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Video: 'मैंने करीब-करीब आत्मकथ्य लिखा है', साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित देश के वरिष्ठ कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल से असीमा भट्ट और सुभाष मिश्र की बातचीत

Video: 'मैंने करीब-करीब आत्मकथ्य लिखा है', साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित देश के वरिष्ठ कवि और उपन्यासकार विनोद  कुमार शुक्ल से असीमा भट्ट और सुभाष मिश्र की बातचीत

हिंदी के प्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल से उनके लेखन प्रक्रिया और मुक्तिबोध से उनके संबंधों को लेकर असीमा भट्ट और सुभाष मिश्र की अंतरंग बातचीत :

विनोद जी, आपके उपन्यास, कहानी में कहीं आपकी पत्नी सुधा जी के बारे में आपने कुछ लिखा है?

इस पर विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं कि मैंने जो कुछ भी लिखा है, करीब-करीब आत्मकथ्यात्मक ही लिखा है. मैं अपने लिखे में उपस्थित हूं. कभी-कभी ये जरूर होता है कि मेरी उपस्थिति गैर-हाजिरी जैसी लगी होगी. पाठकों के लिए मैं परोक्ष रुप से अपने लेखन में उपस्थित रहता हूं और जो कुछ भी मेरा लिखा हुआ है, वो सारा मेरा अनुभव है और पात्र जो भी है, वे मेरे जाने-पहचाने पात्र हैं। मुझे बहुत मुश्किल होता है, अपने जाने-पहचाने लोगों से अलग होकर सोचने में.

विनोद कुमार शुक्ल ने कहा है कि मुझे बच्चों के लिए लिखने में सहूलियत होती है. अपने सारे जाने-पहचाने लोगों का बचपना पहचाना हुआ है. कुछ और अपने मन में फैन्टेसी के रूप में भी है. फैन्टैसी मेरा बहुत अच्छा साथी है जहां मुझे उसकी जरूरत पड़ती है सहारा देने के लिए मुझे मिल जाती है, लेकिन सच्चाई की दुनिया के मैं नजदीक हूं.  

यह पूछे जाने पर कि नौकर की कमीज में दरसल संतू बाबू हैं, वे आप है ऐसा लोगों का कहना है! 

इस पर वे कहते हैं कि मणि कौल जब एक फिल्म बना रहे थे तो उनकी नायिका जोसेफ सोफिया को मणि कौल ने हमारे घर भेजा और दस दिन हमारे घर में मेरी पत्नी के साथ रही क्योंकि वो नौकर की कमीज फिल्म में नायिका का किरदार निभा रही थी। उन्होंने मेरे पत्नी के हावभाव सब कुछ देखा। वो हम लोगों के साथ ऐसे रही, जैसे वो पहले से ही हमारे घर में रहती हो।

विनोद कुमार शुक्ल से यह पूछे जाने पर आपकी कविताओं में पड़ोस बहुत ताकत से मौजूद, बहुत सुंदर है लेकिन यर्थात में आपका पड़ोस ऐसा नहीं है!

इस पर विनोद जी कहते हैं कि हां यह सही है पर देखिए उम्मीद बहुत बड़ी चीज है जब उम्मीद आपके पास नहीं रहेगी तो मेरा ख्याल है कि सबसे बड़ा खालीपन होगा. उम्मीद जो है सारे खालीपन को भरती है। अगर अच्छा पड़ोस नहीं है तो एक अच्छे पड़ोस की उम्मीद तो की जा सकती है। एक अच्छे पड़ोस की गैरहाजरी में, एक अच्छे पड़ोस की उम्मीद जरूरी है।

विनोद कुमार शुक्ल के लेखन प्रक्रिया और उनके कम बोले जाने को लेकर पूछे जाने पर वे कहते हैं कि 

'जब आप बोलना चाहते हैं तो आपके विचार रेलगाड़ी की तरह तेजी से गुजर जाते हैं और शब्द कहीं किनारे रह जाते हैं। आपके विचार एक साथ एक कतार में और सुर में हों, ऐसा शायद नहीं होता. आपकी सोच की रेलगाड़ी की तरह वे धीमी चल रहे हो और मैं बोलने की हड़बड़ी में शायद गाड़ी पकड़ ली हो।

