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चंद्रमा पर रहता कोई नहीं, पर कूड़ा-कचरा 190 टन!

 चंद्रमा पर रहता कोई नहीं, पर कूड़ा-कचरा 190 टन!

राम यादव

अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पर अपने पैर रखने वाले पहले धरतीवासी थे. वह 21 जुलाई 1969 का दिन था. भारतीय समय के अनुसार सुबह आठ बजकर 26 मिनट हुए थे. हममें से ज्यादातर ने यही पढ़ा-सुना होगा कि अंतरिक्षयान ‘कोलंबिया’ से अलग होकर जो अवतरण यान ‘ईगल’ चंद्रमा पर उतरा था उससे आर्मस्ट्रांग ही सबसे पहले बाहर निकले थे. यह नहीं कि अपने पैर चंद्रमा की मिट्टी पर रखने से पहले आर्मस्ट्रांग ने गांठ मारकर बंद की हुई प्लास्टिक की एक थैली चंद्रमा पर फेंकी थी.

यह थैली आर्मस्ट्रांग के सहयात्री बज़ एल्ड्रिन ने उन्हें तब पकड़ाई थी, जब वे ‘ईगल’ से नीचे उतरने की सीढ़ी पर खड़े थे. थैली में दोनों का मल-मूत्र और उड़ान के दौरान की खाने-पीने की सामग्रियों आदि का कचरा था. यह ऐसा पहला कचरा था, जिसे किसी मनुष्य ने अपने हाथ से चंद्रमा पर फेंका था. यह संभवतः आज भी वहां ज्यों का त्यों पड़ा है.

ऐसा नहीं था कि आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन से, चंद्रमा पर पैर रखने से पहले, उसे गंदा करने के लिए कहा गया था. यह एक अनिवार्यता थी. चंद्रमा पर अपने विचरण के बाद ईगल में ही बैठकर दोनों को ‘कोलंबिया’ के पास वापस जाना था. और चंद्रमा के आकाश में उसकी परिक्रमा कर रहे कोलंबिया’ को उन्हें पृथ्वी पर वापस ले आना था.

‘ईगल’ में जगह की बहुत तंगी थी और ईंधन भी बहुत नपा-तुला था. कचरा फेंककर उसका भार हल्का करने से थोड़ा ईंधन बच सकता था और कुछ जगह भी ख़ाली हो जाती. इसलिए चंद्रमा को ग़ंदा करने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था. चंद्रमा पर पहुंचने की 50वीं वर्षगांठ से कुछ ही पहले, बज़ एल्ड्रिन ने अपने एक ट्वीट में लिखा, ‘जिस किसी को मेरी वह थैली कभी मिले, उसके प्रति मैं खेद प्रकट करता हूं.’ आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन के बाद अमेरिका की ओर से पांच और चंद्र-अभियान हुए. 10 और चंद्रयात्रियों ने वहां विचरण किया. 1972 तक चले इन अभियानों के दौरान सबने वहां कुछ न कुछ सामग्री एवं कचरा भी पीछे छोड़ा.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ का अनुमान है कि चंद्रमा पर भले ही कोई नहीं रहता, पर वहां 190 टन मनुष्य-निर्मित कचरा यहां-वहां बिखरा पड़ा है. ‘नासा’ की एक सूची के अनुसार, अकेले उस क्षेत्र में, जहां अमेरिका के दोनों प्रथम चंद्रयात्री 21 जुलाई 1969 के दिन उतरे थे, 50 से अधिक चीज़ें बिखरी पड़ी हैं - अतिरिक्त लेंसों के साथ एक टीवी कैमरा, कई पाइप और ढक्कन, एक सुरक्षा कमरपट्टी, एक रिमोट कंट्रोल, एक हथौड़ी और कॉम्बिनेशन प्लायर (पकड़/ चिमटे) जैसे कई औज़ार.

चंद्रमा पर क्योंकि न तो हवा है और न बरसात होती है, इसलिए सब कुछ सड़े-गले बिना आज भी वैसा ही पड़ा होना चाहिये, जैसा पहले दिन से था. भावी चंद्रयात्रियों को यदि उनके रूप-रंग में कोई परिवर्तन मिलता है, तो वह दिन में तेज़ धूप, दिन और रात के तापमानों में 290 डिग्री सेल्सियस तक के अंतरों और सूर्य से आ रहे रेडियोधर्मी विकिरण का ही परिणाम हो सकता है.

