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स्त्रियों के संघर्ष और दृढ़ इरादों की प्रतीक है फिल्म 'छपाक'

स्त्रियों के संघर्ष और दृढ़ इरादों की प्रतीक है फिल्म 'छपाक'

सुभाष मिश्र

सौंदर्य का गहना है स्त्री लेकिन वही जब झुलसे चेहरे के साथ समाज के बीच घूमती है तो सोचिए कितना पीड़ादायक होता होगा. 'कोई चेहरा मिटा के और आंख से हटा के चंद छींटे उड़ा के जो गया, छपाक से पहचान ले गया' शंकर एहसान लॉय की धुनों और गुलजार के लिखे इन अल्फाजों से सजी संवरी फिल्म छपाक आपको कई सवालों से रूबरू कराती है और उसके जवाब भी देती है.

अमूमन हम मनोरंजन के लिहाज से फिल्में देखने जाते हैं लेकिन एक रंगकर्मी के तौर पर आज फिल्म छपाक' को देखने के कई रोमांच और उनके पीछे सवाल थे. मसलन शो में कितने दर्शक होंगे, इसके विरोध का क्या असर होगा, जो विवाद हो रहा है, वह कितना सही है और यह भी कि इतनी गंभीर मुददे पर बनी फिल्म को देखने के लिए राजनेता कितने गंभीर होते हैं, इत्यादि. आश्चर्य कि ढाई घण्टे की फिल्म में इन सारे सवालों के जवाब सकारात्मक ही मिले. छपाक देखकर मेधना गुलजार को बधाई देने का मन हुआ. रोजी के बाद एक गंभीर मुद्दे पर कैसे फिल्म बनाई जाती है, बहुत से फिल्ममेकर को ये मेधना गुलजार से सीखने की जरूरत है.कल एक TVडिबेट में भी छपाक और अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता खासकर दीपिका के JNU जाने को लेकर अपनी बात फिल्म के पक्ष में पुरजोर तरीके से रखने और फिल्म को देखना के बाद लगा की लोग नाहक ही बिना सोचे समझे किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर सॉजीदगी से बात करने के उसे पब्लिसिटी स्टेंड में तब्दील करने में ज्यादा रूचि दिखाते हैं ।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बधेल का धन्यवाद जिन्होंने आज हमें श्याम टाकीज में फिल्म छपाक' का एक शो देखने का आमंत्रण दिया. पूरे देश में जिन तीन राज्यों में यह फिल्म टैक्स फ्री घोषित हुई हैं, उनमें मध्य प्रदेश और पुडुचेरी के अलावा छत्तीसगढ़ भी शामिल है. एक मुख्यमंत्री सिर्फ राजनेता ही नही होता बल्कि उसके अंदर एक कला और संस्कृति—प्रेमी भी होता है, यह भूपेश बघेल ने साबित कर दिखाया है. अपनी संस्कृति, भाषा और खान—पान के प्रति मान—सम्मान रखने का उनका आग्रह तो हमेशा से ही रहा है परंतु फिल्म छपाक' के प्रति उनकी उदारता यह दर्शाती है कि राज्य में कला—संस्कृति के प्रति अब वाकई संजीदगी आ रही है।

रंगकर्म से जुड़ा होने के कारण एक उत्सुकता यह भी थी कि इस फिल्म में हमारे थियेटर के साथी मनोहर तेली को दीपिका पादुकोन/ मालती अग्रवाल के पिता की भूमिका में देखना और साथी बहारूल इस्लाम को जज तथा भाई अरविंद गौड के अस्मिता ग्रूप के कलाकारों को फिल्म में निर्भया कांड के प्रदर्शन के दृश्य में देखकर अच्छा लगा. बहुत कसा और मंजा हुआ अभिनय किया साथियों ने. छपाक को लेकर खड़ी की जा रही एक झूठी कन्ट्रोवर्सी से भी पर्दा हटा. और वह यह कि एसिड अटैक करने वाला बशीर खान, बब्बू और उसकी साथी थे. फिल्म के बारे में सोशल मीडिया में ये झूठ प्रचारित किया गया है कि वास्तविकता में लक्ष्मी अग्रवाल पर नदीम खान ने एसिड फेंका था पर फिल्म में एक हिंदू नाम के लडके को एसिड फेंकने वाला बताया गया है लेकिन फिल्म में वही दिखाया गया जो रीयल लाइफ में लक्ष्मी के साथ घटा.

यह कहने में झिझक नही कि यह फिल्म पूरी तरह महिलाओं की साझा ताकत और लंबी कानूनी लड़ाई में साथ रहने का बहुत बढ़िया चित्रण है. एक्टिंग के मामले में दीपिका पादुकोण ने बेजोड़ अभिनय किया. खौफ, गुस्सा और ग्लानि के भावों का जिजीविषा, खुशी और आत्मविश्वास में तब्दील होना आपको खुशगवार कर देता है. छपाक के गीत भी बहुत मिनिंगफुल, सुमधुर हैं. मलय प्रकाश की सिनेमेटोग्राफी, दृश्यों का फिल्मांकन गजब का है. मसाला मनोरंजन तलाश रहे लोगों के लिए यह फिल्म कतई नहीं है.

फिल्म रिलीज से पहले इस फिल्म की मुख्य अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जेएनयू गई थीं. वहां वे छात्रों के साथ साइलेंट प्रोटेस्ट में शामिल हुई. इस घटना के बाद कई लोगों ने छपाक को बॉयकॉट करने की मांग की थी, वहीं कई लोग दीपिका के समर्थन में खड़े दिखे. आज भी जब हम फिल्म देखने पहुंचे तो शो हाउसफुल ही था. इससे साबित होता है कि फिल्म प्रेमी किसी दुष्प्रचार का शिकार नही होते बल्कि अपने विवेक से फैसले करते हैं. भगवान उन्हें भी ऐसी ही सदबुदिध दे जो महज राजनीतिक स्वार्थ के फिल्म का विरोध करने लगते हैं!