अशोक वाजपेयी के अवदान पर चर्चा अस्सीवें वर्ष पर उपस्थिति शृंखला

अशोक वाजपेयी के अवदान पर चर्चा अस्सीवें वर्ष पर उपस्थिति शृंखला

एक नौकरशाह से ज्यादा एक सांस्कृति कर्मि  , कवि , साहित्यकार आलोचक और सांस्कृतिक चेतना सम्पन्न व्यक्ति के रुप में विख्यात अशोक वाजपेयी अस्सी बरस के होने जा रहे हैं। अशोक वाजपेयी ने  हिंदी के साहित्यिक और जनवृत्त में अपनी उपस्थिति के तकरीबन छः दशक पूरे कर लिए हैं।इन छः दशकों की यह यात्रा साहित्य,कला और संस्कृति कर्म की अपनी उपलब्धियों के नाते हिंदी साहित्य के अध्येताओं और समाज के लिए अत्यंत महत्वूर्ण है। 

भोपाल को देश की सांस्कृति राजधानी बनाने की बात हो या भारत भवन जैसा कला केन्द्र सभी में अशोक वाजपेयी की अग्रणी भूमिका रही है । अपनी नई सोच , अपने काम और अपने फैसलों से हमेशा चर्चा में रहे अशोक जी ने साहित्य,कला की जरूरी और महत्वपूर्ण बहसों में भाग लिया है और अपनी हस्तक्षेपकारी उपस्थिति दर्ज की है।

जहां कहीं भी सत्ता प्रतिष्ठानों , सांप्रादायिक , फास्सिस्टवादी  ताकतों के खिलाफ बोलने की बात आई अशोक वाजपेयी हमेशा मुखर दिखे । आज भी रजा फाऊडेशन जैसी संस्था के जरिये देश भर में महत्वपूर्णसाहित्यिक सांस्कृतिक  आयोजन उनकी उपस्थिति में हो रहे हैं ।वे लगातार  हिंदी के लेखक और बुद्धिजीवी के रूप में अपनी विस्तृत भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं ।

अशोक वाजपेयी की जीवनयात्रा का यह  80 वां वर्ष है। हमारे प्रिय लेखकों-कवियों के जीवन के ऐसे अवसर ठहरकर अपने कवियों-लेखकों और उनकी रचनात्मकता के सम्बन्ध में संवाद और पाठ करने का सुअवसर देते है। इस बहाने हम अपने सरोकारों,विश्वासों और रुचियों का भी एक साझा पक्ष प्रस्तुत करते हैं। 90 के बाद की बदलती हुई परिस्थितियों में जनसरोकारों और उस परिप्रेक्ष्य में जनसरोकारी बुद्धिजिवियों की ज़रूरत निश्चित तौर पर बढ़ती गयी है। 90 के बाद का समय तेजी से बदलता गया है और उसने लेखकों बुद्धिजिवियों के सामने निरन्तर नई चुनौतियां पेश की हैं।इस सम्पूर्ण के परिप्रेक्ष्य में अशोक जी की उपस्थिति और उनके सरोकारों ने इन चुनौतियों का आगे बढ़कर स्वागत किया है और उनसे संवाद के लिए एक जनपक्षधर बौद्धिक साझेदारी विकसित करने में अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब जबकि वे अस्सी के हो रहे हैं,यह जरूरी है कि उनके इस अवदान पर बातचीत की जाए और इस आलोक में अपने समय-समाज को भी जानने समझने की एक ईमानदर कोशिश की जाए। इसी कोशिश को आगे बढ़ाते हुए अशोक जी के 80 वें वर्ष में एक संवाद शृंखला 'उपस्थिति:अशोक वाजपेयी' नाम से 23 सितंबर,बुधवार की शाम 6 बजे आयोजित किया गया था। इस आयोजन की शुरुआत 23 सितंबर की शाम 6 बजे अशोक जी के वक्तव्य और कवितापाठ से हुई। 'उपस्थिति:अशोक वाजपेयी' का पहला वक्तव्य 24 सितंबर को शाम 6 बजे उर्दू के शीर्ष आलोचक जनाब शमीम हनफ़ी और सुप्रसिद्ध आलोचक कवि विजय कुमार देंगे।ये वक्तव्य क्रमश: 'अशोक वाजपेयी : शख्सियत और कारनामें ' तथा 'अशोक वाजपेयी होने के मायने' विषय पर केंद्रित होंगे। आप भी इस आयोजन से जुड़ सकते हैं। 


