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हिरासत में होने वाली मौतों का जिम्मेदार कौन

हिरासत में होने वाली मौतों का जिम्मेदार कौन

शिवप्रसाद जोशी

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग लंबे समय से इस पर अपनी चिंता और क्षोभ जाहिर करता रहा है. उसके सुझाव, सिफारिशें और नाराजगियां जस की तस हैं और हिरासत में मौतों का ग्राफ गिरता चढ़ता रहता है. आंकड़ों के मुताबिक अगर एक दशक का हिसाब लगाएं तो मार्च 2020 तक कम से कम 17146 लोग न्यायिक और पुलिस हिरासतों में मारे गए. ये औसत हर रोज पांच मौतों का आता है. इनमें से 92 प्रतिशत मौतें 60 से 90 दिनों की अवधि वाली न्यायिक हिरासतों में हुई थी. शेष मौतें पुलिस हिरासत में हुईं जो 24 घंटे की अवधि की होती है या मजिस्ट्रेट के आदेश पर 15 दिन तक बढ़ायी जा सकती है. ये भी पाया गया है कि न्यायिक हिरासत में होने वाली सभी मौतें टॉर्चर, पिटाई और जेलकर्मियों की ज्यादतियों की वजह से नहीं हुईं बल्कि इनके पीछे कैदियों की बीमारी, इलाज में देरी, उपचार में उपेक्षा, खराब रहनसहन, मनोवैज्ञानिक समस्या या वृद्धावस्था जैसे अन्य कारण भी हो सकते हैं.

पिछले महीने तमिलनाडु की एक जेल में पुलिस बर्बरता का शिकार बने दलित पिता पुत्र की मौत ने सहसा सबका ध्यान इस ओर खींच लिया और देश विदेश में इस मामले की गूंज सुनाई दी. इससे पुलिस जवाबदेही की मांग ने जोर पकड़ा. मद्रास हाईकोर्ट ने जांच का आदेश दिया और राज्य सरकार ने मामला सीबीआई को सौंप दिया. इंडिया स्पेंड वेबसाइट में मानवाधिकार आयोग के आंकड़ो की मदद से प्रकाशित एक विस्तृत विश्लेषण में दर्ज 17146 मौतें, पुलिस और जेल व्यवस्था की कहानी बयान करती हैं.

कुचले जा रहे हैं कैदियों के मानवाधिकार

मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के मुताबिक ऐसी मौतों की सूचना 24 घंटे में मुहैया करानी होती है लेकिन ऐसा होता नहीं है. दोहरी मार इन निर्देशों पर ये है कि रिपोर्ट पेश न कर पाने की सूरत में दंड का भी कोई प्रावधान नहीं है. इस बारे में जानकारों का कहना है कि पुलिस के पास अपने बचाव की बहुत सी दलीलें रहती हैं. आयोग के निर्देश ये भी कहते हैं कि हिरासत में हुई मौत की मजिस्ट्रेटी जांच दो महीने में पूरी करा ली जानी चाहिए और इसमें मृत्यु के हालात, तरीके और घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्यौरा और मौत की वजह दर्ज होना चाहिए. कैदियों के भी मानवाधिकार हैं, ये बात जेल प्रशासन और सरकारें न जाने कैसे भुला बैठती हैं. वीआईपी कैदियों को तमाम सुविधाएं मिलती हैं लेकिन आम कैदी दुर्दशा में रहते हैं. उनके भोजन, कपड़े, बिस्तर, पीने के पानी, नहाने-धोने, साफ-सफाई, उपचार आदि पर पर्याप्त खर्च न किए जाने की शिकायतें अक्सर सामने आती रही हैं.

हिरासत में मौत का मामला जेलों के शोचनीय हालात से भी जुड़ा है. अगर कैदियों की मृत्यु दर जेलों में अधिक है तो देखा जाना चाहिए कि उन जगहों पर रहनसहन और स्वास्थ्य की सुविधाएं कैसी हैं. एक सच्चाई ये भी है कि कोविड महामारी की वजह से देश की कई जेलों की दुर्दशा पर नये सिरे से ध्यान गया है. भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद 80 वर्षीय जानेमाने तेलुगु कवि वरवर राव कोरोना की चपेट में आ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. हिरासत में यातना, उपेक्षा, तिरस्कार और मौतों के डरावने आंकड़ों के बीच एक चिंताजनक तथ्य ये भी है कि जेलों में बंद कैदियों और विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों की है. जम्मू कश्मीर जैसे प्रदेश को भी नहीं भूलना चाहिए जहां लापता हो चुके लोगों के परिजन दशकों से इंसाफ के लिए भटकते रहे हैं. और पब्लिक डोमेन में किसी न किसी रूप में उनकी कथाएं उपलब्ध हैं.

यूएन समझौते का अनुमोदन नहीं

टॉर्चर और अन्य क्रूर, अमानवीय या नीचतापूर्ण व्यवहार या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में हुए समझौते पर भारत अक्टूबर 1997 में दस्तखत तो कर चुका है लेकिन विधि आयोग की सिफारिश के बावजूद इसकी अभिपुष्टि उसने नहीं की है. हिरासत में मौतों को लेकर एक मजूबत कानून का न बन पाना भी इस मामले की एक बड़ी पेचीदगी है. राजनीतिक और पुलिस व्यवस्था और ब्यूरोक्रेसी के दबाव अपना काम करते रहते हैं. अक्सर इस मामले में ये दलील भी दी जाती है कि पुलिस पर अनावश्यक दबाव आएगा और अपराधियों को बल मिलेगा. लेकिन एक सुचिंतित और पारदर्शी व्यवस्था के दावे में ये तर्क नहीं खपता. ज्यादा सख्ती और ज्यादा क्रूर तरीकों को अपनाने का अर्थ ज्यादा नैतिक सुधार और अपराधों में ज्यादा कटौती नहीं हो सकता. विशेषज्ञों के मुताबिक पुलिस जांच और पूछताछ की प्रक्रिया इतनी दोषपूर्ण न होती अगर जांच के वैज्ञानिक तरीके उपलब्ध होते और पुलिस को विशेष रूप से इस कार्य के लिए प्रशिक्षित किया जाता. एक कारगर फोरेन्सिक तकनीक का अभाव भी समस्या है.

हिरासत में मौत की घटनाओं के बीच पुलिस के अंदरूनी तंत्र में भी सुधार की जरूरत है. जिसका संबंध भर्तियों से लेकर वेतन विसंगतियों, पदोन्नति, और अन्य सुविधाओं से जुड़ा है. पुलिसबल में कमी का असर पुलिसकर्मियों के कामकाज पर भी पड़ता है, इन सबका अर्थ ये नहीं है कि वे अपनी खीझ या हताशा गरीब, कमजोर और बेसहारा कैदियों पर निकालें. जेल सुधारों के लिए नियम कायदे बनाने के अलावा उच्च अधिकारियों और उनके मातहतों में मानवाधिकारों के प्रति संवेदना और सजगता भी जरूरी है. मानवाधिकार आयोगों को भी और अधिकार संपन्न और प्रभावी बनाया जाना चाहिए. औपनिवेशिक दौर के पुलिस एक्ट को बदल कर पुलिस अफसरशाही के ढांचे में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. इस ढांचे को पुलिस की अंदरूनी जरूरतों के हिसाब से ढालना होगा न कि सरकारों और राजनीतिक दलों के हितों के हिसाब से. आखिरकार पुलिसकर्मी नागरिकों के रखवाले हैं, उन पर जुल्म ढाने वाले एजेंट नहीं.