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भारत का 50वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह: जन्नत की हकीकत और बहत्तर हूरों का तिलिस्म

भारत का 50वां अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह:  जन्नत की हकीकत और बहत्तर हूरों का तिलिस्म

अजित राय

गोवा। भारत के 50 वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के भारतीय पैनोरमा में दिखाई गई संजय पूरन सिंह चौहान की विलक्षण फिल्म च्च् बहत्तर हूरेंज्ज् अपने विषय से अधिक सिनेमाई व्याकरण के कारण भारतीय सिनेमा में एक नया प्रस्थान है। ऋतुपर्णों घोष की  दोसोर (2006) के बाद शायद ही किसी ने आज के जमाने में पूरी फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में शूट करने का जोखिम उठाया हो। तेरह साल बाद यह जोखिम संजय पूरन सिंह चौहान ने उठाया है जिससे फिल्म को एक क्लासिक स्पर्श मिल सका है। संजय पूरन सिंह चौहान की पिछली फिल्म च्च् लाहौरज्ज् (2010)को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था और इसे दुनिया भर में सराहा गया था।

आश्चर्य है कि हत्या, जिहाद, बम ब्लास्ट और पाकिस्तान पोषित इस्लामी आतंकवाद को लेकर इतनी अच्छी कलात्मक फिल्म भी बनाई जा सकती है। फि़दायीन पाकिस्तानी आतंकवादी की भूमिका में पवन राज मल्होत्रा ने अपने जबरदस्त काम से एक बार फिर चकित कर दिया है।

मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया पर पाकिस्तानी लश्कर-ए-तैयबा के द्वारा किए गए कार बम ब्लास्ट में 25 अगस्त 2003 को 54 लोगों की जान गई थी और 244 गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह फिल्म इसी घटना से प्रेरित है लेकिन पूरी तरह से काल्पनिक है। हालांकि यह घटना पूरी फिल्म में एक जरूरी संदर्भ की तरह है और यह पहले, दूसरे, सातवें, 57 वे, 169 वे दिन और 2027 जैसे शीर्षक वाले अध्यायों में बंटी हुई है। ग्राफिक्स काफी उ दा है और मुंबई की सबाल्टर्न दृश्यावली क्लासिक पेंटिंग की तरह लगती है।

बहत्तर हूरें इस्लामी समाज में कुछ कट्टर मौलवियों द्वारा फैलाए गए इस अंधविश्वास की एंटी थीसीस है कि जिहाद में शहीद होने पर जन्नत और वहां 72 हूरें (कुंवारी सुंदरियां) मिलेंगी। फिल्म की शुरुआत ही पाकिस्तान के मौलवी सादिक सईद की तकरीर से होती है जिसमें वे सीधे सादे मुस्लिम नौजवानों को यह कहकर गुमराह कर रहे हैं कि जिहाद में शहीद होने के लिए अल्ल्लाह ताला जिनको चुनता है वे बड़े किस्मतवाले होते हैं। उन्हें जन्नत में 72हूरें और उनको भोगने के लिए 40 मर्दों की मर्दानी ताकत मिलेगी और वे अब अपनी मैली कुचैली बीबीयों के बारे में सोचना छोड़ दें।

मौलवी सादिक सईद के बहकावे में आकर हाकीम अली (पवन राज मल्होत्रा) और बिलाल (आमिर बशीर) शहादत का जाम पीकर जन्नत और 72 हूरों के चक्कर में आतंकवादी बनते हैं और मुंबई के गेट वे ऑफ इंडिया पर बम ब्लास्ट करते हैं और खुद भी मर जाते हैं। आगे की फिल्म उन दोनों के भूत के बीच अनवरत संवाद और दिलचस्प घटनाओं में थोड़ी लैश बैक और ज़्यादातर लैश फारवर्ड में चलती हैं। बिलाल उम्र में हाकीम से छोटा है और बम ब्लास्ट के पहले ही उसे समझ में आ जाता है कि बेगुनाह लोगों को मारने से जन्नत नही जहन्नुम मिलती है और मौलवी सादिक सईद ने उन्हें गुमराह किया है। यह बात हाकीम को अंत में समझ में आती है। इसीलिए बिलाल उस हिस्से में बम ब्लास्ट करता है जहां भीड़ भाड़ नहीं है।  वे दोनों भूत बनकर अपनी लाश का पोस्टमार्टम होने से लेकर दफनाए जाने तक के नाटकीय घटनाक्रम के गवाह बनते हैं। उधर पाकिस्तान में इन दोनों के लिए मस्जिद में आयोजित भव्य श्रद्धांजलि सभा में मौलवी सादिक सईद फिर वहीं जन्नत और 72 हूरों वाली तकरीर कर रहे हैं और इधर हाकीम और बिलाल के भूत जोर जोर से चीख रहें हैं कि बेगुनाहों को मारने से जन्नत नहीं मिलती, पर उनकी आवाज कोई नही सुन पाता क्योंकि वे मर चुके हैं और भूत बन चुके हैं।

फिल्म में कई मजेदार दृश्य है। एक जगह पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ मुस्लिम औरतों के जूलूस को देखकर हाकीम कहता है कि च् यह सब पाकिस्तान को बदनाम करने की साजि़श है। हिंदू औरतों को बुर्के में खड़ा कर दिया है। च्च्  कचरा उठाने वाली गाड़ी में इनके शवों को ले जाते समय जब आग लग जाती है तो हाकीम अपना सिर पीटते हुए कहता है कि च्च् अरे बेवकूफों इस्लाम में लाश को जलाते नहीं, दफनाते है। ज्ज् तभी बारिश होने लगती है तो उसे लगता है कि अल्लाह ने उसकी सुन ली। दो मुर्दा चोर कब्र से उनकी लाशें चुरा लेते हैं और पता चलने पर कि ये तो आतंकवादी है, लाशें लौटाने के लिए आई एस आई के एजेंट को ढूंढने मदरसे के मौलवी के पास चले जाते हैं। आक्रोशित हिंदूओं की भीड़ उनकी कब्रें खोद देती है कि आतंकवादियों को दफनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। हकीम को लगता है कि वह तो खुदा का काम करने निकला था , फिर सबकुछ उलटा क्यों हो रहा है। उसे बार बार अपना घर और अपनी प्यारी बीबी याद आती है। उसे यकीन हो जाता है कि जिहाद एक गुमराही है और बेगुनाहों को मारने से अल्ल्लाह कभी खुश नहीं होता। फिल्म बिना किसी प्रवचननुमा टिप्पणी के केवल सिनेमाई व्याकरण में जिहाद से जन्नत और 72 हूरों के अंधविश्वास को बेनकाब करती है। इस फिल्म को गोवा फिल्मोत्सव में इस साल यूनेस्को के इंटरनेशनल काउंसिल फार फिल्म, टेलीविजन एंड आडियो विजुअल क युनिकेशन (पेरिस) गांधी मेडल के प्रतियोगिता खंड में शामिल किया गया है।