खिला' नया कमल : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नडडा की नई टीम से छत्तीसगढ़ की राजनीति क्या करवट लेगी, इसका विश्लेषण कर रहे हैं संपादक अनिल द्विवेदी

खिला' नया कमल : भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नडडा की नई टीम से छत्तीसगढ़ की राजनीति क्या करवट लेगी, इसका विश्लेषण कर रहे हैं संपादक अनिल द्विवेदी

राज्यसभा सांसद डॉ.सरोज पाण्डे—जिन्हें राष्ट्रीय महासचिव पद से हटा दिया गया है—ने गुजरे दिनों मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राखी भेजते हुए पत्र लिखा था और उस पर कांग्रेस जिस कदर हमलावर हुई थी तब मैंने दिल्ली के एक वरिष्ठ भाजपा नेता से पूछा था कि क्या सरोज पाण्डे को बघेल सरकार से लड़ने की कमान सौंपी गई है तो उन्होंने ठहाका लगाते हुए इशारों ही इशारों में कहा था कि कमान सौंपी नही है, ले ली गई है! इस पर मुझे गहरा आश्चर्य हुआ था लेकिन आज घोषित हुई भारतीय जनता पार्टी की अखिल भारतीय टीम से सरोज पाण्डे की अप्रत्याशित रवानगी का भवितार्थ समझ में आ गया!

जब बारिश को इंच या सेंटीमीटर में नापे जाने के बजाय, इस बात से नापा जाने लगे कि गली में पानी भरा है या नहीं, उसे राजनीति कहते हैं. भाजपा की नई टीम को इसी सांचे में ढालकर देखिए. महाराष्ट्र की प्रभारी रहते हुए तथा पश्चिम बंगाल और हरियाणा के सफल दौरों ने पार्टी को जिस तरह वहां मजबूती से खड़ा किया, वह सरोज पाण्डे की मेहनत और रणनीति की बदौलत ही संभव हो सका. पार्टी महासचिव रहते हुए भी वे उजली और अविवादित बनी रहीं. दरअसल उन्हें दो कार्यकाल मिला और तीसरा देने का​ नियम नही है इसलिए उन्हें हटाया गया. पर उनकी पारी खत्म हुई, यह समझ लेना भयंकर भूल होगी. इस भाजपा—नेत्री को हालात जितना नेपथ्य में धकेलता है, पर वह हमेशा पुरजोर वापसी कर दिखाती हैं. लुटियन दिल्ली में हवागर्म है कि अगले मं​त्रिमंडल विस्तार की सूची में सरोज का नाम है!

पुरानी कहावत है, आगत का आभास अतीत से मिलता है. संकेत मिल रहे थे कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह का कद छोटा किया जा सकता है लेकिन नही, वे और ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरे हैं. उनका राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद बरकरार रहा है. दूसरी ओर राष्ट्रीय सह—संगठनमंत्री सौदान सिंह भी अपने इस पद पर बने रहेंगे. जबकि पार्टी में इन दोनों नामों पर दबे—छुपे भारी विरोध होता रहा है. सोशल मीडिया तक में हल्ला मचता रहा कि पार्टी इनके कब्जे में है. फिर बघेल सरकार ने जिस तरह डॉ.रमनसिंह और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ भ्रष्टाचार की मुहिम चलाई थी, उससे नईदिल्ली तक में संदेश ठीक नही गया था. विरोधी खेमे का दिलचस्प दिमाग काम कर रहा था कि यहां का मैदान खाली करके रमनसिंह दिल्ली कूच कर सकते हैं, अफसोस ऐसे लोग हाथ मलते रह गए. चक्रवृद्धि ब्याज केंद्रित बात यह है कि फिलहाल पार्टी का भाग्य डॉ.रमनसिंह ही तय करेंगे.

कांग्रेस और भाजपा में एक लोकतांत्रिक शराफत यह है कि दोनों ही दल मीडिया और मंतव्यों की गढ़ी हुई छबि के झांसे में नहीं आते. पार्टी जिसे उपयोगी समझती है, टीम में रखती है. राज्य में 15 साल तक संगठन के भाग्य.विधाता रहे राष्ट्रीय सह—संगठनमंत्री सौदान सिंह ने भी पार्टी का भरोसा नही खोया है. इसकी मजबूत वजह यह है कि वे प्रदेश में संगठन की नस—नस से वाकिफ हैं. सौदान सिंह के भरोसे ही चाउर वाले बाबा ने 15 साल तक संगठन को अपनी मुटठी में दबोचे रखा और विरोधियों को साधे रखा. इसीलिए हिन्दी पटटी के राज्यों के लिए सौदान सिंह पार्टी की तरफ से मजबूरी बन गए हैं.

मोदी—शाह के नेतृत्व में चल रही भाजपा के अंदर एक नारा खासा प्र​चलित है : जो करेगा, वो टिकेगा यानि कि चेहरा दिखाने वाले लोगों के दिन अब लद गए. यही वजह रही कि राज्यसभा सांसद रामविचार नेताम को एसटी मोर्चा के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. दरअसल अपने कार्यकाल के दौरान वे कुछ नया विजन पेश नही कर सके उलटा उनके एसटी बाहुल्य गृहराज्य छत्तीसगढ़ में पार्टी आदिवासियों का जनाधार खो बैठी. राजनीति में जब सपने, जागरूकता और क्षमता के दिए आश्वासन पूरे नही होते तो आपको जहर और जौहर में से एक चुनना पड़ता है. छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे, डॉ.अनिल जैन की राष्ट्रीय महासचिव पद से विदाई हो गई. अक्लमंद अटकलें यह हैं कि जैन के प्रभारी रहते हुए पार्टी ने बहुत कुछ खोया. विधानसभा, फिर नगरीय निकाय, फिर पंचायत चुनावों में पार्टी बैठती ही चली गई. लोकसभा में तो मोदी का तिलिस्म चला इसलिए नाक बच गई. फिर पार्टी के शांतिवादियों का आरोप है कि जैन साहब हवा—हवाई हो गए थे. उनका सारा दर्शन आसमानी रहता था. बड़े नेताओं से मिलते और निकल जाते. छोटे कार्यकर्ता के साथ तो वे संथारा' ही करते रहे. कार्यकर्ता मजाक में उन्हें बिना रीढ़ का नेता कहने लगे थे. जाहिर है यह रिपोर्ट उपर तक पहुंची और जैन नप गए.

भाजपा के सत्ता-सदन में चर्चा थी कि जिम्मेदारी ‘एडजस्टमेंट’ से कहीं अधिक गुरुतर है सो राष्ट्रीय प्रवक्ताओं की टीम में संजय मयूख को शामिल किया गया है. वे बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं और पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी भी रहे. अमित शाह के विश्वासपात्र भी हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान यहां के प्रभारी थे. मयूख के वाक.कौशल की परीक्षा अब होनी है. नई जिम्मेदारी ने उनके सिर पर फूलों की जगह कांटों भरा ताज रखा है. लोगों की निगाहें अभी से उनके ऊपर लगी हैं कि वह इन शूलों को फूलों में कैसे तब्दील करते हैं?


( अनिल द्विवेदी : लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के संपादक हैं )