदी दिवस समारोह में बतौर मुख्यअतिथि शामिल हुए। वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने समय निकालकर आज की जनधारा’ की विशेष संवाददाता जीतेश्वरी से की विशेष बातचीत।

 ’पहाड़ पर लालटेन’ आपका पहला काव्य संग्रह है। जिसमें एक अलग तरह की कविताएं है जो अपने लिए एक अलग काव्य मुहावरा गढ़ती है। इसकी जरूरत आपको क्यों महसूस हुई?

मंगलेश डबरालः मेरा जन्म पहाड़ में हुआ जहां प्रकृति भरपूर थी और आसमान, नदिया, पेड़, पहाड़ खूब घनी रात। इसके बाद मुझे शहर आना पड़ा तो जो कुछ भी पूंजी मेरे पास थी तो वह मेरे पहाड़ और प्रकृति की पूंजी थी। मेरी कविता में बिम्ब आये, दृश्य आये वह सब पहाड़ से सम्बंधित थे। उसके साथ-साथ यह भी था कि पहाड़ से सीधे मैदान में चले आने से मेरी कविता में एक तनाव उत्पन्न हुआ। मैं जब उन कविताओं को लेकर दिल्ली आया बिम्ब, दृश्य उसमें थे वे सब हिंदी कविता में बहुत कम आए थे। इस तरह जब मैंने अपने कविता संग्रह का नाम ’पहाड़ पर लालटेन’ रखा तो लांेगो ने कहा ये तो कोई नाम नहीं हुआ, इस बात का क्या मतलब होता है? लेकिन आज लोंगो को ये लग रहा है कि ’पहाड़ पर लालटेन’ बहुत अच्छा नाम था। तो कहने का अर्थ यह है कि उस समय ’पहाड़ पर लालटेन’ का जो बिम्ब था वह हिंदी कविता में नई तरह की बिम्ब योजना थी। 

आपकी बाद की कविताओं में भी यही काव्य मुहावरा दिखाई देता है, क्या समकालीन कविता ने आपको प्रभावित नहीं किया?

मंगलेश डबरालः जब मैंने ’पहाड़ पर लालटेन’ कविता लिखी तब मैंने बहुत ज्यादा कविताएं नहीं पढ़ी हुई थी। लेकिन बाद में तो मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ा, रघुवीर सहाय की कविताओं का प्रभाव पड़ा, जर्मन कवि बट्रोल्ट ब्रेख्त का प्रभाव पड़ा और शमशेर सिंह का नागार्जुन का त्रिलोचन का इन सबका प्रभाव पड़ा। प्रभावित तो बहुत लोंगो से हुआ और मैं आज भी प्रभावित हूं। मनुष्य एक पत्थर से भी प्रभावित हो सकता है।  

अपने समकालीन कवियों में राजेश जोशी, अरूण कमल, आलोक धन्वा और असद जैदी में आप किसे पसंद करते है? 

मंगलेश डबरालः आलोक धन्वा मेरा घनिष्ठ मित्र है। मुझे विभिन्न लोगों की कविताएं विभिन्न कारणों से पसंद है। आलोक धन्वा की जो ’दुनिया रोज बनती है’ काव्य संग्रह है वह अदभुत है। उस तरह की कविताएं और उस तरह की क्रांतिकारी संवेदना ,एक काव्यात्मक संवेदना जो आलोक धन्वा में है, वह संवेदना बहुत कम कवियों में है। दूसरी तरफ असद जैदी की जो दुनिया है वह बहुत आलोचनात्मक है, उसमें चीरफाड़ है जो आलोक के यहां नहीं मिलती। असद के यहां यथार्थ है, आलोक के यहां दूसरी चीजें अदभुत है। इस तरह राजेश और अरूण कमल की कुछ कविताएं मुझे पसंद है। 

आपने अनेक विश्व कवियों के कविताओं का अनुवाद किया है आपके प्रिय विदेशी कवि कौन है?

मंगलेश डबराल: मेरी यह पसंद भी व्यापक है। असल में मेरे दिमाग में अच्छे कवि की बजाय अच्छी कविता ज्यादा रहती है। मैं कविताओं से ही एक कवि को पसंद करता हूं और मैं अच्छी कविताओं का मुरीद हूं। मसलन पाब्लो नेरूदा की कविताएं बहुत पसंद है। नाजिम हिकमत, बट्रोल्ट तो मेरे बहुत प्रिय है उनका बहुत प्रभाव मुझ पर पड़ा है। इसके अलावा पोलैंड के तीन चार कवि हंै जैसे विस्लावा सिम्र्बोस्का मुझे बेहद पसंद है। 

आपने पिछली सरकार द्वारा आयोजित रायपुर साहित्य महोत्सव में आने से इंकार कर दिया था, क्या इसलिए कि आप भाजपा को पसंद नहीं करते जबकि अशोक वाजपेयी तक इसमें आए थे? 