श्री अशोक वाजपेयी हिंदी के शीर्षस्थानीय कवि,आलोचक और विचारक हैं। उनकी रचनात्मकता के विविध आयाम हैं। उन्हें आसानी से बुद्धिजीवी-कार्यकर्ता कहा जा सकता है। हम देखें तो पिछले लगातार वर्षों में सार्वजनिक जीवन में विकसित होती जनतांत्रिकता को गंभीर नुकसान पहुंचा है।प्रगति विरोधी साम्प्रदायिक और फासीवादी शक्तियों के गठजोड़ ने जनतांत्रिक मूल्यों पर पूरी ताकत से प्रहार किया है। यूँ तो यह प्रक्रिया '90 के बाद से शुरू हो गई थी किंतु पिछले एक दशक में यह 'न्यू नॉर्मल' बन गया है।यह फासीवाद के लिए राजमार्ग तैयार करने की प्रक्रिया का एक पड़ाव है। हिंदी लोकवृत्त में यह प्रभाव स्पष्ट और मुखर रूप में देखा जा सकता है।साम्प्रदायिक शक्तियाँ नागरिकों के निजी वृत्त में भी प्रवेश कर रही हैं।

इन विकट परिस्थितियों में अशोक वाजपेयी ने अपनी सामाजिक और राजनैतिक मान्यताओं के माध्यम से हिंदी समाज के बीच एक सार्थक और कारगर हस्तक्षेप  किया है । वे हिंदी की  प्रतिरोधी परम्परा के अनुरूप ही सक्रिय बौद्धिक के रूप में काम कर रहे हैं।इस रूप में वे सक्रिय जनतांत्रिक चेतना के प्रमुख लेखक विचारक हैं। वे साम्प्रदायिक-फासीवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ संघर्ष करते हैं और फासीवाद विरोधी सभी विचारों से संवाद करते हैं। सत्ता प्रायोजित साम्प्रदायिक तनावों, घटनाओं और दंगों की मुख़ालफ़त करने वाले बुद्धिजीवियों-साहित्यकारों में वे प्रमुख हैं। अशोक वाजपेयी का व्यक्तित्व धर्म-निरपेक्ष मूल्यों के प्रति गहरे संबद्ध और सक्रिय है। वे आसन्न संकटों के खिलाफ साझा न्यूनतम कार्यक्रम के उदार एवम जनतांत्रिक मोर्चे के प्रमुख नेता हैं।

अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी परिदृश्य में महत्वपूर्ण कवि और आलोचक के रूप में समादृत हैं। 'शहर अब भी सम्भावना है' से लेकर हाल फिलहाल प्रकाशित संग्रह 'कम से कम' तक अशोक वाजपेयी के कवि की वृहत्तर और समृद्ध यात्रा हमारे सम्मुख मौजूद है।अशोक वाजपेयी को जीवन जगत से प्रेम और मानवीय आस्था का कवि कहा जा सकता है।प्रेम और ऐंद्रिकता के साथ-साथ विविध काव्य विषय उनके यहाँ एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष भावभूमि पर मौजूद हैं।

एक आलोचक के रूप में अशोक वाजपेयी हिंदी में मौजूद सभी प्रमुख धाराओं से संवाद करते हुए दीख पड़ते हैं। वे कविता के समर्थ आलोचक हैं।अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध को छायावादोत्तर परिदृश्य में तीन प्रमुख कवियों के रूप में स्थापित करने के लिए उन्होंने इनका एक विशिष्ट अध्ययन किया है। उनकी आलोचना का सर्वाधिक महत्व उनके संवादीपन के कारण है।

उनकी रचनात्मकता का एक पक्ष उनका संस्कृति संबंधी कार्य है जिसमें उनकी भूमिका संगठक और नियोजक की रही है।संस्कृति को समाज में जगह दिलाने में उनके सांस्थानिक कार्यों का अभूतपूर्व महत्व है। पिछले वर्षों में सत्ता के दबाव में निरन्तर कमजोर पड़ती संस्थानिक गतिविधियों के समय में उन्होंने वैकल्पिक माध्यम तलाश किये हैं और उन्हें महत्व के साथ संचालित और स्थापित किया है।

वरिष्ठ रचनाकार अशोक वाजपेयी की जीवनयात्रा का यह 80 वां वर्ष है । इस अवसर पर भेंट स्वरूप उनकी 5 कविताओं का गुलदस्ता रंगदूत ने मुक्तिपथ मंच के लिए तैयार किया है देखिए .....


अशोक वाजपेयी प्रेम की सतत विकलता के कवि हैं। उनकी कविताओं में प्रेम की विभिन्न स्थितियां और मनःस्थितियां पूरेपन से अभिव्यक्त होती हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर युवा अभिनेता और अध्येता ललित सिंह ने अशोक जी की कविता 'विदा' का अभिनयमुखी वाचन किया है। सुनने के लिए लिंक पर दस्तक दें :  

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