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स्त्री को ढंकने का उपदेश देने वाले अपनी आँखें ढंक लें

स्त्री को ढंकने का उपदेश देने वाले अपनी आँखें ढंक लें

योग मिश्र

इस देश का चरित्र समझ में ही नहीं आता। प्रभु रासलीला कर रहे हैं। उनका देखा देखी छोटे मोटे प्रभु भी आशाराम बने घूम रहे हैं। जब इनको लीला करनी है तो छोटे-मोटे लीलाधर कैसे इन्कार करें? ओशो कहते हैं भारत का इतिहास भरा है ऐसे लीलाधरों की लीलाओं से पुराण कथाओं में ऐसे कितने चरित्र चित्रित है माननीयों के। 

एक तो जुआ खेलना भ्रष्टता है। उस पर अपनी पत्नी को दांव पर संपत्ति समझकर लगाना तो घोर भ्रष्टता है फिर भी धर्मराज कहे जाते हैं। बड़े-बड़े ज्ञानियों शूरवीरों के सामने स्त्री का चीर हरण हो रहा है और सब खामोश बैठे हैं। किसी के मुँह से यह न निकला कि यह क्या हो रहा है। फिर हमारे देश में संपत्ति की ऐसी गिनती होती है जर, जोरू और जमीन झगड़े की जड़ तीन। स्त्री को एक आत्मा के रूप में कभी हमने स्वीकारा ही नहीं। हमने मान लिया स्त्री संपत्ति है। उसका उदाहरण भी प्रस्तुत कर दिया एक स्त्री को संपत्ति की तरह बाँट कर पाँच भाईयों ने लेकिन किसी ऋषि-मुनि ने इस पर एतराज नहीं किया।  और यहाँ लोग इस फिक्र में पड़े हुए हैं कि भारत में स्त्रियाँ पश्चिम से आए छोटे कपड़ों के कारण अपमानित हो रही हैं? 

कन्या का विवाह होता है तो कन्या का बाप अपनी पुत्री को दान में देता है। कन्यादान का न अभी तक कोई विरोध करता है न किसी को आज तक इस पर हैरानी हुई है। हम आदी हो गए हैं इस अनीति के। पश्चिम की स्त्री ने स्त्रियों को गौरव दिया है पुरूष से समान अधिकार लेकर। और हमने अपने यहाँ की स्त्री के चरित्र का एक ही मापदण्ड तय कर लिया है कि स्त्री कैसी भी परिस्थिति में हो एक ही पुरूष के साथ अजीवन बंधी रहे। और पति जो कुछ भी चाहे उसके साथ करता रहे क्यों?

ये इतनी सारी वेश्याएं कौन चलाता है? पति ही चलाते होंगे और कौन चलाएगा भला। छोटे बच्चे थोड़ी चलाने जाएंगे? लेकिन मर्द, मर्द है, वह जो भी करे सब ठीक है। हिन्दुस्तान में स्त्री के चरित्र का केवल एक ही मतलब है कि स्त्री एक ही पुरूष के साथ बंधी रहे। हमारे शास्त्रों में इसकी बड़ी प्रशंसा की गई है कि अगर स्त्री अपने बूढ़े कुष्ठ रोग में मरते, गलते, सड़ते पति को काँधे में धर के वेश्या के दरवाजे तक छोड़कर आ जाए तो हम कहते हैं यह है स्त्री चरित्र। देखो क्या उदाहरण है हमारे शास्त्रों में स्त्री चरित्र का? मरते पति ने पत्नी के सामाने इच्छा जाहिर की कि उसे वेश्या के घर जाना है तो बेचारी पत्नी उसे वेश्या के घर छोड़कर आएगी। ऐसे पति को गंगाजी में डूबो आती तो वह चरित्र होता लेकिन सारे शास्त्र पुरूषों ने लिखे हैं एक भी शास्त्र स्त्री ने नहीं लिखे हैं। इसलिए सारे शास्त्रों में चरित्र नहीं, स्त्री की अपने लिए दासता पुरूषों  ने लिख रखी है। 

पश्चिम की स्त्री ने पुरूष के समान अधिकार की घोषणा की है। वह है स्त्री का असली चरित्र। लेकिन भारतीय पुरूष इससे चरित्र मानते हैं कि देखो पश्चिम की स्त्री सिगरेट पीती है और भारतीय स्त्रियाँ पश्चिम के फैशन का अंधा अनुकरण कर अंग प्रदर्शित कर रही हैं। अगर सिगरेट पीना बुरा है तो पुरूषों का भी सिगरेट पीना उतना ही बुरा है। कोई चीज बुरी है तो सबके लिए बुरी है। क्यों हम स्त्री के लिए अलग भेद करते हैं? पुरूष लंगोट लगा कर नदी में नहाए तो ठीक है और स्त्री यदि लंगोटी बाँधकर नदी में नहाए तो चरित्रहीन हो गई? यह दोहरे मापदण्ड क्यों? यह दोहरे मापदण्ड ही पुरूष के चरित्रहीनता के प्रत्यक्ष सबूत हैं। मापदण्ड एक होना चाहिए। और इस अलग-अलग मापदण्ड का परिणाम क्या हो रहा है? 

परिणाम यह है कि भारतीय पुरूष चौबीसों घंटे स्त्री के कपड़े उघाड़ने में लगा हुआ है कल्पना में ही सही। सपने में ही सही जब भी खाली बैठा है यही सोचता रहता है कैसे स्त्री के कपड़े उघाडे? स्त्रियों को नंगा करने में ही लगा रहता है। और स्त्रियाँ पुरूष की नजर से अपना शरीर छुपाने की जतन में ही लगी हुई हैं। यह भारतीय पुरूषों का असल चरित्र। जो लोग स्त्रियों को ज्ञान देते हैं वह कैसा कपड़ा पहनें? वे स्त्रियों को ढंकने के पहले अपनी आँखें बंद करें यदि उन्हें खूबसूरती निहारना पसंद नहीं हैं। गुलाब की खुशबू मसले जाने पर नहीं मिलती इसलिए खूबसूरती निहारने का सलिका अपनी नजरों को सिखाएं। घूरें नहीं।