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हिंदी को अधिक से अधिक अपने जीवन से जोड़े: मंगलेश डबराल

हिंदी को अधिक से अधिक अपने जीवन से जोड़े: मंगलेश डबराल

 जितेश्वरी

रायपुर। पहाड़ पर लालटेन ( 1981 ) से अपनी काव्य यात्रा की शुरूआत करने वाले साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित मंगलेश डबराल समकालीन हिंदी कविता के एक विशिष्ट हस्ताक्षर हैं। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर में हिंदी दिवस समारोह में 'वैश्विक समय एवं हिंदी पत्रकारिता विषय पर बोलते हुए मंगलेश डबराल ने कहा हिंदी राजभाषा और हिंदी साहित्य में उतना ही फर्क है जितना फेसबुक मित्रों और निजी जिंदगी के मित्रों में। हिंदी पट्टी मूल रूप से निर्धन है बाकि अन्य भाषा बोलने वालों के पास साधन बहुत है, जैसे आप दक्षिण भारत को ही देख लें। सभा में उपस्थित प्राध्यापको और छात्रों से मंगलेश डबराल ने हिंदी को अधिक से अधिक अपने जीवन में जोडऩे भी कहा।

आज हिंदी पत्रकारिता के खराब होते स्तर पर बोलते हुए आगे मंगलेश डबराल ने कहा कि वर्तमान पत्रकारिता का दुर्भाग्य यह है कि उसने अपने को साहित्य से अलग कर लिया है। आज पत्रकारिता की भाषा बहुत अच्छी नहीं है। एक पत्रकार को दुनिया कीहर चीजों से वाकिफ  होना चाहिए। आज गुगल सर्च इंजन का जमाना हो चला है लोग पत्रकार का मतलब बड़े लोगों से सम्बंध अर्थात सरकार के लोगों से कहां तक किसका संबंध है इस पर ज्यादा फोकस करते है।

आगे मंगलेश डबराल हिटलर को उध्दृत किया और कहा कि जिस तरह हिटलर एक झूठ को सौ बार दोहरा कर सच में बदल देने का कार्य करते थे। जिस तरह ट्रंप ने मीडिया का गलत इस्तेमाल कर चुनाव जीता था हुबहू वैसे ही आज हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने भी चुनाव जीत लिया। कुछ चंद मीडिया चैनलों की मदद से और देश के लोकसभा चुनाव में पहली बार बहुत ही खराब भाषा का इस्तेमाल किया गया।

हिंदी पत्रकारिता पर बोलने के पश्चात् मंगलेश डबराल ने अपने उद्बोधन को समाप्त किया और अपनी प्रसिद्ध कविता 'सुबह की नींद  सहित अन्य कविताओं का पाठ किया। कविता की कुछ पंक्तियां इस तरह से है-

'सुबह की नीन्द अच्छे-अच्छों को सुला देती है

अनिद्रा के शिकार लोग एक झपकी लेते है

और कयामत उन्हें छुए बगैर गुजर जाती है

सुबह की नीन्द का स्वाद नहीं जानते,

अत्याचारी-अन्यायी लोग

वे कहते हैं- हम ब्रम्ह मुहूर्त में उठ जाते हैं,

कसरत करते हैं। देखो, छप्पन इंच का हमारा सीना,

फिर हम देर तक पूजा-अर्चना में बैठते हैं,

इसी बीच तय कर लेते है

कि क्या-क्या काम निपटाने हैं आजÓ

रंगकर्म से जुड़े साहित्यकार सुभाष मिश्र भी कार्यक्रम में शामिल हुए और अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि मीडिया एक जिम्मेदारी का पेशा है। जो कमतर लोग है वह आगे बढ़ जाते है ओर जो काबिल है वह पीछे रह जाते है। दोयम दर्जे के लोगों को सभी तरह के सम्मान और पुरस्कार दिए जाते है पर विनोद कुमार शुक्ल जैसे बड़े कवि सम्मान और पुरस्कार से वंचित रह जाते है। सुभाष मिश्र ने आगे यह भी कहा कि हिंदी पढ़ाने वाले हिंदी रोटी की खाते है और हिंदी के एक भी कार्यक्रम में शामिल होने तक नहीं आते है।

विश्वविद्यालय की ओर से कुलसचिव आनंद बहादुर ने मंगलेश डबराल का शाल श्रीफल से स्वागत किया और अपनी दो गजले भी सुनायी। कार्यक्रम का संचालन किया डॉ. नृपेन्द्र शर्मा ने। इस अवसर पर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित की गई कविता प्रतियोगिता में प्रथम और द्वितीय स्थान पर आए प्रतियोगी द्वारा अपनी पुरस्कृत कविता का पाठ किया गया। अतिथियों द्वारा विश्वविद्यालय की ओर से कविता प्रतियोगिता में शामिल सभी छात्र-छात्राओं को पुरस्कार की रूप में वरिष्ठ साहित्यकारों की किताबें भेंट की गई।