मैं सच्चाई की दुनिया के नजदीक हूं, अपने सारे लिखे में उपस्थित हूं,

गजानन माधव मुक्तिबोध को याद करते हुए कहते हैं कि अब तो मैं मुक्तिबोध को किसी दृश्य की तरह याद करता हूं एक देखा हुआ, एक महसूस किया हुआ जिसमें मैं खुद उपस्थित था. एक समय फिर से अपनी उपस्थिति अपने याद में करने की कोशिश करता हूं और वे मुझे दिख जाए, उस समय मैं एक दृश्य की तरह देखता हूं, अलग-अलग दृश्य में मुक्तिबोध को याद करते हुए देखता हूं।

मैं मुक्तिबोध जी को उसी तरह देख रहा हूं कि खिड़की के सामने जो खुली हुई खिड़की है, वे हमेशा खुली रहती है जिसमें मुर्गी की एक तरह जंग लगी हुई जाली एक तरफ का कोना थोड़ा मुड़ा हुआ और और उस जाली से तालाब दिखाई देता है। रानीसागर तालाब दिखाई देता है. वहां पर बैठकर कविता भी सुझी होगी। मुक्तिबोध जी के पास जाने से ऐसा लगता है कि सारे संसार भर की कविता उनको घेरने के लिए वहां उपस्थित है जैसे वो अपने लेखन में उपस्थित होने का इंतजार कर रही हो। 

देश के प्रख्यात कवि उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल गजानन माधव मुक्तिबोध को याद करते हुए ये बात कह रहे हैं. 

मुक्तिबोध जी की कल 13 नवंबर को जयंती थी. इस जयंती के अवसर पर आप उन्हें किस तरह से देखते हैं, यह पूछने पर यह बात कहते हैं कि जो मैंने कविता लिखी थी जो प्रकाशित हुई थी, वो जो जाली है खिड़की से देखते हुए तालाब में पड़ी हुई, उसमें कोई मछली फंसती नहीं. इस तरह मानो कोई कविता थी. मैं मुक्तिबोध को जब भी याद करता हूं तो यह दृश्य हमेशा मेरे सामने होता है. कागज में लिखे बड़े-बड़े अक्षरों में बिखरे हुए उनके शब्द टेबल के चारों तरफ रखे होते थे, लेकिन कागज बिखरे होते थे. जो पेज नंबर डले होते थे, शायद उनको मुक्तिबोध बाद में समेटते रहे होंगे. जब भी मैं उनसे मिलने जाता था तो वे लिखना विखना बंद कर देते थे और बैठते थे और बातचीत करते। उस समय वे सारी कविताएं कागजों को समेटते जाते और मैं उनकी सहायता करता हूं। मुक्तिबोध को कभी मैं चाय पीते हुए, कभी टिपरिया होटल में साथ गए और एक सिंगल कप चाय मंगाते देखता हूं। वे कभी भी टिपरिया वाले से कहना नहीं भूलते कि एक सिंगल कप गर्म कड़क चाय व एक गिलास ठंडा पानी। जबकि वे जो उस टिपरिया में जाते पर यह कहना कभी नहीं भूलते।

मुक्तिबोध की 50 साल पहले लिखी गई अंधेरे में लिखी गई कविता और विनोद कुमार शुक्ल की रायपुर बिलासपुर संभाग कविता में आए दृश्यों को आप आज किस तरह से देखते हैं?

यह पूछे जाने पर वे कहते हैं कि देखिए बहुत से बदलाव इस दौरान हुए. इस बदलाव का कारण बहुत सी चीजे हैं. एक तो राजनीति की पहुंच और बहुत दूर तक बिहड़ों में भी हो गई है. हर कहीं राजनीति उपस्थित हो गई है. अब बिना राजनीति के गांव वालों के बारे में सोचना मुश्किल हो गया है. जो सरलता थी, पहले छत्तीसगढ़ में अभी भी कहीं तुलनात्मक रूप से देखे तो वह कुछ ज्यादा दिखाई देती है. मुझे बहुत ज्यादा दूसरे गांव की जानकारी नहीं लेकिन मुझे छत्तीसगढ़ के गांव की जानकारी है. वे सरलता कहीं कहीं बची है. ये सरलता अपने मन की है. वे अपने घरों को खूब साफ रखना, गोबर से  लीपकर रखना, कांसे के बर्तन में खाना खाना, जो नहाना अभी भी गांव में तालाब में ठंडे पानी से नहाना, साबून को लकड़ी में फंसाना यह सब गांव में अभी भी दिखाई देता है. एक साड़ी है तो आधी पहनकर नहाना और बाकी साड़ी को धोना यहां के लोग बहुत ही साफ रहना और मन की सरलता को बनाए रखना यहां के लोगों में है।