चंद्रमा पर पड़े कचरे का अध्ययन वैज्ञानिक शोध का नया विषय भी बन सकता है. जर्मनी में बर्लिन की एक फ़र्म दूरनियंत्रित रोबोट भेजकर ऐसी ही किसी जगह की जांच-परख करना चाहती है, जहां अमेरिका के चंद्रयात्री कुछ छोड़ आये हैं. उसका कहना है कि इन चीज़ों के साथ कोई छेड-छाड़ नहीं की जायेगी. ये चंद्रमा पर मनुष्य के पहुंचने के ऐतिहासिक स्मारकों जैसी धरोहर हैं.

रद्दी या कचरा बन गयी इन चीज़ों के चंद्रमा पर पहुंचने, वहां छोड़ देने या फेंक दिये जाने की शुरुआत नील आर्मस्ट्रांग के थैली फैकने से करीब 10 साल पहले 13 सितंबर 1959 को हुई थी. उस दिन तत्कालीन सोवियत संघ का चंद्रमा तक पहुंचने वाला पहला चंद्रयान ‘लूना2’ उससे टकराकर ध्वस्त हो गया था. ‘लूना2’ एक ही दिन पहले, 12 सितंबर 1959 को, प्रक्षेपित किया गया था. मात्र एक दिन 14 घंटे और 22 मिनट की उड़ान के बाद वह चंद्रमा के पास पहुंचते ही उससे टकरा गया. उसके सारे टुकड़े चंद्रमा पर मनुष्य-निर्मित पहला कचरा बने.

बाद में सोवियत संघ के ही कुछ और ‘लूना’ चंद्रयान वहां पहुंचे. 1966 में पहुंचा ‘लूना9’ ऐसा पहला यान था, जो बिना टूटे-फूटे चंद्रमा की सतह पर उतर पाया. उसने वहां के कुछ फ़ोटो भी पृथ्वी पर भेजे. लेकिन तीन ही दिन बाद उसकी बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो गयी और वह भी कूड़े में तब्दील हो गया.

समय के साथ अमेरिका, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘ईएसए’, चीन, जापान और भारत ने भी अपने यान चंद्रमा पर भेजे. कुछ सफलतापूर्वक वहां उतरे, कुछ उससे टकराकर ध्वस्त हो गये. जो सफलतापूर्वक उतरे, उनका जीवनकाल बाद में समाप्त हो गया. वे भी अब रद्दी या कूड़े की ही तरह यहां-वहां पड़े हुए हैं. अब तक 30 से अधिक यान चंद्रमा पर उतरे हैं या उससे टकराकर नष्ट हो चुके हैं. सितंबर 2019 शुरू होने तक चंद्रमा पर पहुंचने के बाद उससे टकराकर नष्ट हो जाने वाला अंतिम यान ‘बेरेशीत’ था.

चंद्रमा पर हमने सिर्फ कचरा ही नहीं छोड़ा है

‘बेरेशीत’ मोरिस कान नाम के एक इसराइली अरबपति का निजी अभियान था. इसे अमेरिका के केप कैनेवरल से 22 फ़रवरी 2019 को प्रक्षेपित किया गया था. 11 अप्रॆल 2019 को चंद्रमा पर गिरकर उसका अंत हो गया. बात इतनी ही होती, तो यहीं समाप्त हो जाती. चंद्रमा पर हुई यह ऐसी पहली दुर्घटना है, जिससे पहली बार, ऐसे हज़ारों सूक्ष्म कीड़े चंद्रमा पर पहुंचकर बिखर गये, जो इतने जीवट के हैं कि बिना हवा, पानी और भोजन के लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं. उनका जीववैज्ञानिक नाम ‘फ़ाइलम टार्डिग्राडा’ है. अंग्रेज़ी में उन्हें ‘वाटर बेअर’ कहा जाता है.

एक मिलीमीटर से भी छोटे व आठ पैरों वाले इन जीवों के बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि घोर सर्दी हो या गर्मी, हवा और आहार मिले या न मिले, वे कई-कई दशकों तक जीवित रह सकते हैं. यहां तक कि रेडियोधर्मी विकिरण भी उनका बाल बांका नहीं कर पाता. वैसे तो ये पानी या नमी वाली जगह पसंद करते हैं, पर पानी या नमी नहीं होने पर वे अपने भीतर की तरलता त्यागते हुए अपने आपको सुखाकर इस तरह निर्जीव-से बन जाते हैं कि वर्षों बाद जब भी नमी मिले, पुनर्जीवित हो सकते हैं.