मंगलेश डबरालः  मैं इस कारण से नहीं आया था क्योंकि भाजपा सरकार की, जिसकी विचाारधारा मुझे बिल्कुल पसंद नहीं जिसका मैं आलोचक भी हूं, विरोधी भी। जिसको मैं बहुत गलत मानता हूं ऐसे किसी सरकार के आयोजन में मैं शामिल नहीं होता। मध्यप्रदेश में जब तक भाजपा सरकार रही मैं कभी भारत भवन नहीं गया, मैंने हमेशा बहिष्कार किया। इस तरह मैंने उत्तराखंड और राजस्थान के सांस्कृतिक आयोजनों का बहिष्कार किया। मैं ऐसे कार्यक्रमों में नहीं जाता जो साम्प्रदायिक , मनुष्य विरोधी और घृणा फैलाने वाले होते हंै। अशोक वाजपेयी जी के बारे में मैं सिर्फ यही कह सकता हूं कि बहुत से लोगों की यह राय है कि हमें ऐसे मंचों का उपयोग करना चाहिए जिनसे हमारी विचारधारा नहीं मिलती है फिर भी ऐसे मंचों पर जाकर अपना विरोध प्रकट करना चाहिए। लेकिन मैं ऐसे मंचों पर जाता ही नहीं क्योंकि उन सबकों इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता है।  

 बीजेपी सरकार आज कल जगहों के नाम बदलने में लगी हुई है। हाल ही में फिरोजशाह कोटला स्टेडियम को अरूण जेटली स्टेडियम कर दिया। क्या यह हिंदी के प्रति प्रेम है या धार्मिक कट्टरतावाद? 

मंगलेश डबराल:   यह हिंदी के प्रति प्रेम तो कतई नहीं है। हिंदी के प्रति प्रेम होता तो यह जेटली के निधन के बाद क्यों होता। चूंकि अरूण जेटली वहां थे और उसके एशोसिएसन के अध्यक्ष भी रहे लेकिन इससे नाम बदलने का क्या मतलब हुआ? अरूण जेटली का वहां अध्यक्ष रहना तो इसका कोई कारण नहीं। नेहरू युग में ये जो नाम दिए गए उसका आशय यह था दिल्ली पर ज्यादातर मुस्लिम शासकों का नियंत्रण रहा है। राजधानी दिल्ली रही है तो शासकों का एक तरह से सम्मान करते हुए उस समय नाम रखा गया पर इसमें हिंदू मुस्लिम पक्षपात जैसी कोई चीजे नहीं थी। यह सरकार चीज का हिंदूत्वकरण करना चाहती है। इसी तरह मुगलसराय से दीनदयाल उपाध्याय का कोई सम्बंध है ऐसा मैं नहीं मानता। 

छत्तीसगढ़ में पिछले 19 वर्षों से न तो साहित्य अकादेमी है न कला अकादेमी। आप इस कांग्रेस सरकार से क्या यह उम्मीद रखते है कि यहां अब साहित्य और कला पर कुछ अच्छा किया जायेगा। 

मंगलेश डबरालः मुझे बेहद अफसोस है कि आपके पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में जितनी सक्रियता है, उसमें बहुत से पुरस्कार है, गतिविधियां वह पूरे देश में नहीं है। आज लग रहा है कि भारत भवन कितनी बड़ी उपलब्धि है। मध्यप्रदेश में आज भी साहित्य और कला की स्थिति बहुत अच्छी है पर दुखद यह है कि छत्तीसगढ़ में अपनी लोक संस्कृति को भी नहीं बचाया जा सका। हबीब तनवीर जैसे बड़े रंगकर्मी यहां हुए और तीजन बाई, सुरूज बाई खांडे जैसी नायाब लोक गायिकाएं भी छत्तीसगढ़ से ही हुई। छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति की तो कोई जवाब ही नहीं है। मैंने विनोद वर्मा मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार से इन सारे विषय पर अपनी चिंता प्रकट की है, उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है कि वे इस क्षेत्र में विशेष रूप से ध्यान देंगे।  

हिंदी दिवस पर हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप को लेकर आप क्या सोचते है?

मंगलेश डबरालः  हिंदी सेवा के नाम पर दुकाने भरी हुई है, हिंदी बाजार की भाषा बन गई है। वैश्विक उदारीकरण के इस दौर में हिंदी का इस्तेमाल केवल मार्केट में अपना पैर जमाने के लिए सर्वाधिक किया जा रहा है। हिंदी को लेकर विचार करने की जरूरत है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जाय। हिंदी का भविष्य उत्तरप्रदेश और बिहार में नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में है क्योंकि यहां की हिंदी ज्यादा खरी है मेरा ऐसा मानना हैंै।  

द मिनिस्ट्री आफ अटमोस्ट हैप्पीनेस ( अपार खुशी का घराना) अरूंधति राय के इस किताब को हिंदी में अनुवाद करने का खयाल आपके मन में कैसे आया?

मंगलेश डबरालः   मैं अरूंधति का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। मुझे उनका पहला उपन्यास ’मामूली चीजों का देवता ’ मुझे बेहद पसंद आया वह एक महान उपन्यास है। उसे मैंने कई बार पढ़ा भी है। मैंने उनसे कहा कि अब आप जो भी उपन्यास लिखेंगी तो मैं उसका अनुवाद करूंगा। जब उनका यह उपन्यास आया तो उन्हें यह लगा कि इसका अनुवाद मुझे करना चाहिए। अरूंधति बहुत अच्छी हिंदी तो नहीं जानती पर उनकी इच्छा रही कि मैं अनुवाद करूं। वे हिंदी और उर्दू से जुड़ना भी चाहती थी और मुझे भी लगा कि इसका अनुवाद मुझे करना चाहिए। जिसकी मुझे बेहद खुशी भी है अनुवाद को अरूंधति ने पूरा सुना भी और कुछ परिवर्तन भी सुझाएं। अनुवाद से वे खुश हुई इस किताब का पांचवां एडिशन भी आ गया है। यह किताब हिंदी जगत में काफी पसंद भी किया जा रहा है। इसकी बिक्री भी खूब हो रही है, मुझे इसकी भी बहुत खुशी है।