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रवीश कुमार ने रेमन मैग्सेसे लेक्चर में क्या कुछ कहा

रवीश कुमार ने रेमन मैग्सेसे लेक्चर में क्या कुछ कहा

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को साल 2019 का प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे सम्मान दिये जाने की घोषणा तो लगभग एक महीने पहले ही हो गई थी लेकिन मनीला में शुक्रवार को उन्होंने सम्मान लेने से पहले अपना पब्लिक लेक्चर दिया.

इस लेक्चर में उन्होंने भारतीय मीडिया की मौजूदा विसंगतियों पर खुलकर अपनी बात रखी.

रवीश कुमार को 9 सितंबर को रेमन मैग्सेसे सम्मान दिया जाएगा. भारतीय समयानुसार दोपहर दो बजे उन्हें यह सम्मान दिया जाएगा.

रवीश कुमार ने अपने संबोधन में लोकतंत्र को बेहतर बनाने में सिटिज़न जर्नलिज़्म की ताकत विषय पर अपनी बात रखी. रवीश कुमार ने कहा कि लोकतंत्र जल रहा है और उसे अब संभालने की ज़रूरत है और इसके लिए साहस की ज़रूरत है. ज़रूरत है कि हम जो सूचना दें वो सही हो. यह किसी नेता की तेज़ आवाज़ से बेहतर नहीं हो सकता है.

उन्होंने कहा कि हम अपने दर्शकों को जितनी सही जानकारी देंगे उनका भरोसा उतना ही अधिक बढ़ेगा. उन्होंने अपने संबोधन में फ़ेक न्यूज़ का भी ज़िक्र किया.

उन्होंने पत्रकारिता के मौजूदा हालात पर बात करते हुए कहा, हर रोज़, सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन होते हैं लेकिन मुख्य धारा की मीडिया के पास एक स्क्रीनिंग पैटर्न है, जिसमें वो इन विरोध प्रदर्शनों को नहीं दिखाता है.


इन विरोध प्रदर्शन की कोई रिपोर्ट नहीं करता है, क्योंकि मीडिया के लिए वो एक बेकार की गतिविधि है. पर ये समझना होगा कि सार्वजनिक प्रदर्शनों के बिना कोई भी लोकतंत्र, लोकतंत्र नहीं हो सकता है.

रवीश कुमार के लेक्चर की ख़ास बातें-

यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है. नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है. एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से ख़ुद को बचा लेगा वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा.

नागरिकता के लिए ज़रूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो. आज स्टेट का मीडिया और उसके बिज़नेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है. मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना. मीडिया अब सर्वेलान्स स्टेट का पार्ट है. वह अब फोर्थ स्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट स्टेट है.

मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं - एक, नेशनल और दूसरा, एन्टी-नेशनल. एन्टी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है.

कश्मीर में कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया. सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे हैं और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए. क्या आप बग़ैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटिज़न की कल्पना कर सकते हैं...? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे, और वह उस सिटिज़न के खिलाफ हो जाए.

यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं. पाकिस्तान में तो एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज़ चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है. कैसे रिपोर्टिंग करनी है. इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है.

उन्हें बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें. जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है.

जब 'कश्मीर टाइम्स' की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है. यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है. मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए.

गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की.

यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए 'सिटिज़न जर्नलिज़्म' को गढ़ना शुरू किया था. इसके ज़रिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया. मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटिज़न जर्नलिज़्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटिज़न जर्नलिज़्म दोनों अलग चीज़ें हैं.

आज भी कई सारे न्यूज़रूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है. यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में 'Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq' शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के ज़रिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते. यह सिटिजन ज़र्नलिज़्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ.

आज कोई लड़की कश्मीर में 'बगदाद बर्निंग' की तरह ब्लॉग लिख दे, तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एन्टी-नेशनल बताने लगेगा.

अगर आप इस मीडिया के ज़रिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है. यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है. एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके.

जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है. दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज़ चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है. एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है.

मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज़्यादतर हिस्सा गटर हो गया है.

देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए. गालियां आईं, धमकियां भी आईं. आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए. अपनी और इलाके की ख़बरों को लेकर.

जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे. उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया.

उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में ख़ुद लिखकर मुझसे माफ़ी मांगी.

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटिज़न जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटिज़न से भी जूझना होगा. चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं.

जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पायी है.

गांधी ने कहा था कि यदि अख़बार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आज़ादी किस काम की. आज अख़बार डर गए हैं. वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं.

आज बड़े पैमाने पर सिटिज़न जर्नलिस्ट की ज़रूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूत है सिटिज़न डेमोक्रेटिक की.

लेक्चर के बाद सवाल-जवाब का दौर भी हुआ.

जिसमें दर्शक दीर्घा में बैठे एक शख़्स ने रवीश से सवाल किया कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों को क्या सुझाव देना चाहेंगे?

इसके जवाब में रवीश कुमार ने कहा, "उनके लिए कोई सुझाव नहीं, क्योंकि वे सुझावों से परे हैं."

रवीश ने कहा, 'दरअसल पूरी तरह दोष उनका नहीं है, वे हर रात जो न्यूज़ चैनल देख रहे हैं, उनमें 90 फ़ीसदी एक ही आवाज़ में बात कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे पत्रकारिता कर रहे हैं लेकिन वे नहीं जानते कि चीजों को मैन्युप्युलेट किया जा रहा है. हमें ये नहीं कहना चाहिए कि उनके पास दिमाग नहीं है, उनके पास दिमाग है लेकिन उनके पास सही जानकारी नहीं है. अगर ये 90 चैनल सही जानकारी देने लगेंगे तो लोग सच्चाई जानने की कोशिश करेंगे.'

एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को यह सम्मान हिंदी टीवी पत्रकारिता में उनके योगदान के लिए मिला है. रेमन मैग्सेस सम्मान को एशिया का नोबल पुरस्कार भी कहा जाता है.

रवीश कुमार हिन्दी समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया का सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं. रवीश के अलावा 2019 का मैग्सेसे अवॉर्ड म्यांमार के को स्वे विन, थाईलैंड के अंगखाना नीलापाइजित, फ़िलीपीन्स के रेमुन्डो पुजांते और दक्षिण कोरिया के किम जोंग-की को भी मिला है. (बीबीसी)