आशंका यही है कि चंद्रमा पर पहुंच गये ‘वाटर बेअर’ वहां की घोर गर्मी और सर्दी ही नहीं, सौर एवं ब्रह्माडीय विकिरण को भी लंबे समय तक झेलकर जीवित रह सकते हैं. यदि बाद के चंद्रयात्रियों को वे जीवित मिले, तो इसका अर्थ यही होगा कि मनुष्य ने जीवनहीन चंद्रमा पर कूड़ा-करकट ही नहीं, जीवन भी पहुंचा दिया है. अब तक ऐसी हरसंभव सावधानी बरती जाती रही है कि धरती से च्रंद्रमा पर कोई बैक्टीरिया आदि न पहुंचे.

अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों ने चंद्रमा पर कुछ ऐसी चीज़ें भी छोड़ी हैं, जिन्हें कचरा कहना उचित नहीं होगा. उदाहरण के लिए, अपोलो11 के नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन ने वहां अमेरिका का राष्ट्रीय झंडा गाड़ा. मैत्रीभाव के प्रतीक के तौर पर जैतून (ओलिव) के पेड़ की एक स्वर्णिम टहनी और पृथ्वी वासियों की ओर से सद्भावना-संदेश की एक फ्लॉपी डिस्क भी वहां रखी.

दोनों ने जर्मनी में विशेष प्रकार के कांच का बना एक ऐसा दर्पण (रिफ्लेक्टर) भी वहां रखा, जो पृथ्वी से भेजी गयी लेज़र किरणों को परावर्तित करता है. उसकी सहायता से पहली बार पृथ्वी से चंद्रमा की सबसे सटीक दूरी नापी गयी. ‘ल्यूनर लेज़र रैंजिंग एक्स्पेरिमेंन्ट’ (एलएलआर) कहलाने वाले इस प्रयोग के लिए बाद में कुछ और दर्पण भी चंद्रमा पर रखे गये. उनका आज भी यह जानने के लिए उपयोग होता है कि चंद्रमा और पृथ्वी के बीच की दूरी किस गति से बढ़ रही है. इस समय चंद्रमा हमारी पृथ्वी से प्रतिवर्ष 3.8 सेंटीमीटर दूर हट रहा है. पृथ्वी से उसकी औसत दूरी इस समय 3,84, 400 किलोमीटर है.

1971 में वहां गये एलन शेपर्ड ने गोल्फ़ की कुछ गेंदों को यह देखने के लिए शॉट लगाये कि क्या वे चंद्रमा पर प़थ्वी की अपेक्षा कितनी दूर तक जाती हैं? चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के छठे हिस्से के ही बराबर है. गोल्फ की गेंदें वहां सचमुच काफी दूर जाकर गिरीं और अब भी वहीं पड़ी हुई हैं. चंद्रमा पर पहुंचने वाले दसवें अमेरिकी, चार्ल्स ड्यूक ने, वहां अपने परिवार का एक फ़ोटो छोड़ा. अपोलो15 के चंद्रयात्री जेम्स अर्विन ईसाई धर्मग्रंथ बाइबल की एक प्रति, बाज़ पक्षी का एक पंख और 100 बैंक नोट भी वहां छोड़ आये.

चंद्रमा पर जो सबसे भारी वस्तुएं पड़ी हुई हैं, उनमें अमेरिका के अपोलो अभियान वाले पांच रॉकेटों के सबसे ऊपरी हिस्से, उड़नखटोले-जैसे अवतरण यानों के पैरों वाले छह निचले हिस्से और बैटरी-चालित चार पहियों वाले वे तीन रोवर (मोटर वाहन) गिने जाते हैं, जिन पर बैठकर अंतिम अपोलो मिशनों के चंद्रयात्री वहां घूमे-फिरे थे. चंद्रमा की परिक्रमा करते हुए वहां गिर चुके चार अलग-अलग परिक्रमा-यान, चीनी रेडियो-रिले उपग्रह लोंगज्यांग-2 और इस वर्ष उस हिस्से पर पहली बार सुरक्षित उतर पाया चीनी अन्वेषणयान चांग’ए-4 भी इस गिनती में शामिल हैं. ये सब चंद्रमा के उस पृष्ठभाग पर पड़े हुए हैं जो पृथ्वी पर से कभी दिखायी नहीं पड़ता.

इस समय चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा भारत का चंद्रयान-2 भी, अपने जीवनकाल के अंत में, कभी न कभी उस पर गिरकर ध्वस्त हो जायेगा. तब वह भी चांद पर निरंतर बढ़ रहे कचरे का एक हिस्सा बन जायेगा. बीती रात उसके लैंडर व्हीकल - विक्रम - का संपर्क कमांड सेंटर से तब टूट गया जब वह चांद की सतह से सिर्फ दो किलोमीटर दूर था. अगर जल्दी ही यह संपर्क नहीं जुड़ा तो वह भी चांद पर मौजूद अनुपयोगी चीजों में शामिल हो जाएगा.

