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पांच दिवसीय चौथा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आगाज

पांच दिवसीय चौथा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आगाज

 तीन शार्ट फिल्मों के साथ ही टैगोर पर बनी पहली

फिल्म थिंकिग ऑफ हिम व भोर का प्रदर्शन

रायपुर, 10 फरवरी। छत्तीसगढ़ फिल्म एवं विजुअलआर्ट सोसायटी द्वारा आयोजित पांच दिवसीय चौथा अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का उद्घाटन आज संस्कृति भवन स्थित महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में हुआ। इस सत्र का उद्घाटन  फिल्म समीक्षक अजीत राय, छत्तीसगढ़ फिल्म एवं विजुअलआर्ट सोसायटी  के अध्यक्ष  सुभाष मिश्र, डायरेक्टर  रचना मिश्रा, सूरज कुमार, कमाख्या सिंह, अक्षत पांडेय, डॉ. योगेन्द्र चौबे,एवं अजीज कादीर ने दीप प्रज्जवलित कर किया। 

उद्घाटन पश्चात शार्ट फिल्म फ्रेंड रिक्वेस्ट निर्देशन एवं निर्माता एवं लेखक सूर्या पासी, "द म्यूट" निर्देशन, लेखक एवं निर्माता- धीरज कुमार चौरे, ब्लाइंड निर्देशन एवं निर्माता - शिखर ग्वालरे लेखक- संतोष कुमार  दिखाई गई। शार्ट फिल्म ब्लाइंड पर वहां उपस्थित लोगों ने अपनी-अपनी राय रखी। हीरापुर स्थित ब्लाइंड स्कूल के संचालक हरजीत सिंह जुनेजा ने ब्लाइंड बच्चों की दिनचर्या पर विस्तार से जानकारी दी। ब्लाइंड फिल्म पर लोगों ने अपनी राय रखते हुए कहा कि यह फिल्म काफी प्रेरणादायक है और ब्लाइंड लोग किस तरह से जीवनयापन समाज में व्यतीत करते हैं उसे गहराई से इस फिल्म के माध्यम से समझा व महसूस किया जा सकता है। शार्ट फिल्मों को वहां उपस्थित लोगों ने सवाल जवाब भी किए।  ब्लाइंड फिल्म को लेकर भिलाई इप्टा के छात्र पोषण साहू ने कहा कि यह फिल्म अच्छे विषय को लेकर बनाया गया है और ब्लाइंड होते हुए भी लोग समाज में कैसे रहते हैं उसे फिल्मांकन के जरिेए बखूबी दिखाया गया है।  तो वहीं फिल्म के निर्देशक शिखर ग्वालरे ने बताया कि ब्लाइंड शार्ट फिल्म के लिए उनके मित्र लेखक मुंबई निवासी संतोष कुमार ने शार्ट फिल्म बनाने के लिए एक स्क्रिप्ट भेजा,  जिसे 8 लोगों की टीम ने कड़ी मेहनत और लगन से एक महीने के भीतर बनाया। उन्होंने कहा  कि इस तरह की फिल्म बनाने के लिए सबसे पहले मासिद मजिदी के फिल्म द कलर ऑफ पैराडाइज एवं नसीर साहब की फिल्म स्पर्श को देखा। इसके बाद महज 8 हजार की लागत से ब्लाइंड फिल्म को बनाया गया। 


आधुनिक जमाने में हो रहे सोशल मीडिया के दुरुपयोग को  शार्ट फिल्म फ्रेंड रिक्वेस्ट में दिखाया गया है। सोशल मीडिया, फेसबुक,  टिवटर, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट आदि में जो एकाउंट बनाते हैं उसमें अपनी प्रायवेसी को पब्लिकली नहीं करना चाहिए। इससे सोशल मीडिया में अपलोड प्रोफाइल में लगे फोटोस एवं निजी जानकारी को पब्लिकली करने से बचने का संदेश इस फिल्म के जरिए सुरक्षात्मक  दृष्टिकोण से दिखाया गया है। 

शार्ट फिल्म  द म्यूट  में दिखाया गया कि समाज में गूंगे व्यक्ति किस तरह से अपनी बात को रखता है और समाजिक हित में किस तरह से अपने योगदान देते हैं, उसे बखूबी दिखाया गया है।

  चौथा अंतराष्ट्रीय  फिल्म समारोह में हिस्सा लेने  पूरे प्रदेश भर से आये कलाकारों ने अपनी फिल्मो का रजिस्ट्रेशन भी कराया। वहीँ दर्शको का कहाँ हैं इस तरह के आयोजन  होने से   यहाँ  कलाकारों को फिल्म की बारीकियाँ सिखने में मदद  मिलेगी। वहीं लोगों का कहना हैं कि अंतराष्ट्रीय  फिल्म फेस्टिवल से छत्तीसगढ़ के कलाकारों को मंच मिलेगा एवं आने वाले समय में यहाँ के कलाकार के स्किल मजबूत होंगे। 

  छत्तीसगढ़ फिल्म एवं विजुअलआर्ट सोसायटी  के अध्यक्ष सुभाष मिश्र ने बताया कि रायपुर में पांच दिवसीय  चौथा अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया है, जो सुबह 10 बजे से रात नौ बजे तक कई ऐसे फिल्मों को प्रदर्शित किया जाएगा, जो बड़े पर्दे पर रिलीज नहीं  हुई हैं। उन्होंने बताया कि इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए प्रदेशभर से कलाकार बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। और अपनी शार्ट फिल्मों को प्रदर्शित करने के लिए पंजीयन करा रहे हैं, जिसे अलग-अलग समय में दिखाया जा रहा है।


पाब्लो सीजर के निर्देशन में बनी थिंकिग ऑफ हिम 

पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में आज राष्ट्र कवि एवं नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्र नाथ टैगोर के जीवन पर बनी फिल्म थिंकिंग आफ हिम का प्रदर्शन किया गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर और अर्जेंटीना की लेखिका विक्टोरिया ओकैंपो से मुलाकात पर आधारित ‘थिंकिग ऑफ हिम‘ नाम की इस फिल्म का निर्माण भारत और अर्जेंटीना के फिल्मकारों ने संयुक्त रूप से किया है। अर्जेंटीना पाब्लो सीजर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अभिनेता विक्टर बैनर्जी मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म के सह निर्माता सूरज कुमार ने बताया कि शांतिनिकेतन, कोलकाता और ब्यूनस आयर्स में इस फिल्म की शूटिंग हुई है। फिल्म की शूटिंग पश्चिम बंगाल, अर्जेंटीना और फ्रांस में हुई है। यह टैगोर की ऐसी कहानी है जो दुनिया सुननी चाहती है। विक्टर बैनर्जी के अलावा इस फिल्म में राइमा सेन कमली के किरदार में है तो वहीं अर्जेंटीना की अदाकार एलोनोरा वेक्सलर विक्टोरिया ओकैंपो की भूमिका में है।


टैगोर 1924 में जब अर्जेंटीना के रास्ते यूरोप के पेरू की यात्रा पर थे तो उस दौरान विक्टोरिया से उनकी मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात से पहले जब टैगोर ने गीतांजलि लिखी थी तब लातिन अमेरिकी देश उससे काफी प्रभावित हुये थे और उस वक्त विक्टोरिया ओकैंपो अर्जेंटीना की जानी-मानी लेखिका और समीक्षक थीं। दोनों के बीच पत्रों के जरिये जान-पहचान हुई और इसके बाद दोनों की मुलाकात भी हुई और यह फिल्म इसी पर आधारित है।

कामाख्या नारायण सिंह निर्देशित भोर का प्रदर्शन

युवा फिल्मकार कामाख्या नारायण सिंह की फीचर फिल्म " भोर " अपनी सादगी, संदेश और सच्चाई के कारण सराही जा रही है। " भोर " निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह की पहली ही फिल्म है जिसमें मुख्य भूमिकाएं सुप्रसिद्ध रंगकर्मी अरविद गौड़ की बेटी सावेरी गौड़, नीलेश नील और वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने निभाई है।

"भोर" समाज के आखिरी पायदान पर जानवर की हालत में जी रहे मुसहर समाज का सिनेमाई क्लाइडोस्कोप है। यहॉ गाँव के मुखिया ठाकुर साहब और उनका परिवार हिंसक खलनायक नहीं है। वे संरक्षक है। ताड़ी, ट्रैक्टर और बॉलीवुड की सिंफनी में सूअर, कीचड़ और मिट्टी का रोमांस है। जब बुधनी पढ़ाई में जिले में टॉप करती है तो स्कूल के प्रिंसीपल की मिठाई को ठुकताते हुए उसका ससुर अपने बेटे सुगन से पूछता है कि क्या उसने किसी मुसहर को मिठाई खाते देखा है? बहुत ही मामूली खर्चे में बनी भोर हिंदी सिनेमा में ताजी हवा की तरह है। सभी कलाकारों को गाँव के असली चरित्रों के साथ महीनों की ट्रेनिंग दी गई। उन्हें मुसहर समाज के जीवन का अभ्यास कराया गया। तब जाकर कही असली मुसहर जीवन की तासीर बन पड़ी।

फिल्म 'भोर' की कहानी बिहार के मुसहर जाति की बुधनी नाम की लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है. बुधनी ने छोटे-छोटे संघर्ष कर सम्मान की जिंदगी जीना कैसे शुरू करती है, फिल्म में दिखाया गया है. बिहार की मुसहर जाति की महिला के संघर्ष के ताने-बाने पर बनी फिल्म 'भोर' में बिहार के मुसहर टोले के लोगों को ही बतौर कलाकार लिया गया है. फिल्म की 80 फीसदी शूटिंग भी बिहार के नालंदा जिले में हुई है.

सुगन के सहयोग से बुधनी स्कूली परीक्षा में पूरे जिले में टॉप कर जाती है। जिले के कलेक्टर उसे बुला कर सम्मानित करते है और पूछते है कि वे उसके लिए क्या कर सकते है? बुधनी की एक ही ख्वाहिश है कि उसके घर में शौचालय बन जाय। कलेक्टर इसके लिए उसे 25 हजार रूपये देते है। सुगन और उसका बाप उस पैसे को मुसहर टोला में बाईजी का नाच और गाँव वालों को खिलाने - पिलाने में उड़ा देता है। विरोध करने पर बुधनी की पिटाई होती है। वह हिम्मत नहीं हारती और अंतत़: अस्थाई शौचालय बनवाकर ही दम लेती है। बुधनी को मीडिया स्टार तो बना देता है पर उसकी आगे कोई मदद नहीं करता। अवैध झुग्गी बस्ती को बुलडोजर से गिरा दिया जाता है। अब बुधनी पति के साथ दुबारा विस्थापित होकर अपने गाँव पेंगरी लौट रही है।

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