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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः महाकाव्य की राख

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः महाकाव्य की राख


चिता जल रही महाकाव्य की

रचा-बसा था जिसमें जीवन

बहुरंगी पुरुषार्थ कथाएँ

बहुअर्थी परमार्थ व्यथाएँ

कौन ले गया

इसके शव को श्मशान तक


महाकाव्य का अग्निदाह

जल रहे शब्द

बसे हुए अर्थों में जलते

नव रस से उठती विकल भाप

जलते महाकाव्य की देह-गंध

छा रही शेष जीवन पर

धुएँ में डूब रहे सब छंद

चिंगारी बन होते विलीन

भाषा की लय में बसे भाव

आग में चटक रहे वाक्यों से

बिखर रहे सब अलंकार

ख़ाक हो रही सब उपमाएँ


महाकाव्य की राख

कौन जाने कब होगी ठण्डी

फिर होगा इसी राख से

जन्म किसी कवि का

फिर होंगे शब्द प्रकाशित 

दर्शन होगा जीवन छवि का