चंद्रमा धरती का ही एक हिस्सा है जिसे फिर से अपना बनाने की होड़ लगी हुई है

हमारे पूरे सौरमंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिस पर विविध प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे मिलते हैं. पूरे सौरमंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह भी है, जिसके पास केवल एक उपग्रह है–चंद्रमा. सौरमंडल के अन्य ग्रहों के पास कुल मिलाकर लगभग 170 उपग्रह हैं. आकार की दृष्टि से संभवतः कोई दूसरा उपग्रह अपने ग्रह के सापेक्ष उतना बड़ा नहीं है, जितना चंद्रमा है. हमारी पृथ्वी का व्यास (डाइमीटर) 12,700 किलोमीटर हैं, जबकि हमारे चंद्रमा का व्यास 3,476 किलोमीटर है. यानी आकार में पृथ्वी उससे केवल चार गुना बड़ी है. चंद्रमा 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है और इतने ही समय में अपने अक्ष (एक्सिस/ धुरी) पर भी एक बार घूम जाता है. परिक्रमाकाल और अक्ष पर घूर्णनकाल एक समान होने के कारण ही पृथ्वी पर से हमें उसका हमेशा केवल एक ही अर्धभाग दिखायी पड़ता है.

चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के हालांकि छठें हिस्से के बराबर है. इसका मतलब यह कि जो चीज़ पृथ्वी पर छह किलो भारी है, वह चंद्रमा पर एक किलो ही रह जाती है. तब भी चंद्रमा हमारे सागरों-महासागरों के पानी को औसतन एक मीटर तक ऊपर उठाते और नीचे गिराते हुए ज्वार-भाटा (हाई ऐन्ड लो टाइड) पैदा करता है. हमारा सूर्य भी ज्वार-भाटा पैदा करता है, किंतु पृथ्वी से बहुत दूर होने के कारण उसकी शक्ति चंद्रमा की तुलना में आधा प्रभाव ही डाल पाती है.

समझा जाता है कि चंद्रमा कोई कोई साढ़े चार अरब वर्ष पू्र्व मंगल ग्रह जितने बड़े किसी आकाशीय पिंड के पृथ्वी से टकराने से बना था. इस टक्कर से पृथ्वी के एक हिस्सा टूट कर अलग हो गया जो समय के साथ चंद्रमा बन गया. इसी कारण दोनों की संरचना में कई समानताएं मिलती हैं.

पृथ्वी से भिन्न चंद्रमा के पास न तो अपना कोई वायुमंडल है और न ही चुंबकीय बलक्षेत्र. इस कारण जीव-जंतुओं के लिए प्राणघातक ब्रह्मांडीय विकिरण की बौछार वहां निरंतर चलती रहती है. दिन में जब सूर्य लंबवत ऊपर होता है, तब यहां का तापमान 130 डिग्री सेल्सियस तक चढ जाता है. रात में वह शून्य से 160 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है. यानी, कुछ ही घंटों में तापमान 290 डिग्री तक ऊपर-नीचे हो जाता है. स्मरण रहे कि पृथ्वी पर पानी 100 डिग्री के आस-पास खौलने लगता है और शून्य डिग्री पर जमकर बर्फ बन जाता है.

इन सारी सम्स्याओं के होते हुए भी चंद्रमा पर बस्तियां बसाने और उसे मंगल ग्रह की उड़ान का अड्डा बनाने के विचार से चंद्रमा के प्रति दिलचस्पी एक बार फिर बढ़ गयी है. उसकी कम गुरुत्वाकर्षण शक्ति इस नयी दिलचस्पी का मुख्य कारण है. वहां से मंगल ग्रह की यात्रा के लिए उतने बड़े-बड़े रॉकेटों और उतने अधिक ईंधन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, जितनी पृथ्वी पर से सीधे मंगल तक की उड़ान के लिए पड़ेगी.

जब से पता चला है कि चंद्रमा पर भी पानी है, कई दुर्लभ धातुएं हैं और हाइड्रोजन के ऐसे आइसोटोप (समस्थानिक) भी हैं, जो परमाणु-ईंधन का काम कर सकते हैं, तब से चंद्रमा पर पहुंचने की एक नयी होड़-सी लगती दिख रही है. स्वाभाविक है कि भारत भी इस दौड़ का मूक दर्शक नहीं रह सकता. उसके चंद्र अभियानों की उपयोगिता को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिये.